Friday, 16 January 2026

वीरेंद्र यादव : शब्दों के विवेकशील प्रहरी को श्रद्धांजलि

वीरेंद्र यादव : शब्दों के विवेकशील प्रहरी को श्रद्धांजलि

वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव का देहावसान हिंदी साहित्य जगत के लिए एक गहरी क्षति है। वे केवल आलोचक नहीं थे, बल्कि साहित्य की आत्मा के सजग पहरेदार थे—ऐसे विवेकशील पाठक, जिन्होंने रचना को विचार, समाज और समय की कसौटी पर परखा। उनके जाने से आलोचना का वह स्वर मौन हो गया है, जो शोर से नहीं, तर्क और संवेदना से बोलता था। वे उस पीढ़ी के आलोचक थे, जिनके लिए साहित्य पढ़ना एक नैतिक कर्म था और आलोचना—संवाद की सबसे जिम्मेदार विधा। उन्होंने आलोचक की भूमिका को ‘निर्णायक’ नहीं, बल्कि ‘पाठक और रचना के बीच सेतु’ के रूप में देखा। उनकी आलोचना में किसी रचना या रचनाकार को खारिज करने की जल्दबाजी नहीं मिलती, बल्कि धैर्यपूर्वक समझने और संदर्भ में रखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।

आलोचना का स्वभाव

उनकी आलोचना की सबसे बड़ी विशेषता थी—स्पष्टता और ईमानदारी। वे रचना की शक्ति को उसी तरह रेखांकित करते थे जैसे उसकी सीमाओं को। उनके लेखन में न तो अनावश्यक दुरूहता थी और न ही सतही सरलीकरण। आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकता, दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श और लोक-संवेदना जैसे प्रश्नों पर लिखते हुए भी उन्होंने हमेशा रचना-केंद्रित दृष्टि को प्राथमिकता दी। वीरेंद्र यादव की आलोचनात्मक दृष्टि बहुस्तरीय थी। वे रचना को केवल शिल्प या विचार के स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ, भाषा की राजनीति और समय की बेचैनी के साथ जोड़कर देखते थे। उनके लेखन में स्पष्टता, तार्किकता और संयम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वे मानते थे कि आलोचना का सबसे बड़ा गुण है—न्यायप्रियता।

कृतियाँ और लेखन

वीरेंद्र यादव की पहचान मुख्यतः एक सक्रिय आलोचक और निबंधकार के रूप में रही।

  • आलोचनात्मक निबंध और लेख: उनके विचार अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित हुए, जहाँ उन्होंने समकालीन हिंदी कविता, कथा और आलोचना की प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया। इन लेखों में उन्होंने रचना की भाषा-संरचना, वैचारिक पृष्ठभूमि और सामाजिक संदर्भों को साथ रखकर पढ़ने की पद्धति प्रस्तुत की। उनके लेख हंस, तद्भव, वागर्थ, आलोचना जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए, जहाँ उन्होंने समकालीन हिंदी कविता, कथा और आलोचना की प्रवृत्तियों का गहन विश्लेषण किया। 
  • समकालीन साहित्य पर विमर्श: उन्होंने नई पीढ़ी के रचनाकारों के लेखन को गंभीरता से लिया और उन्हें स्थापित परंपरा के साथ संवाद में रखा—यह दृष्टि उनके लेखों को संदर्भात्मक महत्व देती है।
  • आलोचना की पद्धति पर विचार: उनके निबंधों में आलोचना की नैतिकता, आलोचक की जिम्मेदारी और साहित्य-संस्थान की भूमिका जैसे विषय बार-बार उभरते हैं—जो आज के समय में विशेष प्रासंगिक हैं।

विरासत

वीरेंद्र यादव की सबसे बड़ी विरासत उनका दृष्टिकोण है—विवेकशील, मानवीय और संवादधर्मी। उन्होंने सिखाया कि आलोचना सत्ता का नहीं, सत्य का पक्ष लेती है; और साहित्य का मूल्यांकन तात्कालिक लोकप्रियता से नहीं, दीर्घकालिक संवेदना से होता है। आज जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह संकल्प भी लेते हैं कि उनकी आलोचनात्मक ईमानदारी, भाषा के प्रति सम्मान और रचना के प्रति प्रतिबद्धता को जीवित रखें। हिंदी साहित्य जगत उनके योगदान को कृतज्ञता और आदर के साथ याद करता रहेगा। वे उन आलोचकों में थे, जिन्होंने यह बार-बार रेखांकित किया कि साहित्य सत्ता के निकट नहीं, बल्कि समाज की संवेदना के निकट खड़ा होना चाहिए। उनका लेखन हमें यह याद दिलाता है कि आलोचना का उद्देश्य रचना को छोटा करना नहीं, बल्कि उसे अधिक अर्थवान बनाना है।

