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Sunday, 31 May 2026

पटना डायरी : स्मृतियों, साहित्य और शहर की धड़कनों का दस्तावेज़

पटना डायरी : स्मृतियों, साहित्य और शहर की धड़कनों का दस्तावेज़

दिल्ली पुस्तक मेला २०२६ का पहला दिन मेरे लिए कई अर्थों में विशेष था। उसी दिन वाणी प्रकाशन के मंच पर मेरा कविता पाठ निर्धारित था। कार्यक्रम शुरू होने से पहले मैंने सोचा कि कुछ पुस्तकें खरीद ली जाएँ, क्योंकि थोड़ी देर बाद भीड़ बढ़ने वाली थी। संयोग देखिए कि मेरे हाथ में उस दिन जो पहली पुस्तक आई, वह थी "पटना डायरी"। उस समय मुझे नहीं मालूम था कि यह पुस्तक केवल पढ़ी नहीं जाएगी, बल्कि मुझे अपने अतीत, अपनी स्मृतियों और साहित्यिक संवेदनाओं के बीच ले जाएगी। वैसे मैं पटना का तो नहीं लेकिन मेरे बिहार की राजधानी है तो जाना भी हुआ और घूमना फिरना भी और कई अतीत के किस्से अभी भी मेरे ज़ेहन में रची-बसी है।

"पटना डायरी" को पढ़ते हुए बार-बार यह महसूस हुआ कि यह किसी शहर का मात्र विवरण नहीं है, बल्कि एक ऐसे मन की यात्रा है जिसने पटना को जिया है, महसूस किया है और अपनी स्मृतियों में सहेज कर रखा है। पुस्तक की भाषा सहज, आत्मीय और आत्मकथात्मक है। लेखक घटनाओं का वर्णन नहीं करते, बल्कि पाठक को उन घटनाओं के भीतर ले जाते हैं।

पुस्तक के जिन अध्यायों ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, उनमें "रेणु से मुलाकात" और "1980 से 82 का दौर" विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

"रेणु से मुलाकात" पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो साहित्य का एक स्वर्णिम अध्याय आँखों के सामने जीवित हो उठा हो। बालमन की उत्सुकता, लेखक के प्रति आकर्षण और पहली बार किसी बड़े साहित्यकार को देखने का रोमांच—इन सबका चित्रण अत्यंत स्वाभाविक है। जब बच्चे आपस में कहते हैं कि "ये वही हैं जिनकी किताब पर फिल्म बनी है", तब केवल एक व्यक्ति का परिचय नहीं होता, बल्कि उस समय साहित्य के प्रति समाज के सम्मान की भी झलक मिलती है। इस संस्मरण में रेणु केवल एक महान लेखक नहीं, बल्कि एक जीवंत मानवीय उपस्थिति के रूप में सामने आते हैं। मैंने पटना जंक्शन पर रेणु पुस्तकालय को एक बार नहीं कई बार बंद पाया, यूँ कहें कि मुझे कभी खुला ही नहीं दिखा तो थोड़ी कोफ़्त सी हो जाती है कि ऐसा क्यों है। और एक बार मैंने वहाँ के आस पास के जो खुले हुए ऑफिस थे पता किया तो पता चला कभी-कभी खुलता है। इस सन्दर्भ का इस किताब से कोई लेना-देना तो नहीं, लेकिन रेणु जी मेरी साहित्यिक यात्रा के बेहद करीब बैठते है तो मैं कई बार उनका जिक्र आते ही विषय को भूल जाता हूँ।

वहीं "1980 से 82 का दौर" अध्याय ने मुझे सबसे अधिक भावुक किया। गंगा किनारे बैठकर बिताए गए दिन, पटना कॉलेज का परिवेश, शाम की हवा, पुराने मित्रों की स्मृतियाँ—ये सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं जो किसी भी संवेदनशील पाठक को अपने अतीत में लौटने के लिए विवश कर देता है। विशेष रूप से वह भाव कि पुराने संस्थान और शहर समय के साथ बूढ़े तो हो जाते हैं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ कभी बूढ़ी नहीं होतीं—मन को गहराई से छूता है। यह अध्याय केवल 1980-82 का वर्णन नहीं, बल्कि बीतते समय और स्मृति के संबंध पर एक सुंदर चिंतन है।

पुस्तक का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें पटना केवल भौगोलिक शहर नहीं है। वह एक जीवित चरित्र है—जो लोगों, गलियों, साहित्यकारों, मित्रताओं, संघर्षों और यादों से निर्मित होता है। लेखक की दृष्टि में शहर ईंट-पत्थर का समूह नहीं, बल्कि अनुभवों का संग्रह है।

मेरे लिए "पटना डायरी" पढ़ना एक साहित्यिक अनुभव से अधिक एक भावनात्मक यात्रा रहा। इस पुस्तक ने यह एहसास कराया कि शहर बदलते हैं, लोग बिछुड़ते हैं, समय आगे बढ़ जाता है, लेकिन स्मृतियाँ अपने भीतर एक पूरा युग बचाए रखती हैं।

दिल्ली पुस्तक मेले से खरीदी गई उस पहली पुस्तक ने मुझे यह विश्वास भी दिलाया कि अच्छी किताबें अक्सर संयोग से हाथ में आती हैं, लेकिन फिर वे जीवन का स्थायी हिस्सा बन जाती हैं। "पटना डायरी" ऐसी ही एक पुस्तक है—जो पाठक को पटना के बहाने अपने ही अतीत से मिलवा देती है।

धन्यवाद!
शशि धर कुमार

Wednesday, 23 August 2023

सांगीत के विविध आयाम

 #हिंदी

डॉ बीरेंद्र कुमार 'चन्द्रसखी' के किताब "सांगीत के विविध आयाम" के षष्टम अध्याय में लेखक द्वारा "नारी व पुरुष सामाजिक परिवेश में" स्त्री पुरुष के स्थिति पर काफी पैनी नज़र से इस विषय पर अपनी बात रखी है और जितना आप लेखक को पढ़ते है उतना उनके मुरीद होते चले जाते है लेकिन रुकिए यह तभी तक संभव है जबतक आप विषय में किये गए चर्चा से सम्बंधित विषयों को पढ़ा होगा तभी आप इन बातों की गंभीरता को समझ पाएंगे। लेखक का इशारा समय के साथ स्त्री-पुरुष समानता से समाज के सारे दायित्वों का भार नारी पर डाल दिया जाता है और यही पर समाज में नारी के ऊपर सामाजिक भार अत्यधिक बढ़ जाता है जिसकी वजह से उनकी सामाजिक स्थिति पुरुषो की तुलना में काफी कमतर होने लग जाती है और लेखक के अनुसार समाज का पतन यही से शुरू होता है जब नारी अपने लिए या अपने बच्चों के भविष्य के लिए जिम्मेदारी पूर्वक या खुलकर सोचने में असमर्थ कर दिए जाते है। नारी की यही असमर्थता समाज के ह्राष का कारण माना गया क्योंकि एक समय था जब समाज में महिलाओं में कई विदुषी स्त्रियाँ हुई जिन्होंने समाज में अपनी पहचान छोड़ी थी इनमे से कइयों को बहुत सारे लोगों ने पढ़ा भी होगा जैसे घोषा, अपाला, मैत्रेयी जैसी स्त्रियों ने समाज पर अमिट छाप छोड़ने में कामयाब रही थी। मध्यकाल आते आते स्त्रियाँ किसी भी वर्ण की हो उन्हें शिक्षा से वंचित होना पड़ा जिसका असर पारिवारिक स्थिति के साथ साथ सामाजिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ा। यही वजह है की मध्यकाल आते आते समाज में स्त्रियों के लिए सती प्रथा, बाल विवाह, बेमेल विवाह आदि का प्रचलन तेजी से बढ़ा जिससे समाज में नैतिकता का पतन काफी तेज़ी से हुआ। एक समय आया है जब पुत्रों की इच्छा में कन्याओं की ह्त्या करने से भी समाज हिचकने से बाज़ नहीं आया। 

इन्ही मुद्दों पर लेखक सांगीत के बारे में आगे लिखते है कि सांगीत के मंचों से बहुत सारे लेखकों ने इन मुद्दों को समाज के लिए कोढ़ की संज्ञा दी और आवाज उठाने का काम किया और सांगीत के मंचों के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने का काम किया। इसी क्रम में लेखक ने "सांगीत हरिश्चंद्र" में राजा हरिश्चंद्र को काशी में अस्पृश्य राजा डोम के घर पर नौकर दिखाया तथा इसी क्रम में रानी तारावती को ब्राह्मण के घर पर नौकरानी का कार्य करना दिखाना साबित करता है की उस समय के सांगीत लेखक समाज में आगे की सोच रखने वाले थे और समाज को उसका विकृत रूप समय समय पर दिखाते रहे थे। इसकी झलक आप श्रवण चरित्र में उद्यान ऋषी और चन्द्रकला की बातचीत में पुत्रैच्छा की विकृत इच्छा के बारे में देख सकते है

चन्द्रकला: 
"बुढ़ापा आ गया प्यारे पुत्र लेकिन न एक दीना। 
नैन अंधे भये हा बेसहारे किस तरह जीना।।"

उद्यान ऋषी:
"महा दुःख हुआ नैनों का, सहूँ कैसे मैं इस गम को।
अगर होता कोई बालक, तौ देता दिलासा दम को।।
निह्लाता धुलाता पीया जिमाता प्रीती से तुमको।
उठाता बिठाता ऊँगली पकर के डुलाता हमको।।"  

इसी प्रकार सांगीत "पूरमल प्रथम भाग" में राजा शंखपति के द्वारा बहुपत्नी प्रथा के सम्बन्ध में साक्ष्य देना भी उस समय समाज की सोच को दर्शाता है। 
"धर्म रजपूत क्षत्रिन के अनेकों ब्याह करते है।
जाबजा जा स्वयम्बर में बहुत सी नारी वरते है।।"

आपको समाज में फैली ऐसी कई बुराइयों के बारे में सांगीत ने अपने आपको समाज में स्थापित करने के लिए बहुत ही मुखरता के साथ अपनी बात पहुंचाई लेकिन आज सांगीत की स्थिति जिस प्रकार बदतर स्थिति में पहुँचा दी गयी की ऐसा लगता है वह अपना दम तोड़ के मानेगी। हमें अपने समाज में फ़ैली बुराइयों के बारे में मुखरता के साथ बात करनी चाहिए और समाज को आगे ले जाने में सहायक बनना चाहिए।  ऐसा नहीं है की आज समाज से सारी बुराईयाँ खत्म हो चुकी है आज भी समाज में कई बुराईयाँ मौजूद है लेकिन हम सुविधानुसार किसी का बुराई करते है तो किसी पर चुप्पी साध लेते है। हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए और उसको बचाने के प्रयास किये जाने चाहिए। 
धन्यवाद 
शशि धर कुमार

