मानव स्वभाव के दुर्गुणों में चिड़चिड़ापन आन्तरिक मन की दुर्बलता का
सूचक है। सहिष्णुता के अभाव में मनुष्य बात बात में चिढ़ने लगता है, नाक
भौं सिकोड़ता है, प्रायः गाली गलौज देता है। मानसिक दुर्बलता के कारण वह समझता है कि
दूसरे उसे जान बूझकर परेशान करना चाहते हैं, उसके दुर्गुणों
को देखते है, उनका मजाक उड़ाते हैं। किसी पुरानी कटु अनुभूति के फलस्वरूप वह
अत्यधिक संवेदनशील हो उठता है और उसकी भावना ग्रन्थियाँ उसकी गाली गलोज या बेढंगे
व्यापारों में प्रकट होती हैं।
चिड़चिड़ेपन के रोगी में चिंता तथा शक शुवे की आदत प्रधान है। कभी-2
शारीरिक कमजोरी के कारण, कब्ज, परिश्रम से थकान,
सिरदर्द,
नपुँसकता
के कारण आदमी तिनक उठता है। अपनी कठिनाइयों तथा समस्याओं को उद्दीप्त होकर देखते
देखते उसे गहरी निराशा हो जाती है। चिड़चिड़ापन एक पेचीदा मानसिक रोग है। अतः प्रारम्भ
से ही इसके विषय में हमें सावधान रहना चाहिए।
जिस व्यक्ति में चिड़चिड़ेपन की आदत है, वह सदा दूसरों
के दोष ढूंढ़ता रहता है। वह व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की दृष्टि में तो बुरा होता
ही है, स्वयं भी एक अव्यक्त मानसिक उद्वेग का शिकार रहता है। उसके मन में एक
प्रकार का संघर्ष चला करता है। वह भ्रमित कल्पनाओं का शिकार रहता है। उसके संशय
ज्ञान तन्तुओं पर तनाव डालते हैं। भ्रम बढ़ता रहता है और वह मन ही मन ईर्ष्या की
अग्नि में दग्ध होता रहता है। वह क्रोधित, भ्रान्त, दुःखी सा नजर
आता है। तनिक सी बात में उसकी उद्विग्नता का पारावार नहीं रहता। गुप्त मन पर
प्रारंभ में जैसे संस्कार जम जाते हैं, उनके फलस्वरूप ऐसा होता है। यह आदत से
पड़ने वाला एक संस्कार है।
रोग से मुक्ति के साधन
मन में दृढ़ निश्चय करना चाहिए कि चिड़चिड़ापन बुरा है। हम उसे अपने
स्वभाव में से निकालना चाहते हैं। हम दूसरों के बोलने, हंसने, मजाक,
या
कामों से नहीं चिढ़ेंगे। हम उनकी परवा न करेंगे। अपने स्वभाव में मृदुता लायेंगे,
सरल
बनेंगे, सहिष्णु बनेंगे।
मनुष्य के मन में सत तथा असत् दोनों प्रकार के विचारों का क्रम चला
करता है। हमें अपने दुर्बल विचारों के प्रति बड़ा सतर्क रहना चाहिए। जब कोई चिंता,
या
निराशाजनक बात मन में आवे, आप उसके प्रतिकूल भावना का उद्रेक
कीजिये। चिड़चिड़ेपन के दमन के लिए मृदुता, प्रसन्नता,
सहानुभूति
की भावना अत्यन्त लाभदायक है। प्रबलता से मन में शुभ संकल्प जाग्रत कीजिए।
जब कभी आपको क्रोध आवे तो आप मन ही मन कहिए, “दूसरों से गलती
हो ही जाती है। मुझे दूसरों की गलतियों पर क्रुद्ध नहीं होना चाहिए। यदि दूसरे
गलती करते हैं, तो उसका यह मतलब नहीं कि मैं और भी बड़ी गलती कर उसका प्रतिशोध लूँ।
मैं शुभ संकल्प वाला साधक हूँ। शुभ संकल्प के फलित होने के लिए उद्विग्न मन होना
उचित नहीं। हम सहिष्णु बनेंगे। दूसरे स्वयं अपनी गलती का अनुभव करेंगे। हम धैर्य
धारण करें।”
जितना ही आप विचारों को ऊपर लिखित भावनाओं पर एकाग्र करेंगे, उतना
ही बल आपको मिलेगा। पुनः पुनः दृढ़ता से उन में रमण करने से स्वभाव बदल जायगा,
प्रकृति
मधुर बन जायगी। आवेश को रोकने से मन को बल मिलेगा।
अपने दैनिक व्यवहार में प्रेमी, सहानुभूतिपूर्ण,
सौम्य
और प्रसन्नमुद्रा से काम लीजिये। इस मधुर स्वभाव का प्रभाव आपके कुटुम्ब तथा समाज
पर बहुत अच्छा पड़ेगा। सुख−शांति से जीवन व्यतीत करने के लिए मिष्ट भाषी और मधुर स्वभाव
सर्वोत्तम तत्व हैं। मधुरता का प्रवाह तुम्हारे इर्द गिर्द वातावरण में फैल जायगा।
चिड़चिड़ा होना आपकी एक बड़ी कमजोरी है, मधुरता से, सरसता और
प्रसन्नता से उसे ठीक कर लीजिये। ऐसे मधुर वचन बोलिये कि छोटे बच्चे आपकी ओर
आकर्षित होकर चले आयें, पत्नी प्रसन्न हो उठे, नौकर भी प्रसन्नता से आपकी आज्ञा बजा
लायें। संकल्प की दृढ़ता, आवेश को रोकने तथा मधुर आदर्श सामने
रखने से निश्चय ही आप चिड़चिड़ेपन से छुटकारा पा सकेंगे।
Is Multi Level Marketing (MLM) for You?