आज, जब आलोचना अक्सर तात्कालिक प्रतिक्रिया या वैचारिक ध्रुवीकरण में सिमटती जा रही है, वीरेंद्र यादव का काम हमें धैर्य, विवेक और गहन पाठ की ओर लौटने का आग्रह करता है। हिंदी साहित्य जगत उनके योगदान को लंबे समय तक स्मरण करेगा।

विनम्र श्रद्धांजलि।

Wednesday, 14 January 2026

मकर संक्रांति: उत्तरायण होता लोकजीवन और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा

मकर संक्रांति: उत्तरायण होता लोकजीवन और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा

भारतीय सभ्यता में पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते; वे समय, समाज और स्मृति के साझा दस्तावेज़ होते हैं। मकर संक्रांति ऐसा ही एक पर्व है—जो खगोलीय घटना से आरंभ होकर लोकजीवन की गहराइयों तक पहुँचता है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण की शुरुआत भारतीय मानस में केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश, ठहराव से गति और निराशा से आशा की यात्रा का रूपक है। यही कारण है कि यह पर्व भारत के अलग-अलग भूभागों में भिन्न नामों, भिन्न स्वादों और भिन्न लोकाचारों के साथ मनाया जाता है, पर उसका मूल भाव सर्वत्र एक-सा रहता है—जीवन के उत्सव का भाव।

पर्व और समय का संबंध
मकर संक्रांति उन गिने-चुने भारतीय पर्वों में है, जो चंद्र तिथि पर नहीं, बल्कि सौर गणना पर आधारित है। यह तथ्य अपने आप में इस पर्व को प्रकृति और विज्ञान के अधिक निकट ले जाता है। जब सूर्य उत्तरायण होता है, तब ठंड की तीव्रता धीरे-धीरे कम होने लगती है, दिन बड़े होने लगते हैं और खेतों में खड़ी फसल किसान की आशा को ठोस आकार देने लगती है। यही वह क्षण है, जब भारतीय ग्रामीण समाज श्रम के सम्मान और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता को पर्व में बदल देता है।

अंग क्षेत्र: एक सांस्कृतिक निरंतरता
अंग क्षेत्र—जिसे ऐतिहासिक रूप से अंग महाजनपद के रूप में जाना जाता है—आज भी अपनी सांस्कृतिक निरंतरता के कारण विशिष्ट है। भागलपुर, बांका, मुंगेर, कटिहार, पूर्णिया, अररिया और किशनगंज—इन जिलों में फैला यह क्षेत्र केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक साझा लोकचेतना है। यहाँ मकर संक्रांति को ‘सकरात’ कहा जाता है, और यह शब्द अपने आप में लोकभाषा की आत्मीयता को समेटे हुए है। इस क्षेत्र में पर्वों का स्वरूप आडंबरहीन है। यहाँ उत्सव मंदिरों की ऊँचाई से नहीं, बल्कि आँगनों की सादगी से पहचाना जाता है। यही सादगी मकर संक्रांति को यहाँ जीवन के अधिक निकट ले आती है।

कटिहार: मेरी मिट्टी, मेरी दृष्टि
मेरा गृहक्षेत्र कटिहार है—एक ऐसा जिला जो अंग और सीमांचल की सांस्कृतिक धाराओं के संगम पर स्थित है। यहाँ मकर संक्रांति केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलने वाला सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभव है। घरों में तैयारी पहले से शुरू हो जाती है—दही जमाने से लेकर चूड़ा साफ करने तक, और तिलकुट की खरीद से लेकर रिश्तेदारों को न्योता देने तक। कटिहार में सकरात का अर्थ है—रिश्तों का नवीकरण। इस दिन बड़े-बुजुर्गों के चरण छूना, छोटे-बड़ों के बीच मिठाई बाँटना और पुराने गिले-शिकवे भूल जाना—यह सब अनकहे सामाजिक अनुशासन का हिस्सा है।

