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Saturday, 22 June 2019

मुज़फ़्फ़रपुर एक घटना या सरकारी उदासीनता

बड़े दुःख की बात है हम 21वी सदी में है और चांद पर पैर रखने वाले है। लेकिन जो भविष्य है, आज भी बेमौत मर रहे है किस वजह से वह भी एक मामूली सा बुखार से जिसकी रोकथाम में अहम योगदान जागरूकता का भी हो सकता है। हर वर्ष जब एक ही समय में सालों से यह दस्तक दे और सरकारों को यह भी पता हो कि इसकी जागरूकता से इसपर काबू किया जा सकता है फिर सरकारे ऐसा लगता है सोई रहती है इस तरह के किसी बड़ी घटना के घटने के इंतजार में।

हम सभी को पता है कि कुपोषित और कमज़ोर शरीर में बीमारियों का आक्रमण आसानी से होता है। दो भोजन के बीच 4 घंटे से अधिक के गैप से कमज़ोर शरीर और अधिक कमज़ोर हो जाता है। ऐसे में इस तरह के बुखार आने की सम्भावना बढ़ जाती है। "इसके आक्रमण से 4-6 घंटे में सर में एक द्रव्य जमा होने लगता है जिससे मस्तिष्क पर प्रेशर बढ़ता है और वहाँ से होने वाला सारे शरीर का कंट्रोल बंद होने लगता है।" यह किसी रिपोर्ट में पढ़ा था।

शरीर में बुखार से पहले सोडियम कम होता है। नमक में सोडीयम है और चीनी में शुगर जो घरेलू ओआरएस का घोल है जो वास्तव में यही घरेलू और प्राथमिक उपचार है। ऐसे में यदि किसी भी बुखार पीड़ित को प्रारम्भिक उपचार मिले तो वो या तो ठीक हो जाएगा या फिर अस्पताल ले जाने तक वह जीवन से लड़ता हुआ पायेगा।

यह समस्या क्या और कितनी बड़ी है, हम इसमें कितना योगदान दे सकते हैं यह सोचने के साथ साथ सहायता करने की भी जरूरत है। सवाल उठता है की हमें करना क्या चाहिए? सबसे पहले तो अभी चल रहे सारे प्रयास जारी रहना चाहिए चाहे वो सरकारी हो गैर सरकारी हो। हमें यह मानकर चलना चाहिए की हर घर सेवा पहुँचाना सम्भव नहीं है लेकिन सरकारी मदद की दरकार अवश्य है जिसके बिना यह संभव नही। ऐसे मामलों में जागरूकता बढ़ा रही संस्थाएँ सबसे अधिक कारगर होंगी जो ऐसे मामलों में सबसे बड़ी वजह भी होती है तो हमे लोगों में बीमारी और उससे बचने की सूचना पहुँचा कर जागरूकता बढ़ाना चाहिए। हम लोगों को बताएँ की नमक और चीनी नामक रामबाण इलाज उनके घर में ही है। वो बच्चों के खाने के बीच अधिक समय का गैप न दें। खुली और साफ़ हवा देकर या गिली पट्टी कर बुखार को बढ़ने से रोके। साफ़ सफ़ाई का ध्यान रखते हुए मरीज़ को जल्द से जल्द अस्पताल ले जाएँ। जगह जगह पर्चे बाँट कर या लगाकर भी ऐसा कर सकते है। छोटे माइक लेकर लोगों को जमा कर उन्हें रिकॉर्डिंग सुना सकते हैं या नुक्कड़ सभा कर जागरूकता फैला सकते हैं।

ऐसे में यह भी ध्यान रहे की हम कोई ग़लत सूचना न फैलाएँ। UNICEF की टीम वहाँ काम कर रही है और वे लोग 2012 से ही इस पर काम भी कर रहे हैं। तकनीकी बातें वे बेहतर समझते है।

शुरुआती दौर में सोने के बाद प्रशासन अब क्रियाशील हुए है इसकी कई वजहें हैं जैसे सवयंसेवी संस्थाओं, सरकार और मीडिया का दबाव। प्रशासन को सहयोग करना सभी स्वयंसेवी संस्थाओं का काम है और वो कर भी रहे हैं।