#𑂍𑂶𑂟𑂲
𑂙ॉ 𑂥𑂲𑂩𑂵𑂁𑂠𑂹𑂩 𑂍𑂳𑂧𑂰𑂩 '𑂒𑂢𑂹𑂠𑂹𑂩𑂮𑂎𑂲' 𑂍𑂵 𑂍𑂱𑂞𑂰𑂥 "𑂮𑂰𑂁𑂏𑂲𑂞 𑂍𑂵 𑂫𑂱𑂫𑂱𑂡 𑂄𑂨𑂰𑂧" 𑂍𑂵 𑂭𑂭𑂹𑂗𑂧 𑂃𑂡𑂹𑂨𑂰𑂨 𑂧𑂵𑂁 𑂪𑂵𑂎𑂍 𑂠𑂹𑂫𑂰𑂩𑂰 "𑂢𑂰𑂩𑂲 𑂫 𑂣𑂳𑂩𑂳𑂭 𑂮𑂰𑂧𑂰𑂔𑂱𑂍 𑂣𑂩𑂱𑂫𑂵𑂬 𑂧𑂵𑂁" 𑂮𑂹𑂞𑂹𑂩𑂲 𑂣𑂳𑂩𑂳𑂭 𑂍𑂵 𑂮𑂹𑂟𑂱𑂞𑂱 𑂣𑂩 𑂍𑂰फ़𑂲 𑂣𑂶𑂢𑂲 𑂢ज़𑂩 𑂮𑂵 𑂅𑂮 𑂫𑂱𑂭𑂨 𑂣𑂩 𑂃𑂣𑂢𑂲 𑂥𑂰𑂞 𑂩𑂎𑂲 𑂯𑂶 𑂌𑂩 𑂔𑂱𑂞𑂢𑂰 𑂄𑂣 𑂪𑂵𑂎𑂍 𑂍𑂷 𑂣ढ़𑂞𑂵 𑂯𑂶 𑂇𑂞𑂢𑂰 𑂇𑂢𑂍𑂵 𑂧𑂳𑂩𑂲𑂠 𑂯𑂷𑂞𑂵 𑂒𑂪𑂵 𑂔𑂰𑂞𑂵 𑂯𑂶 𑂪𑂵𑂍𑂱𑂢 𑂩𑂳𑂍𑂱𑂉 𑂨𑂯 𑂞𑂦𑂲 𑂮𑂁𑂦𑂫 𑂯𑂶 𑂔𑂥𑂞𑂍 𑂄𑂣 𑂫𑂱𑂭𑂨 𑂧𑂵𑂁 𑂍𑂱𑂨𑂵 𑂏𑂉 𑂒𑂩𑂹𑂒𑂰 𑂮𑂵 𑂮𑂁𑂥𑂁𑂡𑂱𑂞 𑂫𑂱𑂭𑂨𑂷𑂁 𑂍𑂷 𑂣ढ़𑂰 𑂯𑂷𑂏𑂰 𑂞𑂦𑂲 𑂄𑂣 𑂅𑂢 𑂥𑂰𑂞𑂷𑂁 𑂍𑂲 𑂏𑂁𑂦𑂲𑂩𑂞𑂰 𑂍𑂷 𑂮𑂧𑂕 𑂣𑂰𑂉𑂁𑂏𑂵। 𑂪𑂵𑂎𑂍 𑂍𑂰 𑂅𑂬𑂰𑂩𑂰 𑂮𑂧𑂨 𑂍𑂵 𑂮𑂰𑂟 𑂮𑂹𑂞𑂹𑂩𑂲-𑂣𑂳𑂩𑂳𑂭 𑂮𑂧𑂰𑂢𑂞𑂰 𑂮𑂵 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂍𑂵 𑂮𑂰𑂩𑂵 𑂠𑂰𑂨𑂱𑂞𑂹𑂫𑂷𑂁 𑂍𑂰 𑂦𑂰𑂩 𑂢𑂰𑂩𑂲 𑂣𑂩 𑂙𑂰𑂪 𑂠𑂱𑂨𑂰 𑂔𑂰𑂞𑂰 𑂯𑂶 𑂌𑂩 𑂨𑂯𑂲 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂧𑂵𑂁 𑂢𑂰𑂩𑂲 𑂍𑂵 𑂈𑂣𑂩 𑂮𑂰𑂧𑂰𑂔𑂱𑂍 𑂦𑂰𑂩 𑂃𑂞𑂹𑂨𑂡𑂱𑂍 𑂥ढ़ 𑂔𑂰𑂞𑂰 𑂯𑂶 𑂔𑂱𑂮𑂍𑂲 𑂫𑂔𑂯 𑂮𑂵 𑂇𑂢𑂍𑂲 𑂮𑂰𑂧𑂰𑂔𑂱𑂍 𑂮𑂹𑂟𑂱𑂞𑂱 𑂣𑂳𑂩𑂳𑂭𑂷𑂁 𑂍𑂲 𑂞𑂳𑂪𑂢𑂰 𑂧𑂵𑂁 𑂍𑂰𑂤𑂲 𑂍𑂧𑂞𑂩 𑂯𑂷𑂢𑂵 𑂪𑂏 𑂔𑂰𑂞𑂲 𑂯𑂶 𑂌𑂩 𑂪𑂵𑂎𑂍 𑂍𑂵 𑂃𑂢𑂳𑂮𑂰𑂩 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂍𑂰 𑂣𑂞𑂢 𑂨𑂯𑂲𑂁 𑂮𑂵 𑂬𑂳𑂩𑂴 𑂯𑂷𑂞𑂰 𑂯𑂶 𑂔𑂥 𑂢𑂰𑂩𑂲 𑂃𑂣𑂢𑂵 𑂪𑂱𑂉 𑂦𑂫𑂱𑂭𑂹𑂨 𑂨𑂰 𑂃𑂣𑂢𑂵 𑂥𑂒𑂹𑂒𑂷𑂁 𑂍𑂵 𑂦𑂫𑂱𑂭𑂹𑂨 𑂍𑂵 𑂪𑂱𑂉 𑂔𑂱𑂧𑂹𑂧𑂵𑂠𑂰𑂩𑂲 𑂣𑂴𑂩𑂹𑂫𑂍 𑂨𑂰 𑂎𑂳𑂪𑂍𑂩 𑂮𑂷𑂒𑂢𑂵 𑂧𑂵𑂁 𑂃𑂮𑂧𑂩𑂹𑂟 𑂍𑂩 𑂠𑂱𑂉 𑂔𑂰𑂞𑂵 𑂯𑂶। 𑂢𑂰𑂩𑂲 𑂍𑂲 𑂨𑂯𑂲 𑂃𑂮𑂧𑂩𑂹𑂟𑂞𑂰 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂍𑂵 𑂯𑂹𑂩𑂰𑂭 𑂍𑂰 𑂍𑂰𑂩𑂝 𑂧𑂰𑂢𑂰 𑂏𑂨𑂰 𑂍𑂹𑂨𑂷𑂁𑂍𑂱 𑂉𑂍 𑂮𑂧𑂨 𑂟𑂰 𑂔𑂥 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂧𑂵𑂁 𑂧𑂯𑂱𑂪𑂰𑂋𑂁 𑂧𑂵𑂁 𑂍𑂆 𑂫𑂱𑂠𑂳𑂭𑂲 𑂮𑂹𑂞𑂹𑂩𑂱𑂨𑂰𑂀 𑂯𑂳𑂆 𑂔𑂱𑂢𑂹𑂯𑂷𑂁𑂢𑂵 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂧𑂵𑂁 𑂃𑂣𑂢𑂲 𑂣𑂯𑂒𑂰𑂢 𑂓𑂷ड़𑂲 𑂟𑂲 𑂅𑂢𑂧𑂵𑂁 𑂮𑂵 𑂍𑂅𑂨𑂷𑂁 𑂍𑂷 𑂥𑂯𑂳𑂞 𑂮𑂰𑂩𑂵 𑂪𑂷𑂏𑂷𑂁 𑂢𑂵 𑂣ढ़𑂰 𑂦𑂲 𑂯𑂷𑂏𑂰 𑂔𑂶𑂮𑂵 𑂐𑂷𑂭𑂰, 𑂃𑂣𑂰𑂪𑂰, 𑂧𑂶𑂞𑂹𑂩𑂵𑂨𑂲 𑂔𑂶𑂮𑂲 𑂮𑂹𑂞𑂹𑂩𑂱𑂨𑂷𑂁 𑂢𑂵 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂣𑂩 𑂃𑂧𑂱𑂗 𑂓𑂰𑂣 𑂓𑂷ड़𑂢𑂵 𑂧𑂵𑂁 𑂍𑂰𑂧𑂨𑂰𑂥 𑂩𑂯𑂲 𑂟𑂲। 𑂧𑂡𑂹𑂨𑂍𑂰𑂪 𑂄𑂞𑂵 𑂄𑂞𑂵 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂧𑂵𑂁 𑂮𑂹𑂞𑂹𑂩𑂱𑂨𑂷𑂁 𑂍𑂵 𑂪𑂱𑂉 𑂮𑂞𑂲 𑂣𑂹𑂩𑂟𑂰, 𑂥𑂰𑂪 𑂫𑂱𑂫𑂰𑂯, 𑂥𑂵𑂧𑂵𑂪 𑂫𑂱𑂫𑂰𑂯 𑂄𑂠𑂱 𑂍𑂰 𑂣𑂹𑂩𑂒𑂪𑂢 𑂞𑂵ज़𑂲 𑂮𑂵 𑂥ढ़𑂰 𑂔𑂱𑂮𑂮𑂵 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂧𑂵𑂁 𑂢𑂶𑂞𑂱𑂍𑂞𑂰 𑂍𑂰 𑂣𑂞𑂢 𑂍𑂰फ़𑂲 𑂞𑂵ज़𑂲 𑂮𑂵 𑂯𑂳𑂄। 𑂉𑂍 𑂮𑂧𑂨 𑂄𑂨𑂰 𑂔𑂥 𑂣𑂳𑂞𑂹𑂩𑂷𑂁 𑂍𑂲 𑂅𑂒𑂹𑂓𑂰 𑂧𑂵𑂁 𑂍𑂢𑂹𑂨𑂰𑂋𑂁 𑂍𑂲 𑂯𑂞𑂹𑂨𑂰 𑂍𑂩𑂢𑂵 𑂮𑂵 𑂦𑂲 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂯𑂱𑂒𑂍𑂢𑂵 𑂮𑂵 𑂥𑂰ज़ 𑂢𑂯𑂲 𑂄𑂨𑂰।