दही-चूड़ा-गुड़: लोकज्ञान की थाली
अंग क्षेत्र में मकर संक्रांति की पहचान दही-चूड़ा-गुड़ से है। यह भोजन जितना सरल दिखता है, उतना ही गहरा अर्थ अपने भीतर समेटे है। चूड़ा नई फसल का प्रतीक है—श्रम का प्रतिफल। दही शरीर को संतुलन देता है और गुड़ ठंड में ऊष्मा प्रदान करता है। यह थाली लोकजीवन की उस समझ को दर्शाती है, जिसमें स्वास्थ्य, मौसम और श्रम—तीनों का सामंजस्य है। आज जब भोजन फैशन और बाज़ार का विषय बन चुका है, तब दही-चूड़ा-गुड़ जैसी परंपराएँ हमें याद दिलाती हैं कि लोकसंस्कृति में पोषण केवल शरीर का नहीं, समाज का भी होता है।

तिलकुट और मिठास का सामाजिक अर्थ
मकर संक्रांति की मिठाइयाँ—तिलकुट, बालूशाही और लड्डू—केवल स्वाद की वस्तुएँ नहीं हैं। वे सामाजिक संवाद का माध्यम हैं। तिलकुट विशेष रूप से अंग क्षेत्र की पहचान है। तिल और गुड़ का मेल जैसे यह संकेत देता है कि कठोरता और मिठास, दोनों के संतुलन से ही जीवन संभव है। इन मिठाइयों का बाँटना सामाजिक समानता का भाव पैदा करता है। यहाँ अमीर-गरीब का भेद कम हो जाता है, क्योंकि मिठास साझा की जाती है, प्रदर्शित नहीं।

कल्याणी झील और माघ पूर्णिमा का मेला
कटिहार की कल्याणी झील मकर संक्रांति के बाद आने वाली माघ पूर्णिमा पर अपने चरम सांस्कृतिक स्वरूप में दिखाई देती है। यहाँ लगने वाला मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकजीवन का विस्तृत दृश्य-पटल है। झील के किनारे स्नान करते श्रद्धालु, साधु-संतों की उपस्थिति, लोकगीतों की ध्वनि और ग्रामीण बाज़ार की रंगीन हलचल—यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं, जहाँ आस्था और जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं रहते। मेरे लिए कल्याणी झील स्मृति का केंद्र है। बचपन में यहाँ आना केवल मेले में जाना नहीं था, बल्कि अपने समाज को करीब से देखना था—उस समाज को, जो सीमित संसाधनों में भी उत्सव रच लेता है।

दान, श्रम और सामाजिक उत्तरदायित्व
मकर संक्रांति अंग क्षेत्र में दान का पर्व भी है। तिल, अन्न, वस्त्र और कंबल का दान—यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि पर्व तभी सार्थक है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। यह पर्व किसान और श्रमिक के श्रम को सम्मान देता है। खेतों में पसीना बहाने वाला किसान और घर में अन्न पकाने वाली गृहिणी—दोनों इस पर्व के केंद्र में होते हैं। यह दृष्टि आज के उपभोक्तावादी समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है, जहाँ उत्सव अक्सर प्रदर्शन बनकर रह जाते हैं।

आधुनिक समय में मकर संक्रांति का अर्थ
आज जब जीवन की गति तेज़ हो चुकी है और रिश्ते औपचारिकता में सिमटते जा रहे हैं, मकर संक्रांति जैसे पर्व हमें ठहरने का अवसर देते हैं। यह पर्व हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित करता है—उस लोकसंस्कृति की ओर, जहाँ मनुष्य और प्रकृति के बीच दूरी नहीं थी। मेरे लिए मकर संक्रांति कटिहार की मिट्टी, कल्याणी झील की ठंडी हवा और अंग क्षेत्र की लोकस्मृतियों से जुड़ा अनुभव है। यह पर्व मुझे हर वर्ष यह याद दिलाता है कि आधुनिकता का अर्थ परंपरा से कटना नहीं, बल्कि उसे समझकर आगे बढ़ना है।

मकर संक्रांति का वास्तविक अर्थ सूर्य के उत्तरायण होने से आगे जाता है। यह लोकजीवन के उत्तरायण का पर्व है—जहाँ समाज अंधकार, ठंड और जड़ता से निकलकर प्रकाश, ऊष्मा और सामूहिकता की ओर बढ़ता है। अंग क्षेत्र में यह पर्व आज भी अपनी मूल आत्मा के साथ जीवित है—भागलपुर से किशनगंज तक, और विशेष रूप से कटिहार की कल्याणी झील के किनारे।

मेरे लिए मकर संक्रांति कोई तिथि नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है—
अपनी स्मृतियों, अपनी मिट्टी और अपनी सांस्कृतिक जिम्मेदारी की ओर लौटने की प्रक्रिया।

यही इस पर्व की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है—आज भी, और आने वाले समय में भी।