हमें हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए की सीमित संसाधनों के रहते अचानक से आये महामारी को सम्भालना आसान नहीं। याद करिये जब अचानक से दिल्ली में डेंगू और चिकुनगुनिया के मामले बढ़ने लगते है तब यही विश्वस्तरीय दिल्ली उसको संभालने में नाकाम दिखने लगती है। सरकारों द्वारा संसाधन को जनसंख्या के अनुपात में नही बढ़ाने और कारगर तरीके से काम नही करने का दोषी अवश्य ठहराए जाने चाहिए। ये ग़लत समय और मौका होगा की डॉक्टर या अस्पताल पर सवाल उठाने का, क्योंकि उन्हें जो मिलता है उसी संसाधनों में काम करने होते है यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि एक ही समय हर वर्ष एक तरीके से आपदा एक ही क्षेत्र के आस पास दस्तक दे तो यह उनकी जिम्मेदारी बनती है कि इसके बारे में जनता के बीच जागरूकता फैलाये और अस्पताल में उसी तरीके से तैयारी किये जाय। मेरी समझ से डॉक्टरों को दोषी ठहराने से हम उनकी कार्यक्षमता को और कम करेंगे। हमें उन पत्रकारों की भी भर्त्सना करनी चाहिए जो बिना ICU में जाने की तैयारी किये बिना माइक लेकर डॉक्टरों से सवाल करते है। उन्हें डॉक्टरों से सवाल के विपरीत अस्पताल प्रशासन या सरकारी तंत्र से ये बाते पूछनी चाहिए। इसको पत्रकारिता तो नही ही कहेंगे यह कुछ लोगो के लिए साहसिक काम लग सकता है लेकिन यह उससे बड़ा मूर्खतापूर्ण कार्य भी है।

हम सरकारों से सवाल तभी पूछते है जब ऐसी घटनाएं होती है। चाहे मुजफ्फपुर में AES (Acute Encephalitis Syndrome) से हो रही मौते हो या गोरखपुर में हो रही मौते हो या दिल्ली जैसे शहर में डेंगू या चिकुनगुनिया से हो रही मौते हो। हम कुछ दिनों बाद सब कुछ भुल जाते है तो सरकारे भी भूल जाती है। जबकि यह सारे मुद्दे तबतक जीवित रहने चाहिए जबतक इसका पूर्णरूपेण समाधान ना हो जाये। यह सारे मुद्दे कही ना कही स्वास्थ्य, पर्यावरण और कुपोषण से जुड़े मुद्दे है जो हमारे चुनावो में ये मुद्दे नही होते है। अब समय आ गया है कि ऐसे मुद्दे उठाए जाएं और बार बार उठाये जाय।

Saturday, 16 February 2019

पुलवामा हमले के बाद भारत को क्या करना चाहिए?

पुलवामा हमले के बाद भारत को क्या करना चाहिए?

पुलवामा हमले में हुई क्षति के लिए हमारी संवेदना उन परिवारों के साथ है जिन्होंने अपनो को खोया है। कोई भी शब्द इसकी भरपाई नही कर सकता है।