व्यक्ति का समाज के प्रति वही दायित्व है जो अंगों का सम्पूर्ण शरीर के प्रति। यदि शरीर के विविध अंग किसी प्रकार स्वार्थी अथवा आत्मास्तित्व तक ही सीमित हो जायें तो निश्चय ही सारे शरीर के लिए एक खतरा पैदा हो जाए। सबसे पहले भोजन मुँह में आता है। यदि मुँह स्वार्थी बन कर उस भोजन को अपने तक ही सीमित रख कर उसका स्वाद लेता रहे और जब इच्छा हो उसे थूक कर फेंक दे, तो उसके इस स्वार्थ का परिणाम बड़ा भयंकर होगा। जब मुँह का चबाया हुआ भोजन पेट को न जाएगा तो कहाँ से उसका रस बनेगा और कहाँ से रक्त माँस, मज्जा आदि? इस क्रिया के बन्द हो जाने पर शरीर के दूसरे अंगों और अवयवों को तत्व मिलना बन्द हो जाएगा। वे क्षीण और निर्बल होने लगेंगे और धीरे-धीरे पूरी तरह अस्वस्थ होकर सदा-सर्वदा के लिए निर्जीव हो जायेंगे। पूरा शरीर टूट जाएगा और शीघ्र ही जीवन हीन होकर मिट्टी में मिल जाएगा। यह सब अनर्थ, एक मुँह के स्वार्थ-परायण हो जाने से घटित होगा।
पुलवामा हमले के बाद भारत को क्या करना चाहिए?
भारत रत्न माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी जिन्होंने १६ अगस्त २०१८ को अपनी अंतिम सांस ली। जो एक प्रखर वक्ता, एक कवि, एक सुलझे हुए व्यक्ति, संवेदनशीलता का जीता जागता समुन्द्र जो हर दिल अजीज थे। आज यानी १७ अगस्त २०१८ को पंचतत्व में विलीन हो गए। पंचतत्व में विलीन तो उनका दैहिक शरीर हुआ है लेकिन उनकी वाणी, उनकी पंक्तिया, उनका जीवन सन्देश हम सबके बीच है और हमेशा रहेंगी। ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविताएँ जितनी जीवंत लगती है उतनी ही जिंदगी से जुड़ी हुई भी लगती है। इसी का जीता जागता उदहारण है कविता "गीत नया गाता हूं" जिसकी पंक्तियाँ "हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं" जन जन को याद है।
मुझे बड़ा आश्चर्य होता है जब हमारे सोशल मीडिया के बुद्धिजीवी कह रहे है कि 500 और 1000 के नोट पर बैन से लोगो को तकलीफ हो रही है। तो मैं आपको सही करने की कोशिश करता हूँ क्योंकि यहाँ पर आप तकनिकी तौर पर कतई सही नहीं है क्योंकि 500 और 1000 के नोट बैन नहीं हुए है सरकार आपसे कह रही है कि आप इसको नए नोट के साथ बदले। इसको अर्थशास्त्र की भाषा में विमुद्रिकरण कहते है। क्यों बदलना है क्योंकि सरकार को लगता है जो 500 और 1000 के नोटों के रूप में जो नकली नोट मार्किट में हर दिन भेजा जाता है आतंकवादी संगठनों और नशे के व्यापारियों द्वारा अगले कुछ सालों तक उसपर लगाम लगी रहेगी। वैसे भी अम्बेडकर साहेब कह गए की हर दसवें साल हमें अपनी मुद्रा जो सबसे ज्यादा प्रचलन में हो उसे बदल देना चाहिए।
छठ महापर्व सिर्फ लोक आस्था का पर्व नहीं है यह एक ऐसा पर्व है जो प्रकृति में आस्था को जागृत करता है और मनुष्य का प्रकृति के प्रति आगाध प्रेम को दर्शाता है। मैं तो इससे ज्यादा ऊपर जाकर यह कहूंगा कि यह एक मात्र हिन्दू पर्व है जिसमे किसी भी तरह की प्राकृतिक क्षति को व्यवहार में नहीं लाकर प्रकृति के प्रेम को दर्शाया जाता है जो किसी और हिन्दू पर्व में नहीं है।
आज 15 अगस्त को हर कोई सोशल मीडिया पर अपनी अपनी देशभक्ति प्रदर्शित करने में लगा हुआ है अपने अपने तरीके से। हर किसी के प्रोफाइल को देखकर ऐसा लगता है जैसे अगर आज अँगरेज़ होते तो सोशल मीडिया के वीर उन्हें कुछ ही मिनटों में निकाल बाहर फेंकते।
कांग्रेस की सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ गया था। अपने काम के लिए किसी भी दफ़्तर में गए तो बिना पैसा दिए जनता का काम ही नहीं हो रहा था। बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण महंगाई भी बढ़ गई थी। देश की जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त हो गई थी। भ्रष्टाचार को रोके बिना देश की प्रगति को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। क्योंकि भ्रष्टाचार ही है जो विकास की गति को आगे बढ़ने से रोकती है।
आने वाला समय नए साल का स्वागत और पुराने साल की अच्छे से विदाई कहने का वक़्त है। यह समय है पुराने समय की अच्छी बातो को याद करके उसके सहारे आगे बढ़ने की और बुरे समय को भूलने। यह समय है जीवन में कुछ नयी शुरुआत करने का। नया साल हमेशा सबके लिए कुछ ना कुछ सन्देश ले के आता है। हम सबको इस बात को समझना चाहिए जो कुछ भी गलत हुआ पिछले साल में उसके पीछे कोई ना कोई वजह रही होगी और उन गलत बातों को भूल के आगे बढ़ना चाहिए।