वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव का देहावसान हिंदी साहित्य जगत के लिए एक गहरी क्षति है। वे केवल आलोचक नहीं थे, बल्कि साहित्य की आत्मा के सजग पहरेदार थे—ऐसे विवेकशील पाठक, जिन्होंने रचना को विचार, समाज और समय की कसौटी पर परखा। उनके जाने से आलोचना का वह स्वर मौन हो गया है, जो शोर से नहीं, तर्क और संवेदना से बोलता था। वे उस पीढ़ी के आलोचक थे, जिनके लिए साहित्य पढ़ना एक नैतिक कर्म था और आलोचना—संवाद की सबसे जिम्मेदार विधा। उन्होंने आलोचक की भूमिका को ‘निर्णायक’ नहीं, बल्कि ‘पाठक और रचना के बीच सेतु’ के रूप में देखा। उनकी आलोचना में किसी रचना या रचनाकार को खारिज करने की जल्दबाजी नहीं मिलती, बल्कि धैर्यपूर्वक समझने और संदर्भ में रखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
आलोचना का स्वभाव
उनकी आलोचना की सबसे बड़ी विशेषता थी—स्पष्टता और ईमानदारी। वे रचना की शक्ति को उसी तरह रेखांकित करते थे जैसे उसकी सीमाओं को। उनके लेखन में न तो अनावश्यक दुरूहता थी और न ही सतही सरलीकरण। आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकता, दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श और लोक-संवेदना जैसे प्रश्नों पर लिखते हुए भी उन्होंने हमेशा रचना-केंद्रित दृष्टि को प्राथमिकता दी। वीरेंद्र यादव की आलोचनात्मक दृष्टि बहुस्तरीय थी। वे रचना को केवल शिल्प या विचार के स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ, भाषा की राजनीति और समय की बेचैनी के साथ जोड़कर देखते थे। उनके लेखन में स्पष्टता, तार्किकता और संयम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वे मानते थे कि आलोचना का सबसे बड़ा गुण है—न्यायप्रियता।
कृतियाँ और लेखन
वीरेंद्र यादव की पहचान मुख्यतः एक सक्रिय आलोचक और निबंधकार के रूप में रही।
- आलोचनात्मक निबंध और लेख: उनके विचार अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित हुए, जहाँ उन्होंने समकालीन हिंदी कविता, कथा और आलोचना की प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया। इन लेखों में उन्होंने रचना की भाषा-संरचना, वैचारिक पृष्ठभूमि और सामाजिक संदर्भों को साथ रखकर पढ़ने की पद्धति प्रस्तुत की। उनके लेख हंस, तद्भव, वागर्थ, आलोचना जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए, जहाँ उन्होंने समकालीन हिंदी कविता, कथा और आलोचना की प्रवृत्तियों का गहन विश्लेषण किया।
- समकालीन साहित्य पर विमर्श: उन्होंने नई पीढ़ी के रचनाकारों के लेखन को गंभीरता से लिया और उन्हें स्थापित परंपरा के साथ संवाद में रखा—यह दृष्टि उनके लेखों को संदर्भात्मक महत्व देती है।
- आलोचना की पद्धति पर विचार: उनके निबंधों में आलोचना की नैतिकता, आलोचक की जिम्मेदारी और साहित्य-संस्थान की भूमिका जैसे विषय बार-बार उभरते हैं—जो आज के समय में विशेष प्रासंगिक हैं।
विरासत
वीरेंद्र यादव की सबसे बड़ी विरासत उनका दृष्टिकोण है—विवेकशील, मानवीय और संवादधर्मी। उन्होंने सिखाया कि आलोचना सत्ता का नहीं, सत्य का पक्ष लेती है; और साहित्य का मूल्यांकन तात्कालिक लोकप्रियता से नहीं, दीर्घकालिक संवेदना से होता है। आज जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह संकल्प भी लेते हैं कि उनकी आलोचनात्मक ईमानदारी, भाषा के प्रति सम्मान और रचना के प्रति प्रतिबद्धता को जीवित रखें। हिंदी साहित्य जगत उनके योगदान को कृतज्ञता और आदर के साथ याद करता रहेगा। वे उन आलोचकों में थे, जिन्होंने यह बार-बार रेखांकित किया कि साहित्य सत्ता के निकट नहीं, बल्कि समाज की संवेदना के निकट खड़ा होना चाहिए। उनका लेखन हमें यह याद दिलाता है कि आलोचना का उद्देश्य रचना को छोटा करना नहीं, बल्कि उसे अधिक अर्थवान बनाना है।
आज, जब आलोचना अक्सर तात्कालिक प्रतिक्रिया या वैचारिक ध्रुवीकरण में सिमटती जा रही है, वीरेंद्र यादव का काम हमें धैर्य, विवेक और गहन पाठ की ओर लौटने का आग्रह करता है। हिंदी साहित्य जगत उनके योगदान को लंबे समय तक स्मरण करेगा।
विनम्र श्रद्धांजलि।