पुलवामा हमले में भारतीय जवानों के ऊपर हुई कार्यवाही को कायराना माना जायेगा। देश मे उपजे आक्रोश को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नही की लोगो को एकमात्र उपाय आर या पार ही दिख रहा है। क्या यही एक उपाय है मेरे ख्याल से शायद नही? क्योंकि इसके अलावा और भी कदम है जिसको भारत सरकार उठा सकती है जिससे सरहद पार देश को सोचना पड़ेगा। मैं निम्नलिखित बातों पर अमल करने के केंद्र सरकार से अपेक्षा करता हूँ:-
१) MFN का दर्जा समाप्त (कर दिया गया)।
२) भारतीय राजदूत को ना कि सिर्फ बुलाया जाय बल्कि भारतीय उच्चायोग को तब तक बंद कर देना चाहिए जबतक पाकिस्तान की तरफ आगे कोई हमला नही होने का संयुक्त राष्ट्र में लिखित आश्वासन ना मिल जाय।
३) रेल सेवा के साथ साथ बस सेवा को भी बंद कर देना चाहिए।
४) भारत का हवाई क्षेत्र को पाकिस्तान से उड़ने वाले या पाकिस्तान को जाने वाले सभी हवाई उपयोग के लिए प्रतिबंधित कर देना चाहिए।
५) संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के पक्ष को मजबूती से बार बार उठाना चाहिए।
६) बलोचिस्तान को खुलकर कूटनीतिक समर्थन देना शुरू करना चाहिए।
७) अफगानिस्तान के पूर्वी सीमा जो पाकिस्तान को लगती है वहाँ पर काम करने के क्षेत्र को बढ़ाना चाहिए।
८) भारत के अंदर किसी भी भारतीय द्वारा पाकिस्तान जिंदाबाद जैसे नारे को पूर्णतः प्रतिबंधित कर देना चाहिए कोई भी ऐसा करते हुए पकड़ा जाएगा तो उसको IPC के तहत कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए।
९) कश्मीर के लिए अलग से नीति बननी चाहिए जो भारत को मानेगा उससे बात होगी जो उसकी आजादी की बात करेगा उससे बात नही होगी साथ मे उसपर कानूनी कार्यवाही भी होगी।
१०) सेना को पाकिस्तानी सीमा पर लगातार कुछ ना कुछ करते रहने चाहिए ताकि पाकिस्तान कुछ ऐसा करे जिससे उसकी संयुक्त राष्ट्र में छवि को सबके सामने पेश किया जा सके। अगर इधर एक गोला गिरे तो उधर चार गिरने चाहिए और लगातार होते रहने चाहिए।
११) घुसपैठ शब्द को आतंकवाद शब्द से बदल देना चाहिए। हमे अपने संविधान में सीमापार से हुए किसी भी तरह की घुसपैठ को आतंकवाद कहा जायेगा। कोई अच्छा या बुरा आतंकवाद नही हम सिर्फ आतंकवाद को मानेंगे और उसी के हिसाब से हम अपनी प्रतिक्रिया देने को स्वतंत्र होंगे।
१२) किसी भी तरह के व्यापार पर प्रतिबंध।
१३) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर जगह पाकिस्तान को आर्थिक रूप से अलग थलग करने की कोशिश जारी करनी चाहिए।
१४) पाकिस्तान से कोई भी सांस्कृतिक आदान प्रदान के नाम पर किसी भी तरह रिश्ता नही रखेगा चाहे वो फिल्मकार हो साहित्यकार हो या राजनेता।
१५) पाकिस्तान के साथ लगने वाले सभी बॉर्डर को तत्काल प्रभाव से बंद कर देने चाहिए।
१६) किसी भी तरीक़े की राजनैतिक बातचीत तबतक नही होगी जबतक पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में लिखित में इस बात का आश्वासन ना दे दे कि अब उनकी जमीन भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए उपयोग नही होगी।

धन्यवाद।

Saturday, 8 September 2018

सोशल मीडिया का मकरजाल

जिंदगी कितनी खुबसूरत होती है, जब आप किसी राजनैतिक पार्टी की ना तो तरफदारी करते है, ना ही विरोध करते है। खासकर तब जब आप ना तो कोई टीवी डिबेट देखते है और ना ही सोशल मीडिया पर दोस्तों का टाइमलाइन देखते है। और तो और किसी भी पेपर को पढने के बाद उसकी किसी बात को दिल पे ना लेते हुए उसको एक जानकारी का साधन समझते हुए पढ़ जाते है। किसी नेता को फॉलो करने के बाद भी उसके किसी बात पर कोई टिपण्णी नहीं करते है तो वाकई में लगता है जिंदगी कितनी खुबसूरत है। अपने में मग्न, क्या करना है और क्यों करना है ऐसी बातो पर बहस। जब ना तो सरकारे बदलती है ना सरकारों के काम करने का तरिका तो क्यों ना चुपचाप अपनी जिंदगी को बेहतर तरीके से जीने की कोशिश की जाए।
क्यों ना किसी गरीब की किसी प्रकार से सहायता के बारे में सोचना चाहिए। सरकारे आती जाती रहती है उसके काम करने का तरीका नहीं बदलता है, क्योंकि उनके रिसोर्स तो वही रहते है तो कैसे कोई सरकार बदल जाए कोई घोटाले करने में मस्त है फिर भी हम बुद्धिजीवी बने अपने शब्दों के जाल में एक आम आदमी को भटकाए रहते है। उसने तुम्हारे लिए क्या किया था/है हमने तो तुम्हारे लिए ये किया था/है सरकारे बदलती है सोच तो बदलती नहीं क्योंकि सोच तो वही है जिसको हम नौकरशाह कहते है। बुद्धिजीवी वही है जो कल भी वही थे आज भी वही है बस उनके शब्दों का जाल थोडा सीधा/उल्टा हो गया है।

