पटना डायरी : स्मृतियों, साहित्य और शहर की धड़कनों का दस्तावेज़
दिल्ली पुस्तक मेला २०२६ का पहला दिन मेरे लिए कई अर्थों में विशेष था। उसी दिन वाणी प्रकाशन के मंच पर मेरा कविता पाठ निर्धारित था। कार्यक्रम शुरू होने से पहले मैंने सोचा कि कुछ पुस्तकें खरीद ली जाएँ, क्योंकि थोड़ी देर बाद भीड़ बढ़ने वाली थी। संयोग देखिए कि मेरे हाथ में उस दिन जो पहली पुस्तक आई, वह थी "पटना डायरी"। उस समय मुझे नहीं मालूम था कि यह पुस्तक केवल पढ़ी नहीं जाएगी, बल्कि मुझे अपने अतीत, अपनी स्मृतियों और साहित्यिक संवेदनाओं के बीच ले जाएगी। वैसे मैं पटना का तो नहीं लेकिन मेरे बिहार की राजधानी है तो जाना भी हुआ और घूमना फिरना भी और कई अतीत के किस्से अभी भी मेरे ज़ेहन में रची-बसी है।"पटना डायरी" को पढ़ते हुए बार-बार यह महसूस हुआ कि यह किसी शहर का मात्र विवरण नहीं है, बल्कि एक ऐसे मन की यात्रा है जिसने पटना को जिया है, महसूस किया है और अपनी स्मृतियों में सहेज कर रखा है। पुस्तक की भाषा सहज, आत्मीय और आत्मकथात्मक है। लेखक घटनाओं का वर्णन नहीं करते, बल्कि पाठक को उन घटनाओं के भीतर ले जाते हैं।
पुस्तक के जिन अध्यायों ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, उनमें "रेणु से मुलाकात" और "1980 से 82 का दौर" विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
"रेणु से मुलाकात" पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो साहित्य का एक स्वर्णिम अध्याय आँखों के सामने जीवित हो उठा हो। बालमन की उत्सुकता, लेखक के प्रति आकर्षण और पहली बार किसी बड़े साहित्यकार को देखने का रोमांच—इन सबका चित्रण अत्यंत स्वाभाविक है। जब बच्चे आपस में कहते हैं कि "ये वही हैं जिनकी किताब पर फिल्म बनी है", तब केवल एक व्यक्ति का परिचय नहीं होता, बल्कि उस समय साहित्य के प्रति समाज के सम्मान की भी झलक मिलती है। इस संस्मरण में रेणु केवल एक महान लेखक नहीं, बल्कि एक जीवंत मानवीय उपस्थिति के रूप में सामने आते हैं। मैंने पटना जंक्शन पर रेणु पुस्तकालय को एक बार नहीं कई बार बंद पाया, यूँ कहें कि मुझे कभी खुला ही नहीं दिखा तो थोड़ी कोफ़्त सी हो जाती है कि ऐसा क्यों है। और एक बार मैंने वहाँ के आस पास के जो खुले हुए ऑफिस थे पता किया तो पता चला कभी-कभी खुलता है। इस सन्दर्भ का इस किताब से कोई लेना-देना तो नहीं, लेकिन रेणु जी मेरी साहित्यिक यात्रा के बेहद करीब बैठते है तो मैं कई बार उनका जिक्र आते ही विषय को भूल जाता हूँ।
वहीं "1980 से 82 का दौर" अध्याय ने मुझे सबसे अधिक भावुक किया। गंगा किनारे बैठकर बिताए गए दिन, पटना कॉलेज का परिवेश, शाम की हवा, पुराने मित्रों की स्मृतियाँ—ये सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं जो किसी भी संवेदनशील पाठक को अपने अतीत में लौटने के लिए विवश कर देता है। विशेष रूप से वह भाव कि पुराने संस्थान और शहर समय के साथ बूढ़े तो हो जाते हैं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ कभी बूढ़ी नहीं होतीं—मन को गहराई से छूता है। यह अध्याय केवल 1980-82 का वर्णन नहीं, बल्कि बीतते समय और स्मृति के संबंध पर एक सुंदर चिंतन है।
पुस्तक का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें पटना केवल भौगोलिक शहर नहीं है। वह एक जीवित चरित्र है—जो लोगों, गलियों, साहित्यकारों, मित्रताओं, संघर्षों और यादों से निर्मित होता है। लेखक की दृष्टि में शहर ईंट-पत्थर का समूह नहीं, बल्कि अनुभवों का संग्रह है।
मेरे लिए "पटना डायरी" पढ़ना एक साहित्यिक अनुभव से अधिक एक भावनात्मक यात्रा रहा। इस पुस्तक ने यह एहसास कराया कि शहर बदलते हैं, लोग बिछुड़ते हैं, समय आगे बढ़ जाता है, लेकिन स्मृतियाँ अपने भीतर एक पूरा युग बचाए रखती हैं।
दिल्ली पुस्तक मेले से खरीदी गई उस पहली पुस्तक ने मुझे यह विश्वास भी दिलाया कि अच्छी किताबें अक्सर संयोग से हाथ में आती हैं, लेकिन फिर वे जीवन का स्थायी हिस्सा बन जाती हैं। "पटना डायरी" ऐसी ही एक पुस्तक है—जो पाठक को पटना के बहाने अपने ही अतीत से मिलवा देती है।
धन्यवाद!
शशि धर कुमार

