Sunday, 31 May 2026

पटना डायरी : स्मृतियों, साहित्य और शहर की धड़कनों का दस्तावेज़

पटना डायरी : स्मृतियों, साहित्य और शहर की धड़कनों का दस्तावेज़

दिल्ली पुस्तक मेला २०२६ का पहला दिन मेरे लिए कई अर्थों में विशेष था। उसी दिन वाणी प्रकाशन के मंच पर मेरा कविता पाठ निर्धारित था। कार्यक्रम शुरू होने से पहले मैंने सोचा कि कुछ पुस्तकें खरीद ली जाएँ, क्योंकि थोड़ी देर बाद भीड़ बढ़ने वाली थी। संयोग देखिए कि मेरे हाथ में उस दिन जो पहली पुस्तक आई, वह थी "पटना डायरी"। उस समय मुझे नहीं मालूम था कि यह पुस्तक केवल पढ़ी नहीं जाएगी, बल्कि मुझे अपने अतीत, अपनी स्मृतियों और साहित्यिक संवेदनाओं के बीच ले जाएगी। वैसे मैं पटना का तो नहीं लेकिन मेरे बिहार की राजधानी है तो जाना भी हुआ और घूमना फिरना भी और कई अतीत के किस्से अभी भी मेरे ज़ेहन में रची-बसी है।

"पटना डायरी" को पढ़ते हुए बार-बार यह महसूस हुआ कि यह किसी शहर का मात्र विवरण नहीं है, बल्कि एक ऐसे मन की यात्रा है जिसने पटना को जिया है, महसूस किया है और अपनी स्मृतियों में सहेज कर रखा है। पुस्तक की भाषा सहज, आत्मीय और आत्मकथात्मक है। लेखक घटनाओं का वर्णन नहीं करते, बल्कि पाठक को उन घटनाओं के भीतर ले जाते हैं।

पुस्तक के जिन अध्यायों ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, उनमें "रेणु से मुलाकात" और "1980 से 82 का दौर" विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

"रेणु से मुलाकात" पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो साहित्य का एक स्वर्णिम अध्याय आँखों के सामने जीवित हो उठा हो। बालमन की उत्सुकता, लेखक के प्रति आकर्षण और पहली बार किसी बड़े साहित्यकार को देखने का रोमांच—इन सबका चित्रण अत्यंत स्वाभाविक है। जब बच्चे आपस में कहते हैं कि "ये वही हैं जिनकी किताब पर फिल्म बनी है", तब केवल एक व्यक्ति का परिचय नहीं होता, बल्कि उस समय साहित्य के प्रति समाज के सम्मान की भी झलक मिलती है। इस संस्मरण में रेणु केवल एक महान लेखक नहीं, बल्कि एक जीवंत मानवीय उपस्थिति के रूप में सामने आते हैं। मैंने पटना जंक्शन पर रेणु पुस्तकालय को एक बार नहीं कई बार बंद पाया, यूँ कहें कि मुझे कभी खुला ही नहीं दिखा तो थोड़ी कोफ़्त सी हो जाती है कि ऐसा क्यों है। और एक बार मैंने वहाँ के आस पास के जो खुले हुए ऑफिस थे पता किया तो पता चला कभी-कभी खुलता है। इस सन्दर्भ का इस किताब से कोई लेना-देना तो नहीं, लेकिन रेणु जी मेरी साहित्यिक यात्रा के बेहद करीब बैठते है तो मैं कई बार उनका जिक्र आते ही विषय को भूल जाता हूँ।

वहीं "1980 से 82 का दौर" अध्याय ने मुझे सबसे अधिक भावुक किया। गंगा किनारे बैठकर बिताए गए दिन, पटना कॉलेज का परिवेश, शाम की हवा, पुराने मित्रों की स्मृतियाँ—ये सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं जो किसी भी संवेदनशील पाठक को अपने अतीत में लौटने के लिए विवश कर देता है। विशेष रूप से वह भाव कि पुराने संस्थान और शहर समय के साथ बूढ़े तो हो जाते हैं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ कभी बूढ़ी नहीं होतीं—मन को गहराई से छूता है। यह अध्याय केवल 1980-82 का वर्णन नहीं, बल्कि बीतते समय और स्मृति के संबंध पर एक सुंदर चिंतन है।

पुस्तक का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें पटना केवल भौगोलिक शहर नहीं है। वह एक जीवित चरित्र है—जो लोगों, गलियों, साहित्यकारों, मित्रताओं, संघर्षों और यादों से निर्मित होता है। लेखक की दृष्टि में शहर ईंट-पत्थर का समूह नहीं, बल्कि अनुभवों का संग्रह है।

मेरे लिए "पटना डायरी" पढ़ना एक साहित्यिक अनुभव से अधिक एक भावनात्मक यात्रा रहा। इस पुस्तक ने यह एहसास कराया कि शहर बदलते हैं, लोग बिछुड़ते हैं, समय आगे बढ़ जाता है, लेकिन स्मृतियाँ अपने भीतर एक पूरा युग बचाए रखती हैं।

