Friday, 23 December 2022

कौन है भारत माता?

मुझे इस किताब के बारे में तब पता चला जब मैं तथ्यपरक साहित्य, इतिहास या भाषा से संबंधित तथ्यों के अन्वेषण में लगा हुआ था अचानक किताब की कवर फ़ोटो के साथ साथ नाम ने चौका दिया और कही कही मुझे इस किताब की एक दो पन्ने कई बार लोग शेयर करते है पढ़ने मिला तो मैं काफी उत्साहित था कि आखिर यह किताब है क्या, तो मैंने इसको अपने Wishlist में रख लिया फिर मैंने लेखक के बारे में पता किया और उनके कई छोटे छोटे वीडियो देखें फिर कई और कई ऐसे फिलोसॉफी पढ़ाने वाले प्रोफेसर से भी इस किताब या लेखक के बारे में सुना एक तो हमारे गाँव के ही है जिनके बारे में इस किताब की भूमिका में जिक्र भी किया गया है।


फिर मुझे लगा कि यह किताब मुझे पढ़नी चाहिए, ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर पढ़ते वक्त कई बार अगर आपके हाथ में कोई ऐसी किताब हाथ लग गयी हो जो सिर्फ एक विचारधारा से संबंधित बातों को आगे रखकर लिखा गया हो तो आपकी विचारधारा प्रभावित होने का खतरा है। इसीलिए ऐसी किताबो को पढ़ते वक़्त इन बातों का ख्याल रखना अति आवश्यक है। ऐसा नही है कि इस किताब में लेखक ऐसी जगहों से ना गुजरे हो लेकिन जिन तथ्यात्मक तरीके से अच्छे बुरे कटु अनुभवों के साथ इतना लंबा समय देकर इस किताब को मूर्त रूप दिया गया है इसके लिए लेखक महोदय (पुरुषोत्तम अग्रवाल) जी की जितनी तारीफ की जाय कम है और आज मै यह कह सकता हूँ कि अगर आप नेहरू का विरोध करना चाहते है तो अवश्य करें लेकिन उससे पहले इस किताब को अवश्य पढ़ें तभी आप विरोध कर पाएंगे, वरना बेकार में आप व्हाट्सएप से फारवर्ड किये गए ऐसे अतथ्यात्मक संदेशो को फारवर्ड करते ही रह जाएंगे।

मेरे लिए यह किताब अतुलनीय संग्रह में से एक की श्रेणी में रखा जा सकता है। मैं विज्ञान का छात्र रहा हूँ लेकिन मेरी रुचि साहित्य को लेकर काफी पहले से थी लेकिन कोरोना काल ने बहुतों के जीवन मे अनेको बदलाव लाया और मेरे जीवन में किताबों में साहित्यिक रुचि को और गहरा किया जिसमें पिछले एक साल में भाषा को लेकर मेरे अंदर जो समझ तैयार हुई है चाहे वह ब्राह्मी से लेकर प्राकृत से लेकर संस्कृत से लेकर कैथी से लेकर पाली से संबंधित अनेको किताबों को पढ़ते हुए मेरे अंदर जो 1931 से लेकर 1965-70 तक का जो खालीपन था शायद इस किताब ने कुछ हद तक जरूर पूरी की है।

इस किताब के माध्यम से आपको नेहरू की अंग्रेजियत के साथ साथ वे अंदर से कितने भारतीय थे यह किताब आपको बखूबी समझने में मदद करता है। यही किताब आपको यह बता सकता है कि नेहरू को इस भूभाग के हर उस चीज से प्यार था जिससे प्राकृतिक रूप से इस भूभाग ने अपनी सुंदरता प्रदान की है चाहे वह जंगल हो पहाड़ हो पानी हो या फिर हरे भरे मैदानी इलाके और उन्हें सबसे ज्यादा प्यार था तो इस भूक्षेत्र में रहने वाले लोगों से, जिन्हें वे बिना किसी जाति धर्म के भेदभाव के देखने की कोशिश में लगातार प्रयासरत रहते थे। इस किताब से आज के दौर में नेहरू को नही समझने देने की नाकाबिल कोशिश को जनता ही विराम लगा सकती है। यह किताब उनकी शख्सियत के लिए अंधेरे में दीपक के समान साबित हो सकती है।

इसको बारबार पढ़ने की इच्छा है और पढूँगा भी। आखिर में लेखक महोदय का इस अद्वीतिय कृति के लिए फिर से धन्यवाद ज्ञापित करना चाहता हूँ।
शशि धर कुमार

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