Monday, 12 January 2026

युवाशक्ति और स्वामी विवेकानंद की दृष्टि

भारत की आत्मा को आधुनिक युग में जिस व्यक्तित्व ने सबसे अधिक आत्मविश्वास, तेज और वैश्विक पहचान दी, उनमें स्वामी विवेकानंद का नाम अग्रणी है। वे केवल एक संन्यासी या दार्शनिक नहीं थे, बल्कि युवाओं के प्रखर प्रेरक, राष्ट्रनिर्माता और मानवता के चिंतक थे। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि किसी भी देश का भविष्य उसके युवाओं के चरित्र, साहस और संकल्प पर निर्भर करता है। इसी कारण उन्होंने युवाओं को अपनी साधना, चिंतन और कार्य का केंद्र बनाया। आज जब युवा वर्ग मानसिक दबाव, बेरोज़गारी, उपभोक्तावाद, पहचान-संकट और दिशाहीनता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, तब स्वामी विवेकानंद की सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उनका संदेश केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक, शैक्षिक और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण से गहराई से जुड़ा हुआ है।

स्वामी विवेकानंद: संक्षिप्त जीवन-परिचय
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ। उनका मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। बचपन से ही वे तेजस्वी, जिज्ञासु और तर्कशील प्रवृत्ति के थे। ईश्वर, आत्मा और जीवन के उद्देश्य को लेकर उनके मन में गहरे प्रश्न थे। गुरु रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर मिले और जीवन की दिशा तय हुई। 1893 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में दिया गया उनका ऐतिहासिक भाषण न केवल भारत के आध्यात्मिक गौरव की उद्घोषणा था, बल्कि यह युवाओं में आत्मगौरव और आत्मविश्वास जगाने वाला क्षण भी था। उन्होंने संन्यास को पलायन नहीं, बल्कि सेवा और कर्म का माध्यम बनाया।

युवाओं के प्रति स्वामी विवेकानंद का दृष्टिकोण
स्वामी विवेकानंद के विचारों में युवा शक्ति केंद्रीय स्थान रखती है। वे युवाओं को केवल उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि ऊर्जा, साहस और नवचेतना के प्रतीक के रूप में देखते थे। उनका विश्वास था कि यदि युवा जागृत हो जाएँ, तो राष्ट्र स्वतः जागृत हो जाएगा।
वे कहते थे—
“मुझे सौ ऊर्जावान युवक दो, मैं भारत को बदल दूँगा।”
यह कथन उनके युवाओं पर अटूट विश्वास को दर्शाता है। उनके अनुसार युवा वह शक्ति है जो जड़ परंपराओं को तोड़कर नई राह बना सकती है।

आत्मविश्वास और निर्भीकता का संदेश
स्वामी विवेकानंद का सबसे बड़ा संदेश था—आत्मविश्वास। वे मानते थे कि गुलामी, गरीबी और पिछड़ेपन का मूल कारण आत्मविश्वास की कमी है। उन्होंने युवाओं को निर्भीक बनने का आह्वान किया।
“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”
यह केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। युवाओं को उन्होंने सिखाया कि असफलता से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उसे सीख का माध्यम बनाना चाहिए। भय, संकोच और हीनभावना को उन्होंने सबसे बड़ा शत्रु बताया।

शिक्षा पर विवेकानंद की सोच
स्वामी विवेकानंद की शिक्षा संबंधी अवधारणा आज की डिग्री-केंद्रित शिक्षा से बिल्कुल भिन्न थी। उनके अनुसार शिक्षा वह है जो मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता को प्रकट करे।
वे कहते थे—
“शिक्षा वह नहीं है जो सूचनाओं का ढेर बना दे, बल्कि वह है जो चरित्र का निर्माण करे।”
उनकी दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य था—
  • चरित्र निर्माण
  • आत्मनिर्भरता
  • सेवा-भाव
  • विवेक और करुणा
वे युवाओं को केवल नौकरी के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी नागरिक बनाने की बात करते थे।

शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास
स्वामी विवेकानंद युवाओं के सर्वांगीण विकास के पक्षधर थे। वे कमजोर शरीर और कमजोर मन को आध्यात्मिक उन्नति में बाधक मानते थे। इसी कारण उन्होंने युवाओं को शारीरिक रूप से मजबूत बनने की प्रेरणा दी।
वे यहाँ तक कहते थे कि—
“गीता पढ़ने से पहले फुटबॉल खेलो।”
इस कथन का आशय यह था कि पहले शरीर और मन को सशक्त बनाओ, तभी उच्च विचारों को धारण कर सकोगे। उनके अनुसार स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन और उच्च आत्मबोध संभव है।