𑂅𑂢𑂹𑂯𑂲𑂁 𑂧𑂳𑂠𑂹𑂠𑂷𑂁 𑂣𑂩 𑂪𑂵𑂎𑂍 𑂮𑂰𑂁𑂏𑂲𑂞 𑂍𑂵 𑂥𑂰𑂩𑂵 𑂧𑂵𑂁 𑂄𑂏𑂵 𑂪𑂱𑂎𑂞𑂵 𑂯𑂱𑂨𑂰 𑂍𑂲 𑂮𑂰𑂁𑂏𑂲𑂞 𑂍𑂵 𑂧𑂁𑂒𑂷𑂁 𑂮𑂵 𑂥𑂯𑂳𑂞 𑂮𑂰𑂩𑂵 𑂪𑂵𑂎𑂍𑂷𑂁 𑂢𑂵 𑂅𑂢 𑂧𑂳𑂠𑂹𑂠𑂷𑂁 𑂍𑂷 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂍𑂵 𑂪𑂱𑂉 𑂍𑂷ढ़ 𑂍𑂲 𑂮𑂁𑂔𑂹𑂖𑂰 𑂠𑂲 𑂌𑂩 𑂄𑂫𑂰ज़ 𑂇𑂘𑂰𑂢𑂵 𑂍𑂰 𑂍𑂰𑂧 𑂍𑂱𑂨𑂰 𑂌𑂩 𑂮𑂰𑂁𑂏𑂲𑂞 𑂍𑂵 𑂧𑂁𑂒𑂷𑂁 𑂍𑂵 𑂧𑂰𑂡𑂹𑂨𑂧 𑂮𑂵 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂧𑂵𑂁 𑂔𑂰𑂏𑂩𑂴𑂍𑂞𑂰 𑂤𑂶𑂪𑂰𑂢𑂵 𑂍𑂰 𑂍𑂰𑂧 𑂍𑂱𑂨𑂰। 𑂅𑂮𑂲 𑂍𑂹𑂩𑂧 𑂧𑂵𑂁 𑂪𑂵𑂎𑂍 𑂢𑂵 "𑂮𑂰𑂁𑂏𑂲𑂞 𑂯𑂩𑂱𑂬𑂹𑂒𑂁𑂠𑂹𑂩" 𑂧𑂵𑂁 𑂩𑂰𑂔𑂰 𑂯𑂩𑂱𑂬𑂹𑂒𑂁𑂠𑂹𑂩 𑂍𑂷 𑂍𑂰𑂬𑂲 𑂧𑂵𑂁 𑂃𑂮𑂹𑂣ृ𑂬𑂹𑂨 𑂩𑂰𑂔𑂰 𑂙𑂷𑂧 𑂍𑂵 𑂐𑂩 𑂣𑂩 𑂢𑂸𑂍𑂩 𑂠𑂱𑂎𑂰𑂨𑂰 𑂞𑂟𑂰 𑂅𑂮𑂲 𑂍𑂹𑂩𑂧 𑂧𑂵𑂁 𑂩𑂰𑂢𑂲 𑂞𑂰𑂩𑂰𑂫𑂞𑂲 𑂍𑂷 𑂥𑂹𑂩𑂰𑂯𑂹𑂧𑂝 𑂍𑂵 𑂐𑂩 𑂣𑂩 𑂢𑂸𑂍𑂩𑂰𑂢𑂲 𑂍𑂰 𑂍𑂰𑂩𑂹𑂨 𑂍𑂩𑂢𑂰 𑂠𑂱𑂎𑂰𑂢𑂰 𑂮𑂰𑂥𑂱𑂞 𑂍𑂩𑂞𑂰 𑂯𑂶 𑂍𑂲 𑂇𑂮 𑂮𑂧𑂨 𑂍𑂵 𑂮𑂰𑂁𑂏𑂲𑂞 𑂪𑂵𑂎𑂍 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂧𑂵𑂁 𑂄𑂏𑂵 𑂍𑂲 𑂮𑂷𑂒 𑂩𑂎𑂢𑂵 𑂫𑂰𑂪𑂵 𑂟𑂵 𑂌𑂩 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂍𑂷 𑂇𑂮𑂍𑂰 𑂫𑂱𑂍ृ𑂞 𑂩𑂴𑂣 𑂮𑂧𑂨 𑂮𑂧𑂨 𑂣𑂩 𑂠𑂱𑂎𑂰𑂞𑂵 𑂩𑂯𑂵 𑂟𑂵। 𑂅𑂮𑂍𑂲 𑂕𑂪𑂍 𑂄𑂣 𑂬𑂹𑂩𑂫𑂝 𑂒𑂩𑂱𑂞𑂹𑂩 𑂧𑂵𑂁 𑂇𑂠𑂹𑂨𑂰𑂢 𑂩𑂱𑂭𑂱𑂞 𑂌𑂩 𑂒𑂁𑂠𑂹𑂩𑂍𑂪𑂰 𑂍𑂲 𑂥𑂰𑂞𑂒𑂲𑂞 𑂧𑂵𑂁 𑂣𑂳𑂞𑂹𑂩𑂶𑂒𑂹𑂓𑂰 𑂍𑂲 𑂫𑂱𑂍ृ𑂞 𑂅𑂒𑂹𑂓𑂰 𑂍𑂵 𑂥𑂰𑂩𑂵 𑂧𑂵𑂁 𑂠𑂵𑂎 𑂮𑂍𑂞𑂵 𑂯𑂶
𑂒𑂁𑂠𑂹𑂩𑂍𑂪𑂰: 
𑂥𑂳ढ़𑂰𑂣𑂰 𑂄 𑂏𑂨𑂰 𑂣𑂹𑂨𑂰𑂩𑂵 𑂣𑂳𑂞𑂹𑂩 𑂪𑂵𑂍𑂱𑂢 𑂝 𑂉𑂍 𑂠𑂲𑂢𑂰।।
𑂢𑂶𑂢 𑂃𑂁𑂡𑂵 𑂦𑂨𑂵 𑂯𑂰𑂁 𑂥𑂵𑂮𑂯𑂰𑂩𑂵 𑂍𑂱𑂮 𑂞𑂩𑂯 𑂔𑂲𑂢𑂰।।

𑂇𑂠𑂹𑂨𑂰𑂢 𑂩𑂱𑂭𑂱:
𑂧𑂯𑂰 𑂠𑂳𑂂𑂎 𑂯𑂳𑂄 𑂢𑂶𑂢𑂷𑂁 𑂍𑂰, 𑂮𑂯𑂴𑂀 𑂍𑂶𑂮𑂵 𑂧𑂶𑂁 𑂅𑂮 𑂏𑂧 𑂍𑂷।
𑂃𑂏𑂩 𑂯𑂷𑂞𑂰 𑂍𑂷𑂆 𑂥𑂰𑂪𑂍, 𑂞𑂰𑂈 𑂠𑂵𑂞𑂰 𑂠𑂱𑂪𑂰𑂮𑂰 𑂠𑂧 𑂍𑂷।।
𑂢𑂱𑂯𑂹𑂫𑂰𑂞𑂰 𑂡𑂳𑂪𑂰𑂞𑂰 𑂣𑂲𑂨𑂰 𑂔𑂱𑂧𑂰𑂞𑂰 𑂣𑂹𑂩𑂲𑂞𑂲 𑂮𑂵 𑂞𑂳𑂧𑂍𑂷।
𑂇𑂘𑂰𑂞𑂰 𑂥𑂱𑂘𑂰𑂞𑂰 𑂈𑂁𑂏𑂪𑂲 𑂣𑂰𑂍𑂩 𑂍𑂵 𑂙𑂳𑂪𑂰𑂞𑂰 𑂯𑂧𑂍𑂷।।

𑂅𑂮𑂲 𑂣𑂹𑂩𑂍𑂰𑂩 𑂮𑂰𑂁𑂏𑂲𑂞 "𑂣𑂴𑂩𑂹𑂧𑂪 𑂣𑂹𑂩𑂟𑂧 𑂦𑂰𑂏" 𑂧𑂵𑂁 𑂩𑂰𑂔𑂰 𑂬𑂁𑂎𑂣𑂞𑂱 𑂍𑂵 𑂠𑂹𑂫𑂰𑂩𑂰 𑂥𑂯𑂳𑂣𑂞𑂹𑂢𑂲 𑂣𑂹𑂩𑂟𑂰 𑂍𑂵 𑂮𑂧𑂹𑂥𑂢𑂹𑂡 𑂧𑂵𑂁 𑂮𑂰𑂍𑂹𑂭𑂹𑂨 𑂠𑂵𑂢𑂰 𑂦𑂲 𑂇𑂮𑂲 𑂮𑂧𑂨 𑂍𑂵 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂍𑂲 𑂮𑂷𑂒 𑂍𑂷 𑂠𑂩𑂹𑂬𑂰𑂞𑂰 𑂯𑂶।
𑂡𑂩𑂹𑂧 𑂩𑂔𑂣𑂴𑂞 𑂍𑂹𑂭𑂞𑂹𑂩𑂱𑂢 𑂍𑂵 𑂃𑂢𑂵𑂍𑂷𑂁 𑂥𑂹𑂨𑂰𑂯 𑂍𑂩𑂞𑂵 𑂯𑂶।
𑂔𑂰𑂥𑂔𑂰 𑂔𑂰 𑂮𑂹𑂫𑂨𑂧𑂹𑂥𑂩 𑂧𑂵𑂁 𑂥𑂯𑂳𑂞 𑂮𑂲 𑂢𑂰𑂩𑂲 𑂫𑂩𑂞𑂵 𑂯𑂶।।