यही एक भ्रमजाल है जिसके अन्दर हमें एक ऐसे चक्रव्यूह में डाल दिया जाता है। जिसके अन्दर हम अभिमन्यु की तरह लड़ते लड़ते आखिर में अपना दम तोड़ देते है और डालने वाले कौन होते है यही चंद राजनेता, यही चंद बुद्धिजीवी तथा यही चंद नौकरशाह नामक दुर्योधन, कृपाचार्य और कर्ण नाम के योधाओ के मध्य अभिमन्यु की तरह मारे जाते है। जिसे यह भान/खुशफहमी होता है की वह यह जाल तो तोड़ ही देगा और इसी भ्रम में इनके चक्रव्यूह में एक बार घुस गए तो हम भी उसी अभिमन्यु की तरह आखिरकार वीरगति को प्राप्त हो जाते है। और हमारी वीरगति के बाद हमें ऐसे दफनाया/जलाया जाता है जैसे हमने कोई ऐसा काम किया है जिसको आजतक किसी ने नहीं किया है। लेकिन वही जब यह युद्ध ख़त्म होता है तो हमारे बारे में किसी को पता तक नहीं होता है। आखिरकार कौन बचता है वही नौकरशाह नमक कृपाचार्य, नेता नमक दुर्योधन तथा बुद्धिजीवी नामक कर्ण के पुतले लगते है और इन्ही की किताब छपती है जिससे ये पैसे भी कमाते है और बाद में शौर्य पुरष्कार या कोई नागरिक पुरस्कार देकर इनको इतिहास में नाम दे दिया जाता है।

बेहतर है अपने में खुश रहिये अपने आस पास देखिये सबको खुश तो नहीं किया जा सकता है लेकिन सबके साथ खुश जरुर रहा जा सकता है।
धन्यवाद

Wednesday, 22 August 2018

बिहिया कांड और हमारी मानसिकता

बिहिया कांड और हमारी मानसिकताबिहार के बिहिया में हुई घटना पुरे समाज को शर्मसार करने वाली है लेकिन शायद हमें कोई फर्क पड़ता हो क्योंकि वहां ना तो हमारा कोई रिश्तेदार है ना ही यह घटना हमारे किसी जानने वाले के साथ हुई है तो बेकार में अपना खून क्यों जलाना। कब हम ऐसी घटनाओं पर कुछ नहीं कर सकते है तो कम से कम अपनी प्रतिक्रिया तो देना शुरू करे। क्या ऐसी घटनाओं का भी किसी राजनैतिक पार्टियों से लेना देना होता है या किसी एक पर इसका ठीकरा फोड़कर आगे बढ़ा जा सकता है शायद नहीं। चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो या किसी भी पार्टी से ताल्लुक रखने वाले नेता हो हम आम आदमीं है इसके बारे में बिना किसी पार्टी से पक्षपात किये हम ऐसी घटनाओं की भर्त्सना कर सकते है।

बिहार एक ऐसी धरती है जहाँ ऐसी घटनाओं के लिए नैतिक तौर पर कोई जगह नहीं है चाहे वह इतिहास में से किसी का भी शासनकाल रहा हो। यही वह धरती है जहाँ बुध्ध और महावीर तक ने दो नए शान्ति धर्मो को विश्व के सामने लाया। यही वह धरती है जहाँ की नालंदा या विक्रमशिला विश्वविद्यालय मशहूर हुई। यह वही धरती है जहाँ जय प्रकाश नारायण से लेकर कर्पूरी ठाकुर जैसे इमानदार राजनेता पैदा हुए। आचार्य विष्णुगुप्त हो या अशोक या शेरशाह सूरी सबकी कर्मभूमि यही रही है फिर ऐसा क्या है जो आज हम इतने कमजोर है की हम एक आवाज तक नहीं उठा सकते है।

