Wednesday, 14 January 2026

मकर संक्रांति: उत्तरायण होता लोकजीवन और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा

मकर संक्रांति: उत्तरायण होता लोकजीवन और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा

भारतीय सभ्यता में पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते; वे समय, समाज और स्मृति के साझा दस्तावेज़ होते हैं। मकर संक्रांति ऐसा ही एक पर्व है—जो खगोलीय घटना से आरंभ होकर लोकजीवन की गहराइयों तक पहुँचता है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण की शुरुआत भारतीय मानस में केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश, ठहराव से गति और निराशा से आशा की यात्रा का रूपक है। यही कारण है कि यह पर्व भारत के अलग-अलग भूभागों में भिन्न नामों, भिन्न स्वादों और भिन्न लोकाचारों के साथ मनाया जाता है, पर उसका मूल भाव सर्वत्र एक-सा रहता है—जीवन के उत्सव का भाव।

पर्व और समय का संबंध
मकर संक्रांति उन गिने-चुने भारतीय पर्वों में है, जो चंद्र तिथि पर नहीं, बल्कि सौर गणना पर आधारित है। यह तथ्य अपने आप में इस पर्व को प्रकृति और विज्ञान के अधिक निकट ले जाता है। जब सूर्य उत्तरायण होता है, तब ठंड की तीव्रता धीरे-धीरे कम होने लगती है, दिन बड़े होने लगते हैं और खेतों में खड़ी फसल किसान की आशा को ठोस आकार देने लगती है। यही वह क्षण है, जब भारतीय ग्रामीण समाज श्रम के सम्मान और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता को पर्व में बदल देता है।

अंग क्षेत्र: एक सांस्कृतिक निरंतरता
अंग क्षेत्र—जिसे ऐतिहासिक रूप से अंग महाजनपद के रूप में जाना जाता है—आज भी अपनी सांस्कृतिक निरंतरता के कारण विशिष्ट है। भागलपुर, बांका, मुंगेर, कटिहार, पूर्णिया, अररिया और किशनगंज—इन जिलों में फैला यह क्षेत्र केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक साझा लोकचेतना है। यहाँ मकर संक्रांति को ‘सकरात’ कहा जाता है, और यह शब्द अपने आप में लोकभाषा की आत्मीयता को समेटे हुए है। इस क्षेत्र में पर्वों का स्वरूप आडंबरहीन है। यहाँ उत्सव मंदिरों की ऊँचाई से नहीं, बल्कि आँगनों की सादगी से पहचाना जाता है। यही सादगी मकर संक्रांति को यहाँ जीवन के अधिक निकट ले आती है।

कटिहार: मेरी मिट्टी, मेरी दृष्टि
मेरा गृहक्षेत्र कटिहार है—एक ऐसा जिला जो अंग और सीमांचल की सांस्कृतिक धाराओं के संगम पर स्थित है। यहाँ मकर संक्रांति केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलने वाला सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभव है। घरों में तैयारी पहले से शुरू हो जाती है—दही जमाने से लेकर चूड़ा साफ करने तक, और तिलकुट की खरीद से लेकर रिश्तेदारों को न्योता देने तक। कटिहार में सकरात का अर्थ है—रिश्तों का नवीकरण। इस दिन बड़े-बुजुर्गों के चरण छूना, छोटे-बड़ों के बीच मिठाई बाँटना और पुराने गिले-शिकवे भूल जाना—यह सब अनकहे सामाजिक अनुशासन का हिस्सा है।

दही-चूड़ा-गुड़: लोकज्ञान की थाली
अंग क्षेत्र में मकर संक्रांति की पहचान दही-चूड़ा-गुड़ से है। यह भोजन जितना सरल दिखता है, उतना ही गहरा अर्थ अपने भीतर समेटे है। चूड़ा नई फसल का प्रतीक है—श्रम का प्रतिफल। दही शरीर को संतुलन देता है और गुड़ ठंड में ऊष्मा प्रदान करता है। यह थाली लोकजीवन की उस समझ को दर्शाती है, जिसमें स्वास्थ्य, मौसम और श्रम—तीनों का सामंजस्य है। आज जब भोजन फैशन और बाज़ार का विषय बन चुका है, तब दही-चूड़ा-गुड़ जैसी परंपराएँ हमें याद दिलाती हैं कि लोकसंस्कृति में पोषण केवल शरीर का नहीं, समाज का भी होता है।