𑂄𑂣𑂍𑂷 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂧𑂵𑂁 𑂤𑂶𑂪𑂲 𑂊𑂮𑂲 𑂍𑂆 𑂥𑂳𑂩𑂰𑂅𑂨𑂷𑂁 𑂍𑂵 𑂧𑂰𑂩𑂵 𑂧𑂵𑂁 𑂮𑂰𑂁𑂏𑂲𑂞 𑂢𑂵 𑂃𑂣𑂢𑂵 𑂄𑂣𑂍𑂷 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂧𑂵𑂁 𑂮𑂹𑂟𑂰𑂣𑂱𑂞 𑂍𑂩𑂢𑂵 𑂍𑂵 𑂪𑂱𑂉 𑂥𑂯𑂳𑂞 𑂯𑂲 𑂧𑂳𑂎𑂩𑂞𑂰 𑂍𑂵 𑂮𑂰𑂟 𑂃𑂣𑂢𑂲 𑂥𑂰𑂞 𑂣𑂯𑂳𑂁𑂒𑂰𑂆। 𑂪𑂵𑂍𑂱𑂢 𑂄𑂔 𑂮𑂰𑂁𑂏𑂲𑂞 𑂍𑂲 𑂮𑂹𑂟𑂱𑂞𑂱 𑂔𑂱𑂮 𑂣𑂹𑂩𑂍𑂰𑂩 𑂥𑂠𑂞𑂩 𑂮𑂹𑂟𑂱𑂞𑂱 𑂧𑂵𑂁 𑂣𑂯𑂳𑂀𑂒𑂰 𑂠𑂲 𑂏𑂨𑂲 𑂍𑂲 𑂊𑂮𑂰 𑂪𑂏𑂞𑂰 𑂯𑂶 𑂫𑂯 𑂃𑂣𑂢𑂰 𑂠𑂧 𑂞𑂷ड़ 𑂍𑂵 𑂧𑂰𑂢𑂵𑂏𑂲। 𑂯𑂧𑂵𑂁 𑂃𑂣𑂢𑂵 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂧𑂵𑂁 फ़𑂶𑂪𑂲 𑂥𑂳𑂩𑂰𑂅𑂨𑂷𑂁 𑂍𑂵 𑂥𑂰𑂩𑂵 𑂧𑂵𑂁 𑂧𑂳𑂎𑂩𑂞𑂰 𑂍𑂵 𑂮𑂰𑂟 𑂥𑂰𑂞 𑂍𑂩𑂢𑂲 𑂒𑂰𑂯𑂱𑂉 𑂌𑂩 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂍𑂷 𑂄𑂏𑂵 𑂪𑂵 𑂔𑂰𑂢𑂵 𑂧𑂵𑂁 𑂮𑂯𑂰𑂨𑂍 𑂥𑂢𑂢𑂰 𑂒𑂰𑂯𑂱𑂉। 𑂊𑂮𑂰 𑂢𑂯𑂲𑂁 𑂯𑂶 𑂍𑂲 𑂄𑂔 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂮𑂵 𑂮𑂰𑂩𑂲 𑂥𑂳𑂩𑂰𑂅𑂨𑂰𑂁 ख़𑂞𑂹𑂧 𑂯𑂷 𑂒𑂳𑂍𑂲 𑂯𑂶 𑂄𑂔 𑂦𑂲 𑂮𑂧𑂰𑂔 𑂍𑂵 𑂍𑂆 𑂥𑂳𑂩𑂰𑂅𑂨𑂰𑂁 𑂧𑂸𑂔𑂴𑂠 𑂯𑂶। 𑂪𑂵𑂍𑂱𑂢 𑂯𑂧 𑂮𑂳𑂫𑂱𑂡𑂰𑂢𑂳𑂮𑂰𑂩 𑂍𑂱𑂮𑂲 𑂍𑂰 𑂥𑂳𑂩𑂰𑂆 𑂍𑂩𑂞𑂵 𑂯𑂶 𑂞𑂷 𑂍𑂱𑂮𑂲 𑂣𑂩 𑂒𑂳𑂣𑂹𑂣𑂲 𑂮𑂰𑂟 𑂪𑂵𑂞𑂵 𑂯𑂶 𑂯𑂧𑂵𑂁 𑂃𑂣𑂢𑂵 𑂮𑂁𑂮𑂹𑂍ृ𑂞 𑂣𑂩 𑂏𑂩𑂹𑂫 𑂯𑂷𑂢𑂰 𑂒𑂰𑂯𑂱𑂉 𑂌𑂩 𑂇𑂮𑂍𑂷 𑂥𑂒𑂰𑂢𑂵 𑂍𑂵 𑂣𑂹𑂩𑂨𑂰𑂮 𑂍𑂱𑂨𑂵 𑂔𑂰𑂢𑂵 𑂒𑂰𑂯𑂱𑂉।
𑂡𑂢𑂹𑂨𑂫𑂰𑂠
𑂬𑂬𑂱 𑂡𑂩 𑂍𑂳𑂧𑂰𑂩
#कैथी #Kaithi

Friday, 21 April 2023

संस्कृति वर्चस्व और प्रतिरोध

"संस्कृति वर्चस्व और प्रतिरोध" किताब के लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल जी ने किताब का नाम इस तरह से चुना है की आपको उसी से अंदाज़ा हो जायेगा कि लेखक पुरे किताब में क्या कहना चाह रहे है। शुरुआत होती है "हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी?" से जिससे समाज की परिस्थिति के बारे में पता चलता है। और यह समाज के बारे में लिखा गया है। मैंने जब यह किताब खरीदा था तो पता था की इसको पढ़ने के बाद विचारों में उतार चढ़ाव अवश्य होंगे और यही वजह थी की इतनी छोटी सी किताब पढ़ने में औसतन ज्यादा समय लगा क्योंकि ईमानदारी से कहूँ तो इतने विचारों के भंवर को संभाल पाना आसान नहीं क्योंकि आपको अपने  विचारों में खोखलापन साफ़ नजर आने लगता है जैसे जैसे आप इस किताब को पढ़ते जाते है उसी प्रकार आप अपने विचारों की स्थिति के बार में पता लगा पाते है। लेखक के ही शब्दों में यह किताब इतना विचारोत्तेजक है की इसे संभाल पाना मुश्किल है व्यक्तिगत तौर पर नहीं समाज आज जिन परिस्थितियों से गुजर रहा है उसको लेकर यह टिपण्णी की गयी होगी ऐसा लगता है। इसीलिए इस किताब को पढ़ने से पहले आपको अपने अंदर विचारों की एक तरफ़ा शृंखला अगर है तो फिर इस किताब को झेल पाना बहुत मुश्किल होगा। क्योंकि जितना आप आगे बढ़ते जायेंगे यह किताब आपके अपने ही विचारो की बखिया उधेड़ता महसूस होगा और कई बार आपको लगेगा की मैं क्यों इस किताब को पढ़ रहा हूँ और इससे क्या हासिल होने वाला है।  

आगे मेरी प्रतिक्रिया से पहले मैं लेखक के बारे में बताना चाहता हूँ की वैसे ही यूट्यूब पर कुछ दर्शनशास्त्र से सम्बंधित वीडियो देखने के सन्दर्भ में इनकी एक वीडियो जो हाल ही में व्याख्यान में दिया गया था सूना जो काफी हद तक मेरे विचारो को सहलाता नजर आया वैसे में तकनिकी विषय का छात्र हूँ लेकिन साहित्य और दर्शन में रूचि होने की वजह कई किताबों और वीडियोस को पढ़ना और देखना शुरू किया जो मेरे बौद्धिक विकास में सहायक हो और तब इनकी एक किताब मंगाई थी जिसके बारे में पहले ही अपना टिपण्णी दे चुका जिसका नाम है "कौन है भारत माता?" और आज यह किताब मुझे किसी और सन्दर्भ में रिफरेन्स के तौर पर मिला तो मुझे लगा की पढ़ना चाहिए अब इस किताब को पढ़ने के बाद लगता है मुझे इनकी दो और किताब है जो पढ़नी चाहिए "तीसरा रुख़" और "विचार का अनंत" शायद इन दो किताबों को पढ़ने के बाद एक अलग विचार से आगे बढ़ पाऊँ। वैसे में विचारों के मामले में रूढ़ीवादी कतई नहीं रहा हूँ लेकिन कुछ लोगों को लगता है मैं पुराने ख्यालातों वाला व्यक्ति हूँ लेकिन सबकी अपनी अपनी समझ होती है मैं किसी भी बात को तथ्य और तर्क की कसौटी पर रखकर देखनी की कोशिश करता हूँ। यही मेरी रूढ़ीवादिता है।  

आखिर किताब में ऐसा क्या है जो मैं ऐसा महसूस कर पा रहा हूँ क्योंकि इस किताब की भूमिका में एक समाजसेवी के द्वारा यह सवाल पूछना की "क्या प्रेम का प्रचार प्रसार करना भी उतना आसान है जितना की नफरत का?" किताब की भूमिका में ही लेखक यह कहते है की "समाज को बदलने की कोई भी सार्थक यात्रा खुद से आरम्भ होती है। यह आरम्भ में ही समझ लेना हितकारी होगा की भारतीय समाज की बनावट ही ऐसी है की यहाँ ना धक्कामार ब्राह्मणवाद चल सकता है ना धक्कामार गैर-ब्राह्मणवाद।" मुख्यतः लेखक इस किताब में अलग अलग लेख के माध्यम से समाज से ही सवाल करते है और कोशिश करने का प्रयास करते है की आखिर समाज से कहाँ भूल हो रही है या समाज को किस दिशा की और बढ़ना चाहिए और इन बातों की किस तरह से देखा जा सकता है। इसी क्रम इस इन प्रश्नो पर कुछ सोच विचार हो सके। इन विचारों के माध्यम से लेखक चाहते है की समाज इन प्रश्नो पर गंभीरता से विचार करे और समझे की समाज की दशा और दिशा क्या होनी चाहिए। और इसको तय करने के लिए सिर्फ वे ही जिम्मेदार नहीं है पुरे समाज को मिलकर इसकी जिम्मेदारी उठानी होगी। 