कर्मयोग और युवाओं की भूमिका
स्वामी विवेकानंद कर्मयोग के प्रबल समर्थक थे। उनके अनुसार कर्म से पलायन नहीं, बल्कि कर्म के माध्यम से ही मुक्ति संभव है। युवाओं को उन्होंने सेवा, परिश्रम और सामाजिक उत्तरदायित्व का पाठ पढ़ाया।
वे चाहते थे कि युवा—
  • गरीबों और वंचितों की सेवा करें
  • अज्ञान, अंधविश्वास और कुरीतियों से संघर्ष करें
  • अपने जीवन को समाज के लिए समर्पित करें
उनकी दृष्टि में सच्चा देशभक्त वही है जो अंतिम व्यक्ति के दुःख को अपना दुःख समझे।

राष्ट्रनिर्माण और युवाशक्ति
स्वामी विवेकानंद के लिए राष्ट्र केवल भू-भाग नहीं, बल्कि जीवंत चेतना था। वे मानते थे कि भारत की आत्मा गाँवों, किसानों, मजदूरों और साधारण जनता में बसती है। युवाओं को उन्होंने इस आत्मा से जुड़ने का आह्वान किया।
उनका सपना था—
  • आत्मनिर्भर भारत
  • सामाजिक समरसता
  • जाति और भेदभाव से मुक्त समाज
उन्होंने युवाओं से कहा कि वे केवल आलोचक न बनें, बल्कि निर्माता बनें। समस्याओं पर रोने के बजाय समाधान खोजें।

युवाओं के लिए नैतिकता और चरित्र
स्वामी विवेकानंद के अनुसार चरित्र ही मनुष्य की वास्तविक पूँजी है। बिना चरित्र के ज्ञान और शक्ति दोनों विनाशकारी बन सकते हैं। उन्होंने युवाओं को सत्य, ईमानदारी, संयम और त्याग का महत्व समझाया।
वे मानते थे कि चरित्रवान युवा ही सच्चे नेता और समाज-सुधारक बन सकते हैं।

आज के संदर्भ में विवेकानंद की प्रासंगिकता
आज का युवा डिजिटल युग में जी रहा है, जहाँ सूचना की अधिकता है लेकिन दिशा का अभाव है। प्रतिस्पर्धा, दिखावा और त्वरित सफलता की चाह ने युवाओं को भीतर से थका दिया है। ऐसे समय में स्वामी विवेकानंद की सोच मार्गदर्शक बन सकती है।
उनका संदेश युवाओं को सिखाता है—
  • स्वयं पर विश्वास रखना
  • असफलता से न डरना
  • सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाना
  • भौतिकता और आध्यात्मिकता में संतुलन रखना
स्वामी विवेकानंद केवल अतीत के संत नहीं, बल्कि भविष्य के मार्गदर्शक हैं। उनकी सोच आज भी युवाओं के लिए प्रकाश-स्तंभ की तरह है। यदि युवा वर्ग उनके विचारों को केवल पढ़े नहीं, बल्कि जीवन में उतारे, तो व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ राष्ट्रीय पुनर्जागरण भी संभव है। भारत का भविष्य युवाओं के हाथ में है और युवाओं का भविष्य विवेकानंद जैसे विचारकों की प्रेरणा में। आवश्यकता है कि हम उनके संदेश को केवल जयंती तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने कर्म, चरित्र और चेतना में स्थान दें। तभी सशक्त युवा और सशक्त राष्ट्र का सपना साकार होगा।

Saturday, 3 January 2026

अध्यात्म, ध्यान और चेतना: क्या यह सिर्फ भरे पेट वालों की विलासिता है?

आज के समय में जब महँगाई, बेरोज़गारी, सामाजिक असमानताएँ और मानसिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसे में “अध्यात्म, ध्यान और चेतना” जैसे शब्द कई लोगों को या तो दिखावा लगते हैं या पलायनवाद। अक्सर सुनने को मिलता है—“जिनका पेट भरा है, वही ध्यान‑धर्म की बातें करते हैं; भूखे आदमी को क्या ध्यान सूझेगा?” यह सवाल केवल ग़ुस्से की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि हमारे समय की गहरी सामाजिक सच्चाई से उपजा हुआ प्रश्न है। इसलिए यह जाँचना ज़रूरी है कि क्या सचमुच अध्यात्म, ध्यान और चेतना केवल “भरे पेट वालों” का खेल हैं, या इनका अर्थ और उपयोग इससे कहीं व्यापक है।