दिल्ली पुस्तक मेले से खरीदी गई उस पहली पुस्तक ने मुझे यह विश्वास भी दिलाया कि अच्छी किताबें अक्सर संयोग से हाथ में आती हैं, लेकिन फिर वे जीवन का स्थायी हिस्सा बन जाती हैं। "पटना डायरी" ऐसी ही एक पुस्तक है—जो पाठक को पटना के बहाने अपने ही अतीत से मिलवा देती है।

धन्यवाद!
शशि धर कुमार

Tuesday, 5 May 2026

लोकसंस्कृति और साहित्य साधना के योगी - डॉ. बीरेन्द्र कुमार ‘चन्द्रसखी’

लोकसंस्कृति और साहित्य साधना के योगी - डॉ. बीरेन्द्र कुमार ‘चन्द्रसखी’

भारतीय लोकसंस्कृति की परंपरा केवल गीतों और उत्सवों तक सीमित नहीं है; यह हमारी सामूहिक स्मृति, भाषा, समाज और संवेदनाओं का जीवंत इतिहास है। इस विरासत को शब्द, शोध और सांगीतिक चेतना के माध्यम से संरक्षित करने वाले साहित्यकारों में का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे उन विरले साहित्यकारों में हैं जिन्होंने लोक और शास्त्र, परंपरा और आधुनिकता, शोध और संवेदना—इन सभी के बीच अद्भुत संतुलन स्थापित किया। साहित्य, लोकनाट्य, सांगीत, संगीतशास्त्र, लोकभाषाओं और सांस्कृतिक विरासत पर उनका दीर्घकालिक कार्य उन्हें केवल लेखक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दस्तावेजकार के रूप में स्थापित करता है।

डॉ. बीरेन्द्र कुमार ‘चन्द्रसखी’ का जन्म 11 सितम्बर 1964 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जनपद के नगलाभगी (लहराएमनीपुर) क्षेत्र में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय श्री आर.बी. सिंह तथा माता श्रीमती राजवती सिंह थीं। ग्रामीण परिवेश में जन्मे चन्द्रसखी ने बचपन से ही लोकजीवन की आत्मीयता, ग्रामीण संस्कृति की सहजता और लोककला की जीवंतता को निकट से देखा। इसी परिवेश ने उनके भीतर लोकसंस्कृति के प्रति गहरा लगाव उत्पन्न किया। गाँवों की चौपाल, लोकगीतों की स्वर लहरियाँ, नौटंकी और सांगीत की प्रस्तुतियाँ, मेलों की सांस्कृतिक धड़कन—ये सब आगे चलकर उनके साहित्य और शोध का आधार बने। इनके पिता संगीत के अच्छे जानकार थे यही वजह रही की उन्हें संगीत विरासत में मिली।

डॉ. चन्द्रसखी की सबसे बड़ी विशेषताओं में उनकी गंभीर शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी शामिल है। उन्होंने बी.ए., एम.ए. (अंग्रेज़ी, संस्कृत और हिन्दी), बी.एड., विशेष शिक्षा तथा हिन्दी में पी-एच.डी. जैसी उच्च शैक्षणिक उपाधियाँ प्राप्त कीं। उनकी शिक्षा केवल औपचारिक डिग्रियों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने भारतीय भाषाओं, साहित्य और लोकधाराओं का गहन अध्ययन किया। हिन्दी, संस्कृत, उर्दू और पंजाबी जैसी भाषाओं पर उनकी सशक्त पकड़ उनके लेखन और भाषाई अभिव्यक्ति को बहुआयामी बनाती है। उनके व्यक्तित्व में हिन्दी की सहजता, संस्कृत की शास्त्रीयता, उर्दू की नज़ाकत और पंजाबी की जीवंतता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। यही कारण है कि उनके लेखन में भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति का विस्तार बन जाती है।

डॉ. चन्द्रसखी का साहित्य बहुभाषिक भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। वे भारतीय भाषाओं को अलग-अलग खाँचों में नहीं देखते, बल्कि उन्हें भारतीय चेतना की संयुक्त धारा मानते हैं। उनकी रचनाओं में हिन्दी की लोकगंध के साथ उर्दू की लयात्मकता और संस्कृत की वैचारिक गहराई सहज रूप से दिखाई देती है। लोकसाहित्य और सांगीत पर लिखते समय वे केवल शब्दों का प्रयोग नहीं करते, बल्कि भाषा के भीतर छिपी सांस्कृतिक आत्मा को भी सामने लाते हैं। इसी बहुभाषिक दृष्टि ने उन्हें लोक और शास्त्र के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु बना दिया है।

डॉ. चन्द्रसखी ने कविता, गीत, मुक्तक, कहानी, निबंध, समीक्षा, शोध आलेख और सांगीतिक छंद जैसी अनेक विधाओं में लेखन किया। विशेष रूप से हिन्दी लोकसाहित्य और लोकनाट्य पर उनका कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उनकी लेखनी में केवल साहित्यिक सौंदर्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दस्तावेज़ीकरण की गंभीरता भी दिखाई देती है। उन्होंने लोकधाराओं को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि समाज की ऐतिहासिक स्मृति के रूप में देखा।