किताब में अलग अलग लेख जिसमें मुझे जो पसंद आये वे है ".... और क्या होंगे अभी?", "प्रामाणिक भारतीयता की खोज", "इस माहौल में विवेकानंद", "सीता शम्बूक और हम", "घुप अँधेरे में छोटी-सी लालटेन", "खड़े रहो गांधी", "जातिवादी कौन" आदि। एक समाज के रूप में "हम" का बोध गहरे आत्म-मंथन का विषय है और "हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी" मैथिलि शरण गुप्त की प्रसिद्द पंक्ति के रूप में इस "हम" का आत्म मंथन की व्यंजना करवाती है। और यही लेखक अपनी लकीर खींचने का प्रयास करते है कबीर को आगे रखकर उनके शब्दों में की "यह कड़वी सच्चाई है की 'हम सब' के 'हम' और 'सब के बीच बहुत फर्क था, कबीर उसी समाज के अंग थे, जिसकी पीड़ा उनके दोहों में दिखती भी थी, जैसे 'तू बाम्हन मैं काशी का जुलहा' और 'हम तो जात कमीना' जैसे शब्दों का ताना बाना उसी दर्द का हिस्सा है। अंग्रेजी हमारी बौद्धिक बनावट की भाषा है भावनात्मक बनावट की नहीं, जैसे की आज भी अगर कोई अपनी बात अंग्रेजी में कहता है तो ऐसा लगता है की काफी बड़ा बुद्धिजीवी है और लेखक भी इस बात को समझे बिना नहीं रह पाते है और कहते है की आज भी हमारे यहाँ ऊँचे दर्जे का चिंतन अंग्रेजी में होता है और जनता देशी भाषाओं में काम चलाती है।  ठीक उसी प्रकार कई संस्कृत नाटकों में आप संभ्रांत किरदारों को संस्कृत में संवाद बोलते पढ़ते है लेकिन आम जन-मानस की भाषा प्राकृत होती है। हमें 'हम' से जरुरत ऐसे भारतीय आत्म-बोध की है जिसमे 'हम' की आकांक्षाओं को ही नहीं 'सब' की व्यथाओं को भी धारण करने की सामर्थ्य हो।

विचारों का भंवर ऐसा नहीं हो की किसी विचार को सिर्फ उसके इरादे भर से मान लिया जाए, उस विचार की परख उसकी सच्चाई, परम्परा और समाज में सभी लोगो द्वारा उन मूल्यों को बल दिया गया हो। इस प्रसंग में कबीर के प्रति स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के विचार को पढ़ने योग्य बताया गया है। यदि सभी मनुष्य ब्रह्म के ही रूप है और जीवन ही ईश्वर का रूप है तो एक तरफ चींटी को आटा खिलाना और दूसरी तरफ उसी मानव जीवन के दूसरे अंग से दुरी क्यों? जैसे गाँधी कहते है की सत्य और हिंसा का सिद्धांत इतना पुराना होने के बावजूद यह हर काल में सृष्टी के साथ चलता चला आ रहा है। तो सत्य सिर्फ एक आतंरिक खोज का हिस्सा नहीं हो सकता है उसे सामाजिक खोज का हिस्सा भी बनाना पड़ेगा। हमें अपना विवेक किसी भी ऐसे विचार या व्यक्ति के हवाले नहीं करना चाहिए जो सिर्फ यह चाहता है की उनके ही विचार सुने और पढ़े जाय, फिर सत्य और अहिंसा की खोज सामाजिक तौर पर नामुमकिन है। अगर आप विवेकानंद को धार्मिक कहते है उनके कहे कुछ वाक्यों पर ध्यान देने की जरुरत है जैसे "भूखे के सामने भगवान् पेश करना उसका अपमान है।", "धर्म का सामाजिक नियमों से क्या प्रयोजन?", "धर्म को कोई हक़ नहीं की वह समाज के नियम गढ़े।" आदि। लेकिन आप विवेकानंद को राजनैतिक भी नहीं बोल सकते है क्योंकि उनका राजनीती से दूर दूर का कोई वास्ता नहीं था तो ऐसे वक्तव्यों से वे क्या कहना चाहते थे। वे हम सबको आत्म अवलोकन करने ही कह रहे थे की जिस जंजाल से आप और आपका समाज आगे नहीं बढ़ पा रहा है उससे आपको छुटकारा पाने की आवश्यकता है। 

समाज में स्त्री की पवित्रता ऐसी चीज है जिसे जांचने का और परखने का हक़ सिर्फ सामाजिक सत्ता को है। उस सत्ता को जो स्त्री को देवी कहकर पुकारता तो है लेकिन समय मिलने पर उसकी अग्नि परीक्षा लेने से भी नहीं चुकता है। स्त्री को ही अपने शरीर, मन और व्यक्तित्व पर अधिकार नहीं है। ऐसा लगता है परम्परा से सत्ता आयी वो भी पुरुष प्रधान तंत्र के हिस्से लेकिन मर्यादा की जिम्मेवारी सिर्फ स्त्री के हिस्से। प्रगतिशील उदारपंथी बुद्धिजीवी किसी भी समस्या को स्वाभाव से मुद्दों पर रेखांकित करने का काम नहीं कर पाते है वे केवल प्रतिक्रिया देकर अपनी इतिश्री कर लेते है। आजकल हर ऐसी बातो को राष्ट्रीय गौरव, समाज की इज्जत आदि से पुकारकर या बोलकर इसे एक रूप में रंगने का प्रयास लगातार होता रहता है। परिभाषाओं पर एकाधिकार रखने वाली सत्ता की निगाह में अभी भी चाहे वो स्त्री हो या कामगार समाज उसकी हैसियत क्या है किसी से छुपी नहीं है। गाँधी का रामराज्य का मतलब था समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति के आँख के आंसू पोछे जाय। और इसी को जादू की पुड़िया कहकर बाबू जगजीवन राम को भी यही समझाने का प्रयास किये थे। राजनीती तो ऐसे सवालों पर हमेशा चुप्पी साधकर अपनी मौन स्वीकृति तो दिखा ही देता है और उसकी मज़बूरी भी है। कभी कभी लगता है स्त्री का व्यक्तित्व अर्जन की समस्या किसी सभ्यता परम्परा के उदार और सहिष्णु होने अथवा न होने भर की समस्या हो। 

ऐसी ही कई समस्याओं पर ध्यान आकृष्ट करना मुझे लगता है पुरुषोत्तम अग्रवाल जी का प्रयास सफल माना जाना चाहिए और मैं उनको धन्यवाद देना चाहता हूँ ऐसी विचारोत्तेजक किताब हम जैसे पाठकों के बीच लाने के लिए। 

धन्यवाद 
शशि धर कुमार

Saturday, 4 March 2023

रुकतापुर...

रूकतापुर मतलब रुकने वाली जगह लेखक ने बड़ा अच्छा नाम सोचा बिहार के सन्दर्भ में यह किताब काफी तथ्यों के साथ एक ऐसा विवरण है जो एक पत्रकार के लिए अपने घुमन्तु जीवन में कई बार आ सकती है और यह किताब उसी का परिणाम है वैसे बिहार से कई बड़े पत्रकार हुए जिन्होंने राष्ट्रीय पटल पर अपना नाम अंकित किया है लेकिन अगर उन्हें ध्यान से देखे तो उन सभी का अपना एक ईको सिस्टम रहा जिसके अंदर वे पूरी तरह फले फुले, ऐसा नहीं कह सकते है की उनमे योग्यता नहीं होगी अवश्य होगी तभी इतना दूर तक आ पाए लेकिन अगर आप उस ईको सिस्टम के बाहर वाले पत्रकारों के बारे में ढूंढने का प्रयास करेंगे तो आपको नहीं के बराबर मिलेगा। 

खैर आते है किताब पर रुकतापुर काफी अच्छा नाम लगा जो हटकर भी है और संकेतात्मक भी है जो बिहार जैसे राज्य के लिए ऐसा लगता है पूर्णतः सत्य है जैसे मैं पहले भी कहता रहा हूँ की कोई भी लेखक बामुश्किल ही बिना पक्षपात के कोई किताब या लेख लिख पायेगा। यह किताब वाकई में अगर आप तथ्यात्मक रूप से देखे तो बिहार के सन्दर्भ में कई अच्छी बाते और कई ऐसी बातों के बारे में भी बात करता है जिससे लगता है की यहाँ पक्षपात हो गया। किताब की शुरुआत सुपौल जिले से शुरू होती है जिसमे कई ऐसी बाते दर्शाई गयी है जिससे लगता है बेकारे बिहार में रहते है काहे नहीं बिहार छोड़कर कही और बस जाते है लेकिन अपने जमीन से उखड़कर दूसरे जगह बसना आसान नहीं होता है। जिस सुपौल की किताब में बात की गयी है आज भी बड़ी लाइन बनने के बाद इस जगह की स्थिति में आमूल चल परिवर्तन हुआ हो ऐसा नहीं लगता है हाँ बस इतना जरुर हुआ है की किताब में लेखक को जितना समय यात्रा में लगा अब वो नहीं लगता है "क्या कीजियेगा, बैकवर्ड इलाका है न...."। पटना में अगर कोई एक महीना रह ले और सुपौल या सहरसा या मधेपुरा या अररिया या फॉरबिसगंज या कटिहार कोई घूम ले तो लगेगा कौन बियांबान में आ गए है यही हकीकत भी है आज के बिहार की। लेखक के अनुसार ही अगर बातों को आगे बढाए तो पीएनएम मॉल, म्यूजियम, सभ्यता द्वार या ज्ञान भवन घूम आइये तो लगता है पेरिस पहुँच गए लेकिन कोसी कछार, गया और मुजफ्फरपुर शिवहर, सीतामढ़ी के गाँवों में जाइएगा तो आज भी बलराज साहनी की "दो बीघा जमीन" की याद आएगी। 

बिहार की स्थिति ऐसी है की एक तरफ यूपीएससी, आईआईटी, मेडिकल और आईटी में यहाँ के छात्र झंडा फहरा रहे है वही आज भी मुजफ्फरपुर में जब चमकी बुखार का प्रकोप आता है तो बच्चे किस प्रकार मरते है किसी को पता ही नहीं चलता कि क्या हो रहा है। बिहार के सभी पिछड़े जिलों से देश के बड़े बड़े शहरों को जाती ट्रेने बिहार की बदहाली की दशा बताती है लगभग इस किताब में यही कहते मिलेंगे लेखक महोदय, जो लगता है की सही भी है। यह सिर्फ ट्रैन की बात नहीं है बसों की हालात भी लेखक के शब्दों में कहे तो यहाँ भी कम रुकतापुर नहीं है लेखक महोदय को पूर्णिया से पटना आने के दौरान दोपहर दो बजे पूर्णिया से चलने वाली बस मुजफ्फरपुर शाम के ८ बजे पहुँच गयी और वहां से पटना ८० क़ीमी तय करने में साढ़े छह घंटे लग गए हालाँकि लेखक महोदय ने इसके भी भरसक लगने वाले कारण तो जरूर बताये है लेकिन सरकार को लपेटे में लेना नहीं भूले की सरकार बिहार के हर जिले से अधिकतम ५ घंटे में पहुँचने की सरकार के दावे की पोल खोल दिए। लेखक महोदय को सहरसा, समस्तीपुर,मधुबनी, जयनगर, दरभंगा,सीतामढ़ी, कटिहार और मुजफ्फरपुर से मजदूरों के पलायन की संख्या को हजारो में लिखा है और सही भी लगता है क्योंकि इन क्षेत्रो से दिल्ली और पंजाब की तरफ जाने वाली गाड़ियों में आपको जगह मुश्किल से मिलती है इसी क्रम में लेखक को एक युवक मिलता है जिसके दादा कभी पंजाब मजदूरी करने जाते थे फिर उसके पिताजी गए और अब वह जा रहा है। कोरोना में जब बिहार ट्रैन आ रही थी तो सरकारी आंकड़े के हिसाब से ३० लाख मजदुर वापस आये थे यही संख्या काफी कुछ कहता है लेकिन सरकार अपने अपने आंकड़े से बिहार को अग्रणी राज्यों में बताना नहीं भूलती है। 