पलायनवाद की धारणा और उसकी सीमाएँ
सबसे पहले यह समझना होगा कि पलायनवाद है क्या। पलायनवाद वह प्रवृत्ति है जो व्यक्ति को वास्तविक समस्याओं—जैसे गरीबी, अन्याय, शोषण, हिंसा—का सामना करने के बजाय किसी कल्पित या संकुचित दुनिया में शरण लेने के लिए उकसाती है। जब कोई व्यक्ति सिर्फ अपने “भीतर की शांति” के नाम पर सामाजिक ज़िम्मेदारियों से किनारा कर ले, या अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के बजाय कहे "सब माया है, जो हो रहा है होने दो", तो यह निश्चय ही अध्यात्म का पलायनवादी रूप है।

लेकिन अध्यात्म की हर धारा को ऐसे ही खड़े कर देना भी एक तरह का बौद्धिक सरलीकरण है। अनेक परंपराएँ—संत, सूफी, बुद्ध, गांधी से लेकर आधुनिक करुणा‑आधारित ध्यान परंपराएँ—अंदर की शांति को बाहर की कर्मशीलता से जोड़ती हैं। आज के शोध भी संकेत करते हैं कि ध्यान और सचेतन व्यक्ति में आत्म-जागरूकता, भावनात्मक संतुलन और दूसरों के प्रति करुणा बढ़ाते हैं; यह गुण व्यक्ति को भागने नहीं, बल्कि अधिक जागरूक ढंग से जुड़ने की क्षमता देते हैं।

“पेट भरा हो तभी अध्यात्म” – कितना सही, कितना अधूरा?
यह सत्य है कि भूख, बीमारी और असुरक्षा से जूझ रहा व्यक्ति सबसे पहले रोटी, दवा और सुरक्षित जीवन की चिंता करेगा। जिसके रोज़गार पर तलवार लटकती हो, उसके लिए “ध्यान करो, मन शांत करो” जैसा उपदेश सतही या क्रूर भी लग सकता है। अनेक अध्ययन बताते हैं कि जब तक बुनियादी ज़रूरतें बहुत नीचे स्तर पर हों, मानसिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा उसी संघर्ष में खप जाता है।

लेकिन इतिहास और समाज की जमीन पर देखने पर तस्वीर दूसरी भी दिखती है। भक्ति आंदोलन से लेकर कबीर, रैदास, फकीरों और सूफियों तक, बड़े पैमाने पर गरीब, श्रमिक, दलित और हाशिए के समुदायों ने गहरे आध्यात्मिक अनुभवों और लोक‑भक्ति की परंपराएँ विकसित कीं। यह इस धारणा को चुनौती देता है कि अध्यात्म केवल भरे पेट वालों की बौद्धिक विलासिता है।

आधुनिक शोध भी इसी दिशा में संकेत देते हैं। कम आय, अधिक तनाव और असुरक्षा से जूझते समुदायों में चलाए गए ध्यान और सचेतन कार्यक्रमों में पाया गया कि इससे तनाव, अवसाद, घबराहट, दर्द और आत्महत्या‑विचार जैसे जोखिमों में कमी आती है, और लोग अपनी कठिन परिस्थितियों को थोड़ी अधिक संयम और स्पष्टता से संभाल पाते हैं। ध्यान नींद, रक्तचाप और समग्र स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है, जो आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए भी सीधे व्यावहारिक लाभ हैं।

अतः यह कहना कि “अध्यात्म, ध्यान और चेतना सिर्फ उन लोगों के लिए हैं जिनका पेट भरा है” अनुभव और शोध—दोनों स्तरों पर आधा‑अधूरा निष्कर्ष है। ज़्यादा सही बात यह है कि जिनके पास संसाधन हैं, वे इन्हें बाज़ारू रूप में आसानी से ख़रीद भी लेते हैं; पर इसकी ज़रूरत और प्रासंगिकता केवल उन्हीं तक सीमित नहीं है।

व्यक्ति के स्तर पर उपयोगिता: भागना नहीं, मजबूत होना
अध्यात्म, ध्यान और चेतना की कई धाराएँ व्यक्ति को जीवन से भागने नहीं, बल्कि उसका सामना करने के लिए तैयार करती हैं। आधुनिक विज्ञान‑आधारित अध्ययनों में बार‑बार दिखा है कि नियमित ध्यान से चिंता, अवसाद, चिड़चिड़ापन और क्रोध में कमी तथा ध्यान‑एकाग्रता, भावनात्मक संतुलन और मानसिक लचीलापन बढ़ता है।