उत्तर भारत की लोकनाट्य परंपरा—विशेषकर “सांगीत” और “नौटंकी”—पर डॉ. चन्द्रसखी का कार्य अत्यंत उल्लेखनीय है। उन्होंने लोकगायन की विभिन्न शैलियों, सांगीत परंपराओं और लोकनाट्य विधाओं पर गंभीर अध्ययन किया। आज जब आधुनिक मनोरंजन माध्यमों के कारण लोककलाएँ धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही हैं, तब उनका शोध और लेखन इन परंपराओं को संरक्षित करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास बनकर सामने आता है। उत्तर प्रदेश की सांगीतिक और लोकनाट्य परंपराओं की ऐतिहासिक महत्ता को विभिन्न सांस्कृतिक अध्ययनों में भी रेखांकित किया गया है।

प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ
डॉ. चन्द्रसखी की अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें प्रमुख हैं—

  • सांगीत के विविध आयाम
  • सांगीत के प्रणेता पं. नथाराम शर्मा गौड़
  • सांगीत छंद मंजरी
  • सुर समाज
  • मैनपुरी का सांस्कृतिक विरासत
  • डॉ. विष्णु विराट का काव्य - सृजन के विविध आयाम

उनकी पुस्तक “सांगीत के विविध आयाम” विशेष रूप से चर्चित रही। इस कृति में लोकसंगीत, सांगीत परंपरा और संगीत-सांस्कृतिक विमर्श के विभिन्न पहलुओं का गंभीर अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक को 'उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा' द्वारा “श्रेष्ठ कृति पुरस्कार” से सम्मानित किया गया, जो उनके शोध और साहित्यिक योगदान की औपचारिक मान्यता है।

डॉ. चन्द्रसखी के लेख और शोध आलेख विभिन्न साहित्यिक और सांस्कृतिक पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते रहे हैं। विशेष रूप से प्रतिष्ठित पत्रिका 'कला वसुधा' में उनके आलेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं, जो उनकी सक्रिय साहित्यिक उपस्थिति और शोधपरक लेखन का प्रमाण है। उनके आलेखों में भारतीय लोकसंस्कृति, संगीत, लोकनाट्य, भाषा, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत जैसे विषय प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। वे केवल अकादमिक शोधकर्ता नहीं, बल्कि जनसरोकारों से जुड़े हुए साहित्यकार हैं।

डॉ. चन्द्रसखी की रुचियाँ केवल साहित्य तक सीमित नहीं हैं। वे सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों से भी गहराई से जुड़े रहे हैं।

उनकी अभिरुचियों में—
लोकविरासत का संरक्षण
सामाजिक-सांस्कृतिक जागरूकता
शहीदों की स्मृति में कार्य
पर्यावरण संरक्षण
साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देना
लोकगायन और लोकनाट्य की परंपराओं का संरक्षण

जैसे महत्वपूर्ण कार्य शामिल हैं। वे मानते हैं कि यदि समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट जाएगा, तो उसकी पहचान भी धीरे-धीरे कमजोर हो जाएगी।

सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों पर भी डॉ. चन्द्रसखी की सक्रियता दिखाई देती है। उनका फेसबुक मंच साहित्य, संस्कृति और सामाजिक चेतना से जुड़े विचारों का माध्यम बनता है। उनकी पोस्टों और साझा सामग्री में लोकसंस्कृति, भाषा, साहित्यिक विमर्श और सामाजिक संवेदनाओं की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। वे आधुनिक डिजिटल माध्यमों का उपयोग भारतीय लोकधरोहर और साहित्यिक चेतना को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए करते हैं।

डॉ. बीरेन्द्र कुमार ‘चन्द्रसखी’ का व्यक्तित्व बहुआयामी है—वे साहित्यकार हैं, शोधकर्ता हैं, लोकसंस्कृति के संरक्षक हैं, संगीत-चिंतक हैं और बहुभाषिक विद्वान भी। उन्होंने सिद्ध किया कि साहित्य केवल पुस्तकालयों में बंद ज्ञान नहीं, बल्कि समाज की जीवित स्मृति है। हिन्दी, उर्दू, संस्कृत और पंजाबी जैसी भाषाओं पर उनकी मजबूत पकड़ उनके साहित्य को विशिष्ट गरिमा प्रदान करती है। उनकी लेखनी भारतीय लोकजीवन की मिट्टी से जुड़ी हुई है, इसलिए उसमें कृत्रिमता नहीं, बल्कि जीवन की सच्ची धड़कन सुनाई देती है। आज जब लोककलाएँ और लोकभाषाएँ अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं, तब डॉ. चन्द्रसखी जैसे साहित्यकार भारतीय सांस्कृतिक विरासत के सजग प्रहरी के रूप में दिखाई देते हैं। उनका कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल साहित्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दिशा और प्रेरणा भी है।

©️✍️शशि धर कुमार, कटिहार, बिहार
Instagram ID: ishashidharkumar

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