किताब के दूसरे भाग के "घो-घो रानी, कितना पानी" से शुरुआत करते है तो यह बताना नहीं भूलते है की २८ सितम्बर २०१९ को पटना जो बिहार की राजधानी है किस प्रकार जलमग्न हो गयी और चारो तरफ त्राहिमाम मची हुयी थी और तत्कालीन उप मुख्यमंत्री के घर तक में पानी घुस गया था और ऐसी कई हस्तियां थी जिन्हे उस समय काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था प्रख्यात गायिका शारदा सिन्हा जी की फोटो हम सबने सोशल मीडिया पर देखा ही होगा। उस भयावहता को देखने के बाद विश्व विख्यात लेखक रेणु जी का १९७५ में लिखा गया पटना के बाढ़ पर ही रिपोर्ताज पढ़ने पर अक्षरश वही नजर आने लगा था। लेखक सिर्फ रुकतापुर को आगे बढ़ाने के लिए यही नहीं रुकते है वे कोशी के बारे में भी बात करते है अगर आपने कोशी डायन नाम से रेणु की रिपोर्ताज पढ़ी होंगी तो इन लेखक महोदय के अनुभव भी कम नहीं है कोशी की विभीषिका को लेखक जी ने कोशी के वटवृक्ष नाम से भी एक किताब लिखी है उसको पढ़कर अंदाजा लगाया जा सकता है इस किताब में कोशी की विभीषिका पर थोड़ा संक्षेप में बातें कही गयी है लेकिन कही गयी है और अगर आप कोशी या सीमांचल क्षेत्र से आते है तो आपको यह आपकी अपनी कहानी लगेगी जो यहाँ के लोग हर साल झेलते है। दरभंगा के सूखते तालाब और बिगहा क्षेत्र में पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड की अधिक मात्रा में मिलना और उस दूषित पानी के पीने से होने वाली मानवीय क्षति से तो बिना संवेदना वाला व्यक्ति भी काँप जाए। 

भुखमरी, कुपोषण, चमकी जैसी ऐसी कई समस्याओं के बारे में लेखक महोदय में बड़ी अच्छी विवेचना की है। मखाना फोड़ने की विधि से लेकर इन मजदूरों के साथ आने वाली दिक्कतों का भी काफी बारीकी से जिक्र किया है। किताब के अनुसार बिहार के जनगणना २०११ के अनुसार ६५ फीसदी ग्रामीण आबादी भूमिहीन और इसके सबसे ज्यादा संख्या पिछडो और दलितों की है, इसी क्रम में सरकार भूमिहीनों के लिए जो कार्यक्रम चलाती है उन्हें कागज भी मिल जाते है लेकिन उनको वास्तविक अधिकार नहीं मिल पाता है। बेरोजगारी भी एक बड़ी समस्या है जिसकी वजह से यहाँ के युवा अपने लिए रोजगार की तलाश में थक हारकर बाहर की राह पकड़ते है। 

अगर आप बिहार से है तो आपको यह किताब अवश्य पढ़नी चाहिए ताकि आपको अंदाजा हो की बिहार के कितने रुकतापुर है जो बिहार के वास्तविक विकास की गति पर रोक लगाए हुए है। लेखक महोदय का धन्यवाद। 

धन्यवाद 
शशि धर कुमार 

Sunday, 5 February 2023

बींसवीं गाँठ

यह उपन्यास राजेश वर्मा जी द्वारा लिखित है जिसकी पृष्टभूमि बौद्धकालीन संगीति और एक पति का पत्नी के प्रति प्रेम को दर्शाता हुआ एक ऐसा उपन्यास है जो बौद्धकालीन समाज के बारे में दर्शाता है। 

इस उपन्यास का कथानक अंग देश के चम्पा के एक ग्राम के रहने वाले शिव का अपने पत्नी के प्रति प्रेम और बौद्ध भिक्खु बनने के बीच में जो मन में प्रश्न उठते है जिसके भँवर में उपन्यास के आखिरी हिस्से में ही बाहर आ पाता है। इसको पढ़ते हुए आपको लेखक अपनी लेखनी से बौद्धकालीन समाज में लेकर जाने में सफल होते है और आपको लगने लगता है कि आप भी उपन्यास के मुख्य पात्र शिव के साथ साथ चलते हुए चम्पा से चलते हुए बौद्ध संगीति के लिए वैशाली पहुँचते है और फिर वापस भी आते है। शिव एक ऐसा पात्र है जो अपनी पत्नी से बीस दिन के लिए बीस गाँठ के रूप में पत्नी को दिए अपने वचन को पूरा करने के लिए पूर्णतः समर्पित दिखता है। लेकिन उस समय की सामाजिक परिस्थिति जो एक आम इंसान को उस सामाजिक ढाँचे से बाहर निकलने को उद्देलित करता है कि कैसे वह इस सामाजिक बंधनो में जो भेदभाव है उससे निकलने को छटपटाता है यह दर्शाती है। इसी उहापोह की स्थिति से निकलने के लिए शिव बौद्ध भिक्खु होने का रास्ता चुनता है जहाँ किसी भी प्रकार का ना कोई सामाजिक बंधन है ना ही किसी प्रकार का अवांछित बंधन। इसी छटफटाहट से निकलने के लिए वह बौद्ध भिक्खु तो बन जाता है लेकिन उसका अपने पत्नी के प्रति प्रेम से वह बाहर नही निकल पाता है। जबतक आप किसी धर्म में है आपको किसी ना किसी प्रकार का ऐसा बंधन बाँधे रखता है जो है ही नही लेकिन कभी कभी आपको लगता है कि यह कैसा बंधन है जो ना चाहते हुए भी मानना पड़ता है और उसके मुताबिक चलना पड़ता है। मुझे लगता है यह उपन्यास कहानी के मुख्य पात्र शिव के अंदर भी इसी छटफटाहट का नतीजा है जिससे वह बाहर निकलना चाहता है। 

वह उसी सामाजिक बंधन से निकलने के लिए रास्ते के बारे में सोचता है और इसके लिए पूरा प्रयास भी करता है लेकिन वह भिक्खु बनने के बाद भी एक सामाजिक बंधन जो उसका अपने पत्नी के प्रति है उससे नही निकल पा रहा है। और यह स्वाभाविक भी है की आप जिस समाज के साथ जीते है उसके आस पास बहुत सारी सामाजिक परिस्थितियाँ आपको अपने अंदर समाए रहती है। आप उससे बमुश्किल निकल पाते है। 

लेखक का कहानी के प्रति बंधन यह बताता है कि एक सटीक कथानक कितनी ही पुरानी पृष्टभूमि हो लेकिन कहानी पाठकों को जोड़ने में सफल हो पाती है। एक साहित्य प्रेमी होने के नाते यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी बहुत ही सुंदर और सुव्यवस्थित तरीके से संजोया गया है जो आपको उस समयकाल के बारे में बहुत सी ऐसी बातों से अवगत कराता है जिसको जानने के लिए आपको इतिहास की किताबों को खंगालना पड़ता है। 

एक बार फिर से लेखक महोदय का धन्यवाद।

शशि धर कुमार

Friday, 6 January 2023

कोशी के वटवृक्ष

यह किताब मैंने 2022 के पूर्वाध में मंगाई थी लेकिन एक चैप्टर बाद यह रह गयी थी तो मैने सोचा कि साल के शुरुआत में ही इसको पढ़ लिया जाय। यह कहानी सुपौल जिले के उन बुजुर्गों की है जिनका 2008 के कोशी के बाढ़ में सब कुछ छीन गया। पुष्यमित्र जी लिखित यह किताब काफी रिसर्च और आँकड़ो पर आधारित है। 

2008 के बाढ़ के बाद सुपौल जिले के इन बुजुर्गों का घर बार सब कुछ छीन गया यहाँ तक कि रिश्तों की गर्माहट को भी कोशी के बाढ़ में बहकर आये रेतों ने पूरी तरह ढँक दिया था। जब चारों ओर अँधेरा हो तो चाहे उम्र कोई भी हो लोग उजाला ढूँढने का प्रयास ही करते है यही मानव जीवन है भले कोशी ने 1954 के बाद 2008 में कोशी डायन का रूप लेकर सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया, अररिया में जिस तरह की विभीषिका देखी वह दशकों में एक बार देखने को मिलती है। 

यह विभीषिका इतनी बड़ी थी कि तत्कालीन केंद्र की सरकार को इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करना पड़ा। राष्ट्रीय आपदा घोषित करने से ऐसी विभीषिकाओं में सब कुछ खो चुके लोगों को कितना फायदा पहुँचता है यह तो समय ही बताता है लेकिन ऐसी आपदाओं से लोग खुद ही किसी तरह निकलते है चाहे तमिलनाडु का सुनामी झेल चुके लोग या उत्तराखंड की त्रासदी झेल चुके लोग हो आखिरकार उन्हें खुद ही अपने लिए रास्ता निकालना होता है ऐसी त्रासदियों से बाहर निकलने का। सरकारी योजना कुछ जगह पहुंचती तो है लेकिन अधिकतर जगह यह भ्रस्टाचार की भेंट चढ़ती हुई दिखाई पड़ती है। सुपौल में लोगों ने हेल्पेज इंडिया की मदद से बुजुर्गो ने न सिर्फ अपने आप को खड़ा किया बल्कि ऐसे कई सामाजिक बुराइयों से बाहर निकलकर समाज में एक उदाहरण पेश किया जो यह साबित करता है कि बुजुर्ग चाहे किसी उम्र के हो उन्हें अगर थोड़ी सी भी सहायता मिले तो वे पहाड़ भी चढ़ सकते है। यही सुपौल जिले के इन बुजुर्गो ने कर दिखाया। जब आदमी के पास खोने को कुछ नही रहता है तब वे ज्यादा जोश के साथ अपनी ही गलतियों के साथ सीखते हुए आगे बढ़ते है यही इन बुजुर्गो ने किया। जब इन्हें लगा कि अब इनका साथ सबने छोड़ दिया है यहाँ तक कि उनके परिवार वाले भी इन्हें बोझ समझने लगे तो इसी अंधेरे में हेल्पेज इंडिया इनको एक तरह से रोशनी दिखाने की कोशिश करती है। लेकिन जब आप ऐसे सामाजिक कार्य को हाथ मे लेते है यह हमेशा से होता आया है कि समाज के वे लोग जिनके स्वार्थो पर ऐसे कामों से कुठाराघात होता है वे आपका हर संभव विरोध करते है। भले ही लेखक इस किताब के माध्यम से कुछ चीजों पर पर्देदारी की हो लेकिन मैं भी संयोगवश उसी कोशी की विभीषिका देखने वालों में से हूँ जो हर साल इस मंजर को देखता है चाहे कम स्तर पर हो या बृहद स्तर पर। 