तिलकुट और मिठास का सामाजिक अर्थ
मकर संक्रांति की मिठाइयाँ—तिलकुट, बालूशाही और लड्डू—केवल स्वाद की वस्तुएँ नहीं हैं। वे सामाजिक संवाद का माध्यम हैं। तिलकुट विशेष रूप से अंग क्षेत्र की पहचान है। तिल और गुड़ का मेल जैसे यह संकेत देता है कि कठोरता और मिठास, दोनों के संतुलन से ही जीवन संभव है। इन मिठाइयों का बाँटना सामाजिक समानता का भाव पैदा करता है। यहाँ अमीर-गरीब का भेद कम हो जाता है, क्योंकि मिठास साझा की जाती है, प्रदर्शित नहीं।

कल्याणी झील और माघ पूर्णिमा का मेला
कटिहार की कल्याणी झील मकर संक्रांति के बाद आने वाली माघ पूर्णिमा पर अपने चरम सांस्कृतिक स्वरूप में दिखाई देती है। यहाँ लगने वाला मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकजीवन का विस्तृत दृश्य-पटल है। झील के किनारे स्नान करते श्रद्धालु, साधु-संतों की उपस्थिति, लोकगीतों की ध्वनि और ग्रामीण बाज़ार की रंगीन हलचल—यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं, जहाँ आस्था और जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं रहते। मेरे लिए कल्याणी झील स्मृति का केंद्र है। बचपन में यहाँ आना केवल मेले में जाना नहीं था, बल्कि अपने समाज को करीब से देखना था—उस समाज को, जो सीमित संसाधनों में भी उत्सव रच लेता है।

दान, श्रम और सामाजिक उत्तरदायित्व
मकर संक्रांति अंग क्षेत्र में दान का पर्व भी है। तिल, अन्न, वस्त्र और कंबल का दान—यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि पर्व तभी सार्थक है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। यह पर्व किसान और श्रमिक के श्रम को सम्मान देता है। खेतों में पसीना बहाने वाला किसान और घर में अन्न पकाने वाली गृहिणी—दोनों इस पर्व के केंद्र में होते हैं। यह दृष्टि आज के उपभोक्तावादी समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है, जहाँ उत्सव अक्सर प्रदर्शन बनकर रह जाते हैं।

आधुनिक समय में मकर संक्रांति का अर्थ
आज जब जीवन की गति तेज़ हो चुकी है और रिश्ते औपचारिकता में सिमटते जा रहे हैं, मकर संक्रांति जैसे पर्व हमें ठहरने का अवसर देते हैं। यह पर्व हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित करता है—उस लोकसंस्कृति की ओर, जहाँ मनुष्य और प्रकृति के बीच दूरी नहीं थी। मेरे लिए मकर संक्रांति कटिहार की मिट्टी, कल्याणी झील की ठंडी हवा और अंग क्षेत्र की लोकस्मृतियों से जुड़ा अनुभव है। यह पर्व मुझे हर वर्ष यह याद दिलाता है कि आधुनिकता का अर्थ परंपरा से कटना नहीं, बल्कि उसे समझकर आगे बढ़ना है।

मकर संक्रांति का वास्तविक अर्थ सूर्य के उत्तरायण होने से आगे जाता है। यह लोकजीवन के उत्तरायण का पर्व है—जहाँ समाज अंधकार, ठंड और जड़ता से निकलकर प्रकाश, ऊष्मा और सामूहिकता की ओर बढ़ता है। अंग क्षेत्र में यह पर्व आज भी अपनी मूल आत्मा के साथ जीवित है—भागलपुर से किशनगंज तक, और विशेष रूप से कटिहार की कल्याणी झील के किनारे।

मेरे लिए मकर संक्रांति कोई तिथि नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है—
अपनी स्मृतियों, अपनी मिट्टी और अपनी सांस्कृतिक जिम्मेदारी की ओर लौटने की प्रक्रिया।

यही इस पर्व की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है—आज भी, और आने वाले समय में भी।

Featured Post

मकर संक्रांति: उत्तरायण होता लोकजीवन और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा

मकर संक्रांति: उत्तरायण होता लोकजीवन और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा भारतीय सभ्यता में पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते; वे समय, सम...