कठिन परिस्थितियों में जी रहे व्यक्ति के लिए यह लचीलापन केवल "विलासिता" नहीं, बल्कि कई बार जीवन‑रक्षा जैसा साधन बन जाता है। जब बाहरी संरचनाएँ—जैसे भ्रष्ट व्यवस्था, बेरोज़गारी, या सामाजिक भेदभाव—तुरंत न बदल सकें, तब भी व्यक्ति अपने भीतर की प्रतिक्रिया बदलकर खुद को टूटने से बचा सकता है, और लंबी लड़ाई के लिए ऊर्जा बचा सकता है।

ध्यान और सचेतन के अभ्यास से करुणा, आत्म‑करुणा और दूसरों की मदद की इच्छा में वृद्धि देखी गई है। इससे व्यक्ति परिवार, कार्यस्थल और समाज में अधिक सुनने‑समझने वाला, कम प्रतिक्रियावादी और अधिक भरोसेमंद बनता है। यानी चेतना की यह साधना आत्मकेंद्रित “मेरा मोक्ष” भर नहीं, बल्कि संबंधों और सामाजिक व्यवहार की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती है।

समाज के स्तर पर: अंदर की शांति से बाहर की संरचना तक
समाजशास्त्र और मनोविज्ञान में "Social Ripple Effect" की बात होती है—किसी व्यक्ति की भावनात्मक स्थिति और व्यवहार उसके आसपास के लोगों तक तरंग की तरह फैलते हैं। यदि किसी समुदाय में एक समूह भी नियमित ध्यान, आत्म‑निरीक्षण और करुणा‑अभ्यास से परिवर्तन अनुभव करता है, तो इसका असर पारिवारिक हिंसा, नशाखोरी, शत्रुता और पारस्परिक अविश्वास जैसे व्यवहारों पर पड़ सकता है।

कई कार्यक्रमों में करुणा‑आधारित ध्यान और सचेतन को धार्मिक व जातीय रूप से विभाजित समूहों के बीच चलाया गया, और पाया गया कि इससे पूर्वाग्रह घटते हैं, दूसरे समूह के प्रति मानवीय दृष्टि बढ़ती है, तथा संवाद की संभावना मजबूत होती है। ऐसे उदाहरण दिखाते हैं कि चेतना की खेती केवल “निजी साधना” नहीं, सामाजिक शांति और न्याय की प्रक्रियाओं में भी योगदान दे सकती है।

यदि अध्यात्म को इस रूप में समझा जाए कि वह व्यक्ति को
-अपने भीतर की हिंसा, घृणा और पूर्वाग्रह देखने की क्षमता दे
-दूसरों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील बनाए
-और अन्याय के सामने खड़े होने का नैतिक साहस दे

तो यह अध्यात्म किसी भी तरह से पलायनवाद नहीं, बल्कि सामाजिक रूपांतरण का सहायक बनता है।

जब अध्यात्म सचमुच पलायन और शोषक बन जाता है। यह मान लेना भी खतरनाक होगा कि अध्यात्म का हर रूप शुभ है। कुछ रूप सचमुच पलायन और शोषण का औज़ार बन जाते हैं।

पहला रूप है जादुई सोच—जहाँ कहा जाता है कि "सब कुछ सोच से बनता है; बस पॉज़िटिव सोचो, ध्यान करो, सब ठीक हो जाएगा।" इस नारे के पीछे कई बार यह संदेश छिपा होता है कि व्यवस्था, नीतियाँ, शोषक ढाँचे, जातीय‑लैंगिक भेदभाव—इन पर सवाल उठाने की ज़रूरत नहीं; अगर तुम दुखी हो तो समस्या तुम्हारे 'विचारों' में है, व्यवस्था में नहीं।

दूसरा रूप है कर्म‑वाद का विकृत इस्तेमाल—जहाँ गरीबी, बीमारी, शोषण और हिंसा को "पूर्व जन्म के कर्म" कहकर वैध ठहराया जाता है। इससे पीड़ित को न्याय की माँग से दूर रखा जाता है, और शोषक के लिए यह सुविधाजनक नैतिक कवच बन जाता है। यह अध्यात्म निश्चित ही पलायनवादी और अन्याय‑समर्थक है।