इस कहानी में हर किरदार अलग है अलग पृष्ठभूमि से आता है अलग अलग जाति समुदाय या अलग अलग धर्मो के लोग एक मंच पर आकर इन बुजुर्गो ने न सिर्फ अपनी जमीन तैयार की बल्कि इस इलाके के युवाओं में जो दिल्ली पंजाब जाकर काम करने की रफ्तार थी उसपर भी रोक लगाया। इससे मजदूरों का पलायन रुका, साथ में परिवार के लोगों ने इन बुजुर्गों को एक एसेट की तरह देखना शुरू किया। और बुजुर्गों ने भी इतना होने के बाद भी अपने बच्चों को वापस मुख्यधारा में लाने का हर संभव प्रयास किया चाहे वह बुजुर्गों का मान सम्मान करना हो या बुजुर्गों द्वारा अपने बच्चों के लिए रोजगार के द्वार खोलना, दोनों तरफ से एक दूसरे को समझने की भरपूर कोशिश हुई और आज इस ग्राम सहायता समूह ने अपना एक रजिस्टर्ड संस्था बनाया है जिसमें सुपौल, मधुबनी और दरभंगा जिले के लगभग 6000 बुजुर्ग इससे जुड़कर 6000 परिवारों की जिंदगी में बदलाव लाने का हरसंभव प्रयास हो रहा है। आज यह ग्रुप इतना सक्षम है कि किसी भी तरह की प्राकृतिक विपत्ति आने पर ये लोग अपना कर्ज चुकाने के नाम पर अनाज , पैसा और पशुओं के लिए भी चारे का इंतजाम करते है। क्योंकि इन्हें लगता है जब इनपर विपत्ति आयी थी तो देशभर के लोगों ने इनकी मदद की थी और यह इनपर एक कर्ज है जो उतार तो नही सकते है लेकिन उसके हिस्से को कम अवश्य करते है यही वजह है जब उत्तराखंड में त्रासदी आयी थी तो इस ग्रुप ने 5 लाख 40 हजार रुपैया यह कहकर दिया कि इसे दान ना समझा जाए यह उनपर कर्ज है जो वे इस मदद के साथ इसको कम करना चाहते है। ऐसा ही जब 2019 में मधुबनी में बाढ़ आई थी तो इस ग्रुप ने 2500 परिवारों के लिए सूखा राशन और 25 क्विंटल पशुओं के लिए चारा भी भेजा था। आप कल्पना कीजिये यह ग्रुप ऐसे उम्र के लोगों की है जिसे उम्र के इस पड़ाव में रिटायर्ड मान लिया जाता है और वे आज 6000 परिवारों के लिए एक मिसाल बन रहे है जो उम्र के आखिरी पड़ाव में जीवन जीने के तरीके को समझने का प्रयास कर रहे है साथ में कई लोगों के जीवन मे बदलाव भी ला रहे है। लेखक Pushya Mitra जी का धन्यवाद इतनी बढ़िया और प्रेरणादायक कहानी समाज के बीच में लाने के लिए। 

धन्यवाद।

शशि धर कुमार

Saturday, 31 December 2022

एकलव्य...डॉ महेश मधुकर

 

रुहेलखंड क्षेत्र के प्रतिष्ठित कवियों में से एक डॉ महेश मधुकर जी की इस काव्यात्मक प्रस्तुति को मुझे डॉ बीरेंद्र जी ने सुझाया तब मैंने पूछा कि मुझे किताब कैसे मिलेगी तो उन्होंने डॉ महेश जी का नंबर भेजकर कहा बात करो वे पुस्तक भेज देंगे और नंबर मिलते ही जब मैंने उनसे बात की तो उन्होंने कहा कि मैं कल ही सप्रेम आपको पुस्तक भेज दूँगा और सच में ही तीन दिन के अंदर ही मुझे पुस्तक मिल गई। जब मैंने पुस्तक को पढ़ना शुरू किया तो मुझे समझ ही नहीं आया कि इतनी जल्दी खत्म कैसे हो गई। 


काव्यात्मक शैली की पहली किताब थी जिसे मैं पढ़ रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था की आखिर क्या सोचकर डॉ महेश मधुकर जी ने यह किताब लिखा होगा। तो इसके पीछे की मंशा को समझने के लिए कविता में जो दर्द उकेरा गया है उसे समझने की आवश्यकता पड़ेगी तभी समझ पाएंगे की इसके पीछे की भावना क्या रही होगी। एकलव्य एक ऐसी कृति है जो अपने कविता माध्यम से आपको अपने समय में लेकर जाती है और आप उन सभी दृश्यों को अपनी आँखों से देखना शुरू करते है ऐसा लगता है जैसे सामने चलचित्र चल रहा हो। यह महाभारत काल से सम्बंधित पौराणिक काव्य है जो गुरु शिष्य की महत्ता पर प्रकाश डालता है। इसके माध्यम से आप शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण के साथ साथ एकलव्य का गुरु के प्रति असीम भाव भी देखने को मिलता है।   

यह एक ऐसा खंडकाव्य है जो आपको शिक्षा और समता मूलक समाज के लिए संघर्ष की गाथा कहता है। एक-एक छंद में आपको करुणा, दया, प्यार और गुरुभक्ति भी मिलता है जो अटूट है। इसमें एक जगह कवि एकलव्य के पिता और समाज के बारे में कहते है:

स्वस्थ सुखी सारा समाज था,

जनता, राजा, रानी। 

भील हिरण्याधनु था शासक,

वीरव्रती सद  ज्ञानी।

इस छंद से कवि का आज के प्रति सामाजिक चेतना झलकती है की राजा और प्रजा को कैसा होना चाहिए। 


इसी  भाग में कवि सामाजिक चेतना को स्पष्ट रूप से दर्शाते हुए लिखते है:

ऊँच -नीच गोरे - काले का,  

भेद नहीं था उनमें। 

और किसी के लिए तनिक भी ,

द्वेष नहीं था मन में। 

इस छंद में कवि का समाज कैसा हो रहा है इसे दर्शा पा रहे है और हम पुरे समाज को सोचना है की एक समाज के तौर पर हम कहाँ जा रहे है किस और जा रहे है कही हम किसी ऐसे ओर तो नहीं जा रहे है जहाँ से हम वापस आने का भी सोचे तो आ नहीं पाए। 


दो भागों में बँटे इस खंडकाव्य के पहले भाग पूर्वार्ध में ही जब एकलव्य गुरु द्रोण से शिक्षा पाने की जिद करते है तो कवि एकलव्य के पिता के शब्दों में सामाजिक पहचान से अपने बच्चे को निम्न छंदो से समझाने का प्रयास करते है:

कहा पिता ने पुत्र! तुम्हे वे,

कभी न अपनाएंगे। 

निम्न जाति का जान करें,

अपमानित ठुकरायेंगे। 

यह समस्या आज भी ज्यों की त्यों बनी हुयी है जिसका कोई तोड़ नहीं दिख रहा है लेकिन आपके बच्चे जैसे एकलव्य यह समझकर गुरु द्रोण से शिक्षा लेने जाता है वैसे ही आज के बच्चे भी समाज के कई अर्थो को लेकर इसी तरह का एक पिता की भूल समझते है जिसे वे सामाजिक रूप से वे तबतक नहीं समझ पाते जब वे खुद इसके भुक्तभोगी नहीं हो जाते है। आधुनिक पीढ़ी को इस किताब से जीवन मूल्यों को समझने में सहायता अवश्य मिलेगी अगर वे इन कविताओं में छिपे मर्म को समझ पाए तो वे इस तकनीक के युग में कही भी छल और कपट से छले नहीं जा पाएंगे। आज जिस तरह से युवाओं के मन में भटकाव है शायद इस छंद रूपी कविताओं को पढ़ने के बाद वे नए विश्वास और सृजनात्मकता से विश्व में कदम से कदम मिला कर चल पाएंगे। 


मैं आज की युवाओं से आग्रह करूँगा की वे इस किताब को जरूर पढ़े और आत्मसात करने की कोशिश करें। 
धन्यवाद
शशि धर कुमार

Friday, 30 December 2022

एटकिन का हिमालय

विस्तृत यात्रा वृतांत पढ़ने का मेरा यह पहला अनुभव है जो अंग्रेजी में लिखे "Footloose in the Himalaya" का हिंदी अनुवाद "एटकिन का हिमालय" के नाम से हृदयेश जोशी जी ने अनुवादित किया है। हृदयेश जोशी जी के बारे मेरी समझ सिर्फ इतनी है कि एक सुलझे हुए पत्रकार जो वातावरण से संबंधित लेखों पर खूब काम किया है और जब भी मौका मिला चाहे TV के माध्यम से या किसी और माध्यम से उन्हें पढ़ना या सुनना हमेशा अच्छा लगा। एक ऐसा व्यक्ति जो पर्यावरण को लेकर इतना सजग है जो इसके ऊपर बात करने से कभी भी नही हिचका। आज भी उनके रिपोर्ट और लेख पर्यावरण से संबंधित जब भी पढ़े या सुने हमेशा आँखे खोलने वाला होता है। एक लाइन में अगर आप इनके व्यक्तित्व की बात करे तो ऐसा पर्यावरणवादी है जो पहाड़ो को लेकर पहाड़ में रहकर उसके बारे में ज़मीनी हक़ीक़त बताने वाला है। 

