Monday, 12 January 2026

युवाशक्ति और स्वामी विवेकानंद की दृष्टि

भारत की आत्मा को आधुनिक युग में जिस व्यक्तित्व ने सबसे अधिक आत्मविश्वास, तेज और वैश्विक पहचान दी, उनमें स्वामी विवेकानंद का नाम अग्रणी है। वे केवल एक संन्यासी या दार्शनिक नहीं थे, बल्कि युवाओं के प्रखर प्रेरक, राष्ट्रनिर्माता और मानवता के चिंतक थे। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि किसी भी देश का भविष्य उसके युवाओं के चरित्र, साहस और संकल्प पर निर्भर करता है। इसी कारण उन्होंने युवाओं को अपनी साधना, चिंतन और कार्य का केंद्र बनाया। आज जब युवा वर्ग मानसिक दबाव, बेरोज़गारी, उपभोक्तावाद, पहचान-संकट और दिशाहीनता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, तब स्वामी विवेकानंद की सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उनका संदेश केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक, शैक्षिक और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण से गहराई से जुड़ा हुआ है।

स्वामी विवेकानंद: संक्षिप्त जीवन-परिचय
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ। उनका मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। बचपन से ही वे तेजस्वी, जिज्ञासु और तर्कशील प्रवृत्ति के थे। ईश्वर, आत्मा और जीवन के उद्देश्य को लेकर उनके मन में गहरे प्रश्न थे। गुरु रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर मिले और जीवन की दिशा तय हुई। 1893 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में दिया गया उनका ऐतिहासिक भाषण न केवल भारत के आध्यात्मिक गौरव की उद्घोषणा था, बल्कि यह युवाओं में आत्मगौरव और आत्मविश्वास जगाने वाला क्षण भी था। उन्होंने संन्यास को पलायन नहीं, बल्कि सेवा और कर्म का माध्यम बनाया।

युवाओं के प्रति स्वामी विवेकानंद का दृष्टिकोण
स्वामी विवेकानंद के विचारों में युवा शक्ति केंद्रीय स्थान रखती है। वे युवाओं को केवल उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि ऊर्जा, साहस और नवचेतना के प्रतीक के रूप में देखते थे। उनका विश्वास था कि यदि युवा जागृत हो जाएँ, तो राष्ट्र स्वतः जागृत हो जाएगा।
वे कहते थे—
“मुझे सौ ऊर्जावान युवक दो, मैं भारत को बदल दूँगा।”
यह कथन उनके युवाओं पर अटूट विश्वास को दर्शाता है। उनके अनुसार युवा वह शक्ति है जो जड़ परंपराओं को तोड़कर नई राह बना सकती है।

आत्मविश्वास और निर्भीकता का संदेश
स्वामी विवेकानंद का सबसे बड़ा संदेश था—आत्मविश्वास। वे मानते थे कि गुलामी, गरीबी और पिछड़ेपन का मूल कारण आत्मविश्वास की कमी है। उन्होंने युवाओं को निर्भीक बनने का आह्वान किया।
“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”
यह केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। युवाओं को उन्होंने सिखाया कि असफलता से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उसे सीख का माध्यम बनाना चाहिए। भय, संकोच और हीनभावना को उन्होंने सबसे बड़ा शत्रु बताया।

शिक्षा पर विवेकानंद की सोच
स्वामी विवेकानंद की शिक्षा संबंधी अवधारणा आज की डिग्री-केंद्रित शिक्षा से बिल्कुल भिन्न थी। उनके अनुसार शिक्षा वह है जो मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता को प्रकट करे।
वे कहते थे—
“शिक्षा वह नहीं है जो सूचनाओं का ढेर बना दे, बल्कि वह है जो चरित्र का निर्माण करे।”
उनकी दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य था—
  • चरित्र निर्माण
  • आत्मनिर्भरता
  • सेवा-भाव
  • विवेक और करुणा
वे युवाओं को केवल नौकरी के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी नागरिक बनाने की बात करते थे।

शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास
स्वामी विवेकानंद युवाओं के सर्वांगीण विकास के पक्षधर थे। वे कमजोर शरीर और कमजोर मन को आध्यात्मिक उन्नति में बाधक मानते थे। इसी कारण उन्होंने युवाओं को शारीरिक रूप से मजबूत बनने की प्रेरणा दी।
वे यहाँ तक कहते थे कि—
“गीता पढ़ने से पहले फुटबॉल खेलो।”
इस कथन का आशय यह था कि पहले शरीर और मन को सशक्त बनाओ, तभी उच्च विचारों को धारण कर सकोगे। उनके अनुसार स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन और उच्च आत्मबोध संभव है।

कर्मयोग और युवाओं की भूमिका
स्वामी विवेकानंद कर्मयोग के प्रबल समर्थक थे। उनके अनुसार कर्म से पलायन नहीं, बल्कि कर्म के माध्यम से ही मुक्ति संभव है। युवाओं को उन्होंने सेवा, परिश्रम और सामाजिक उत्तरदायित्व का पाठ पढ़ाया।
वे चाहते थे कि युवा—
  • गरीबों और वंचितों की सेवा करें
  • अज्ञान, अंधविश्वास और कुरीतियों से संघर्ष करें
  • अपने जीवन को समाज के लिए समर्पित करें
उनकी दृष्टि में सच्चा देशभक्त वही है जो अंतिम व्यक्ति के दुःख को अपना दुःख समझे।

राष्ट्रनिर्माण और युवाशक्ति
स्वामी विवेकानंद के लिए राष्ट्र केवल भू-भाग नहीं, बल्कि जीवंत चेतना था। वे मानते थे कि भारत की आत्मा गाँवों, किसानों, मजदूरों और साधारण जनता में बसती है। युवाओं को उन्होंने इस आत्मा से जुड़ने का आह्वान किया।
उनका सपना था—
  • आत्मनिर्भर भारत
  • सामाजिक समरसता
  • जाति और भेदभाव से मुक्त समाज
उन्होंने युवाओं से कहा कि वे केवल आलोचक न बनें, बल्कि निर्माता बनें। समस्याओं पर रोने के बजाय समाधान खोजें।

युवाओं के लिए नैतिकता और चरित्र
स्वामी विवेकानंद के अनुसार चरित्र ही मनुष्य की वास्तविक पूँजी है। बिना चरित्र के ज्ञान और शक्ति दोनों विनाशकारी बन सकते हैं। उन्होंने युवाओं को सत्य, ईमानदारी, संयम और त्याग का महत्व समझाया।
वे मानते थे कि चरित्रवान युवा ही सच्चे नेता और समाज-सुधारक बन सकते हैं।

आज के संदर्भ में विवेकानंद की प्रासंगिकता
आज का युवा डिजिटल युग में जी रहा है, जहाँ सूचना की अधिकता है लेकिन दिशा का अभाव है। प्रतिस्पर्धा, दिखावा और त्वरित सफलता की चाह ने युवाओं को भीतर से थका दिया है। ऐसे समय में स्वामी विवेकानंद की सोच मार्गदर्शक बन सकती है।
उनका संदेश युवाओं को सिखाता है—
  • स्वयं पर विश्वास रखना
  • असफलता से न डरना
  • सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाना
  • भौतिकता और आध्यात्मिकता में संतुलन रखना
स्वामी विवेकानंद केवल अतीत के संत नहीं, बल्कि भविष्य के मार्गदर्शक हैं। उनकी सोच आज भी युवाओं के लिए प्रकाश-स्तंभ की तरह है। यदि युवा वर्ग उनके विचारों को केवल पढ़े नहीं, बल्कि जीवन में उतारे, तो व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ राष्ट्रीय पुनर्जागरण भी संभव है। भारत का भविष्य युवाओं के हाथ में है और युवाओं का भविष्य विवेकानंद जैसे विचारकों की प्रेरणा में। आवश्यकता है कि हम उनके संदेश को केवल जयंती तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने कर्म, चरित्र और चेतना में स्थान दें। तभी सशक्त युवा और सशक्त राष्ट्र का सपना साकार होगा।

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