तीसरा रूप है बाज़ारू वेलनेस इंडस्ट्री। जब ध्यान और सचेतन महँगे कोर्स, ऐप, रिट्रीट और विलासिता उत्पाद बनकर सिर्फ सम्पन्न वर्ग की थकान मिटाने का साधन बन जाए, और मजदूर, किसान, घरेलू कामगार या बेरोज़गार युवा उसके दायरे से बाहर रह जाएँ, तो यह धारणा और मजबूत होती है कि "अध्यात्म तो भरे पेट वालों के लिए है।"

इसी के साथ यह भी सच है कि सस्ती, सामुदायिक और सार्वजनिक संस्थानों के माध्यम से ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य‑संबंधी प्रशिक्षण दिए जाएँ तो वे गरीब समुदायों के लिए भी वास्तविक सहारा बन सकते हैं; अनेक जगहों पर स्कूलों, अस्पतालों और समुदाय‑केंद्रों में इस तरह की पहल से सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।

लेखक की ज़िम्मेदारी: आलोचना और निर्माण साथ‑साथ
एक तर्कशील लेखक के रूप में इस पूरे विमर्श में मेरी भूमिका केवल “अध्यात्म की प्रशंसा” या “पूर्ण खंडन” तक सीमित नहीं है। मैं दोनों छोरों की नीतियों की आलोचना करते हुए एक तीसरा, अधिक मानवीय और तर्कसंगत रास्ता रेखांकित कर सकता हूँ।

मेरे लेख में तीन स्तर स्पष्ट कर सकते हैं—
1) पलायनवादी अध्यात्म: जो अन्याय को माया कहकर टाल देता है, पीड़ित को उसके दुख का दोषी ठहराता है, और व्यवस्था से सवाल उठाने की बजाय व्यक्ति को चुप कराता है।
2) उपचारात्मक अध्यात्म: जो वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित ध्यान, सचेतन और करुणा‑अभ्यासों के माध्यम से तनाव, अवसाद, हिंसक प्रतिक्रियाओं और आत्मघातक प्रवृत्तियों को कम करता है, और व्यक्ति को मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।
3) रूपांतरकारी अध्यात्म: जो व्यक्तित्व और समाज, दोनों को अधिक न्यायपूर्ण, करुणाशील और जागरूक दिशा में ले जाता है; जो व्यक्ति को केवल “अंदर” नहीं, “बाहर” की दुनिया को भी बदलने की प्रेरणा देता है।

मेरा केंद्रीय तर्क यह हो सकता है कि “अध्यात्म, ध्यान और चेतना” अपने‑आप में न तो पलायनवादी हैं, न क्रांतिकारी; उनका स्वरूप इस बात से तय होता है कि वे किन सामाजिक‑आर्थिक संदर्भों में, किस उद्देश्य से और किस भाषा में प्रयोग किए जा रहे हैं। यदि ये ताकतवरों के पक्ष में अन्याय को ढँकने का औज़ार बनते हैं, तो वे पलायन और धोखा हैं; यदि ये कमज़ोरों को मानसिक शक्ति, करुणा और संगठन की दृष्टि देते हैं, तो ये समाज के लिए वरदान हैं।

निष्कर्ष
प्रश्न केवल इतना नहीं होना चाहिए कि “क्या अध्यात्म, ध्यान और चेतना भरे पेट वालों का विचार है?” इससे ज़्यादा सटीक और तर्कशील प्रश्न यह है कि “अध्यात्म, ध्यान और चेतना का कौन‑सा रूप, किसके लिए, किस उद्देश्य से और किस परिणाम के साथ काम कर रहा है?”

जब अध्यात्म व्यक्ति को अपनी और दूसरों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील बनाता है, ध्यान उसे मानसिक रूप से मजबूत और करुणामय बनाता है, और चेतना उसे अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की नैतिक दृष्टि देती है, तब यह किसी भी रूप में पलायनवाद नहीं, बल्कि सामाजिक विकास की आवश्यक शक्ति है। और जब वही साधन भूखे, शोषित, हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ को शांत करने, उन्हें “भाग्य” और “कर्म” के नाम पर चुप रखने में इस्तेमाल हो, तब इसे बिना झिझक ‘पलायनवादी’ और ‘दमनकारी’ कहा जाना चाहिए।

इसी दोधारी प्रकृति को समझते हुए मेरा लेख पाठकों को यह सोचने के लिए प्रेरित कर सकता है कि उन्हें अध्यात्म से भागना नहीं, बल्कि उसे सजग दृष्टि से चुनना है और साधना करना है—ताकि भरा पेट हो या खाली, मनुष्य की गरिमा और समाज की न्यायपूर्णता—दोनों की रक्षा हो सके।
धन्यवाद
शशि धर कुमार
कटिहार, बिहार

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