एटकिन का हिमालय किताब ऐसी पहली किताब है जिसके 348 पन्ने को मैंने तकरीबन 10 घंटे में समाप्त किया। मैंने अपने जीवन में बहुत सारे किताब और रिपोर्टें पढ़ी है लेकिन आधुनिक उपन्यास के नाम पर मैंने कुछ भी नही पढ़ा है हाँ साहित्यिक तौर पर जिसे आप क्लासिक की गिनती में रखते है उसको पढ़ने की एक लंबी फेहरिस्त अवश्य है तो मैं अपने पढ़ने की गति को भली भांति समझता हूँ। इसीलिए इस किताब को 10 घंटे में खत्म करना (अपने काम को करते हुए) मेरे लिए बहुत ही आश्चर्यजनक रूप से खुशी प्रदान करने वाला है। किसी को लगता है कि यह गति कुछ भी नही तो मैं समझ सकता हूँ। 

यह किताब मुझे पहाड़ को समझने में काफी मदद करने वाली साबित होगी क्योंकि यह किताब सिर्फ उत्तराखंड के पहाड़ो को लेकर नही है यह यात्रा वृतांत कश्मीर के डल झील से लेकर अरुणाचल के तवांग घाटी तक कि लगातार निरंतर कई दशकों की यात्राओं का एक अद्भुत संकलन है। यह उन सभी सहायकों को समर्पित यात्रा वृतांत है जो आपको पहाड़ो पर अपने यात्रा के दौरान वहाँ के मौसम, रास्तों, नदी और नालों के दोनों पक्षों को समझने में भी मदद करता है। यह पहाड़ के उन खुशनुमा जीवन से भी आपको रूबरू करवाता है जिसके बारे में पहाड़ी यात्रा में आप सोच भी नही सकते है। पहाड़ी यात्रा को सुगम बनाने के लिए आपके हमराही जो हमेशा आपकी यात्रा में साथ नही होते है उनके बारे में भी यह विस्तार से बताता है। यह एक आत्मकथात्मक शैली में लिखा एक ऐसा यात्रा वृतांत है जो आपको हिमालय के विहंगता के बारे में विस्तार से बताने की कोशिश करता है। इस यात्रा वृतांत से आप हिमालय की क्रूरता के साथ साथ उसके दयालुता के भी कायल हुए बिना नही रह पाएंगे। लेखक का हिमालय के लिए शिवालय या नंदा देवी पर्वत के लिए माई जैसे शब्दों का उपयोग हिमालय और प्रकृति के प्रति उनका अथाह प्रेम दर्शाता है। उनके इस यात्रा वृतांत से आपको महसूस होगा कि स्कॉटलैंड में जन्मा बच्चा कोलकाता होते हुए जब पहली बार पहाड़ी जमीन पर पैर रखता है तो उन्हें लगता है यही उनकी आखिरी पसंद है, यह एक अध्यात्म से जुड़े व्यक्ति के लिए ही संभव है। यहाँ अध्यात्म का मतलब पाखंड भरा पूजा पाठ से कतई नही है। इसके बारे में कई बार लेखक ने अपने इस यात्रा वृतांत के माध्यम से हल्के शब्दों में ही सही लेकिन काफी मजबूत तरीके से रखने का भरपूर प्रयास किया है। इस यात्रा वृतांत में आप पहाड़ की हर अच्छी बात से लेकर ऐसी और भी कई बातों से रूबरू होते है जिसके बारें में कुछ लोगों को अच्छा नही लगेगा, लेकिन लेखक ने बड़ी मजबूती और ख़ूबसूरती के साथ हर बात को रखा है जिसको उन्होंने महसूस किया और देखा या सुना। मेरा झुकाव पिछले कुछ सालों में साहित्य से लेकर भाषा को जानने की ललक के बीच ऐसे कई किताबें या रिपोर्टें या लेखों की एक लंबी फेहरिस्त है जिसे मैंने पढा है खासकर सामाजिक विज्ञान से सम्बंधित, मैं व्यक्तिगत तौर पर इस किताब को भी उसी तरीके के सामाजिक विज्ञान के श्रेणी में रखना पसंद करूँगा जो आपको अपने शब्दों के माध्यम से एक समाज को सम्पूर्णता के नजर से देखने में मदद करता है। और यह किताब मुझे उत्तराखंड के सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचे को समझने में मदद करता है। इसी किताब ने मुझे उत्तराखंड के गैज़ेटीयर भी पढ़ने के लिए उत्साहित करता है और अगले कुछ समय में शायद उसे पढूँगा भी। 

हिमालय में एक सामान्य ट्रैकिंग के लिए भी बहुत सारी ऊर्जा और संकल्प की आवश्यकता होती है। लेखक का यह कथन की "प्रकृति की ख़ूबसूरती और उसकी भव्यता के आगे इंसान की कोई बिसात नही है" दर्शाता है कि प्रकृति की भव्यता तभी तक अच्छी है जबतक आप उसके ताल में ताल मिलाकर नही चलते है। आपके उसके नियमों से ही उसके साथ चलने को बाध्य होते है आप अपने नियम या कायदे कानूनों से उसको एक सेकंड के लिए भी अपने साथ चलने को मजबूर नही कर सकते है। लेखक ने गाँव की मद्धम रफ्तार नाम के लेख में बताया है कि पहाड़ो की अपनी जीवन शैली होती है या उनके विकास को देखने का अपना तरीका होता है जिसमें कई बार अनावश्यक हस्तक्षेप ही उसके अपने विकास के सोच में बाधक होता है। ऐसा नही है कि ग्रामीण नई तकनीकों को लेकर हमेशा निराशावादी रहे है इसी किताब में लेखक ने प्रेशर कुकर का उदाहरण भी दिया है कैसे इसको पहाड़ पर हाथो हाथ लिया गया और आज लगभग हर घर मे प्रेशर कुकर पर खाना पकता है क्योंकि यह उनकी जरूरत के साथ साथ उनका ईंधन और समय दोनों बचाता है। 

इस किताब को जिस तरीके से हृदयेश जी ने अनुवादित किया है क़ाबिले तारीफ़ है क्योंकि मुझे नही लगता है कि बिल एटकिन साहेब इससे अच्छा अनुवाद चाहते हो। यह सर्वश्रेष्ठ अनुवादित किताब है जिससे कभी भी ऐसा नही लगता है कि एटकिन साहेब की जगह हृदयेश जी अपनी बात कह रहे है। 

एक बार फिर से धन्यवाद इस अद्वीतीय कृति के लिए। 

शशि धर कुमार

Friday, 23 December 2022

कौन है भारत माता?

मुझे इस किताब के बारे में तब पता चला जब मैं तथ्यपरक साहित्य, इतिहास या भाषा से संबंधित तथ्यों के अन्वेषण में लगा हुआ था अचानक किताब की कवर फ़ोटो के साथ साथ नाम ने चौका दिया और कही कही मुझे इस किताब की एक दो पन्ने कई बार लोग शेयर करते है पढ़ने मिला तो मैं काफी उत्साहित था कि आखिर यह किताब है क्या, तो मैंने इसको अपने Wishlist में रख लिया फिर मैंने लेखक के बारे में पता किया और उनके कई छोटे छोटे वीडियो देखें फिर कई और कई ऐसे फिलोसॉफी पढ़ाने वाले प्रोफेसर से भी इस किताब या लेखक के बारे में सुना एक तो हमारे गाँव के ही है जिनके बारे में इस किताब की भूमिका में जिक्र भी किया गया है।


फिर मुझे लगा कि यह किताब मुझे पढ़नी चाहिए, ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर पढ़ते वक्त कई बार अगर आपके हाथ में कोई ऐसी किताब हाथ लग गयी हो जो सिर्फ एक विचारधारा से संबंधित बातों को आगे रखकर लिखा गया हो तो आपकी विचारधारा प्रभावित होने का खतरा है। इसीलिए ऐसी किताबो को पढ़ते वक़्त इन बातों का ख्याल रखना अति आवश्यक है। ऐसा नही है कि इस किताब में लेखक ऐसी जगहों से ना गुजरे हो लेकिन जिन तथ्यात्मक तरीके से अच्छे बुरे कटु अनुभवों के साथ इतना लंबा समय देकर इस किताब को मूर्त रूप दिया गया है इसके लिए लेखक महोदय (पुरुषोत्तम अग्रवाल) जी की जितनी तारीफ की जाय कम है और आज मै यह कह सकता हूँ कि अगर आप नेहरू का विरोध करना चाहते है तो अवश्य करें लेकिन उससे पहले इस किताब को अवश्य पढ़ें तभी आप विरोध कर पाएंगे, वरना बेकार में आप व्हाट्सएप से फारवर्ड किये गए ऐसे अतथ्यात्मक संदेशो को फारवर्ड करते ही रह जाएंगे।

मेरे लिए यह किताब अतुलनीय संग्रह में से एक की श्रेणी में रखा जा सकता है। मैं विज्ञान का छात्र रहा हूँ लेकिन मेरी रुचि साहित्य को लेकर काफी पहले से थी लेकिन कोरोना काल ने बहुतों के जीवन मे अनेको बदलाव लाया और मेरे जीवन में किताबों में साहित्यिक रुचि को और गहरा किया जिसमें पिछले एक साल में भाषा को लेकर मेरे अंदर जो समझ तैयार हुई है चाहे वह ब्राह्मी से लेकर प्राकृत से लेकर संस्कृत से लेकर कैथी से लेकर पाली से संबंधित अनेको किताबों को पढ़ते हुए मेरे अंदर जो 1931 से लेकर 1965-70 तक का जो खालीपन था शायद इस किताब ने कुछ हद तक जरूर पूरी की है।

इस किताब के माध्यम से आपको नेहरू की अंग्रेजियत के साथ साथ वे अंदर से कितने भारतीय थे यह किताब आपको बखूबी समझने में मदद करता है। यही किताब आपको यह बता सकता है कि नेहरू को इस भूभाग के हर उस चीज से प्यार था जिससे प्राकृतिक रूप से इस भूभाग ने अपनी सुंदरता प्रदान की है चाहे वह जंगल हो पहाड़ हो पानी हो या फिर हरे भरे मैदानी इलाके और उन्हें सबसे ज्यादा प्यार था तो इस भूक्षेत्र में रहने वाले लोगों से, जिन्हें वे बिना किसी जाति धर्म के भेदभाव के देखने की कोशिश में लगातार प्रयासरत रहते थे। इस किताब से आज के दौर में नेहरू को नही समझने देने की नाकाबिल कोशिश को जनता ही विराम लगा सकती है। यह किताब उनकी शख्सियत के लिए अंधेरे में दीपक के समान साबित हो सकती है।

इसको बारबार पढ़ने की इच्छा है और पढूँगा भी। आखिर में लेखक महोदय का इस अद्वीतिय कृति के लिए फिर से धन्यवाद ज्ञापित करना चाहता हूँ।
शशि धर कुमार

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