यह सिर्फ शर्मिंदा करने या होने वाली घटना नहीं है जिसके ऊपर दो शब्द या दो मिनट का मौन धारण कर चिंता जता दी जाय। यह एक ऐसी शर्मनाक घटना है जिसके हम या हम जिस समाज में रहते है वह जरुर जिम्मेदार है। क्योंकि भीड़ के मार डालने वाली घटना तो बहुत सुनी होगी लेकिन बिहिया में हुई घटना में उन दो चार दस लडको के पीछे चलने वाले क्या भीड़ नहीं थे या ये भीड़ सिर्फ दिखावे के लिए था और यह भीड़, भीड़ नहीं बल्कि यह एक हिजड़ो की फ़ौज थी। लेकिन शायद अगर यही घटना हिजड़ो की बस्ती में हुआ होता तो शायद ही कोई भीड़ ऐसा करने की हिमाकत कर पाता। जिन लडको ने इस घटना को अंजाम दिया है वह किसी ना किसी का भाई, बेटा या पिता अवश्य होगा। क्या ऐसे लोग घर जाकर अपने परिवार में घर की औरतो से आँख में आँख मिलाकर बात कर पाते होंगे। ऐसे लोग हमारे समाज का ही एक हिस्सा है। यह एक ऐसी मानसिकता है जिसमे हर कोई अपने परिवार की औरतो को छोड़कर सभी औरतो को निवस्त्र देखना चाहता होगा तभी यह भीड़ उस घटना के पीछे पीछे चल पड़ी। इसी भीड़ में से कुछ लोग मोबाइल से विडियो बनाकर वायरल करते है और हमारा समाज मूकदर्शक बना रहता है।

यह कैसे मानसिकता है जो हमें मजबूर कर रही है ऐसी घटनाओं की अनकही गवाह बनने का लेकिन हम ना तो कुछ बोलते है ना ही करते है ना ही हम सरकार से सवाल करते है। क्यों राजनीती के चक्कर में हम समाज में हों रही कृत्यों को भी राजनीती के चश्मे से देखना बंद नहीं कर पाते है। क्या समाज में किसी बेटी की इज्जत में भी यह पार्टी या वह पार्टी या यह समुदाय या वह समुदाय की हो सकती है? एक लड़की को लड़की की नजर से देखने की आवश्यकता है वह हममे से किसी एक की बेटी है की नजर से देखने की आवश्यकता है। जो लोग ऐसी घटनाओ को इधर या उधर की नजर से देखते है वे कभी भी किसी एक घटना के बारे में सर्वसम्मत नहीं हो सकते है ना ही वे किसी एक घटना के प्रति निष्ठावान ह सकते है, ना ही इनका कोई ठोस राय होता है किसी एक मुद्दे के प्रति।

हमें हर ऐसी घटना चाहे वह मुजफ्फरपुर हो या दरभंगा या बिहिया जैसे घटना हो। हर घटना की आम आदमी के तौर पर जिम्मेदारी से नहीं बच सकते है हम सबको एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। अगर आपके भी दिल में दुःख होता है ऐसी घटनाओं से जागिये और बोलिए इससे पहले की देर हो जाय। जहाँ भी जैसे है अपनी तरफ से बोलिए लोगो को जागरूक कीजिये समाज के प्रति हमारी अपनी भी एक जिम्मेदारी बनती है। यह मत भूलिए की जो भी ऐसा करता है हम भी उसी समाज का एक हिस्सा है।

धन्यवाद

Tuesday, 1 May 2018

समाज में होने वाले दुष्कृत्य का जिम्मेदार कौन?

बिहार में एक तेरह साल की बच्ची के साथ कुछ अल्पवयस्क लड़कों ने सड़क पर जो घिनौना दृश्य प्रस्तुत किया वह कही से भी एक सभ्य समाज के लिए सही नहीं कहा जा सकता है तो इसका क्या मतलब हम समाज को भेड़ियो का समाज या सांपो का समाज या जानवरों का समाज कहना शुरू कर दे। शायद नहीं क्योंकि अगर किसी समाज में एक मुठ्ठी भर ऐसे असामाजिक दुस्चरित्र वाले लोग रहते हो तो समाज को सोचना पड़ेगा। क्या ऐसी छेड़छाड़ की घटनाए सिर्फ लड़कियों के साथ होती है शायद नहीं क्योंकि एक रिपोर्ट के अनुसार जितनी संख्या में लड़कियां ऐसी घटनाओ की शिकार होती है उससे कही ज्यादा अल्पवयस्क बच्चे ऐसी यौनउत्पीडन के शिकार होते है इसी वजह से सरकार ने POCSO Act 2012 में बदलाव किया है जिसमे यौन उत्पीड़न के मामलो में अब लड़कियों के साथ लडको को भी शामिल किया है।

इस विडियो में सारे लड़के जो इस घटना में शामिल है ऐसा लगता है सभी अल्पवयस्क है इसको शत प्रतिशत दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन कुछ तो है ही तो आप सोचिये की समाज में मानसिकता किस हद तक नीचे जा चुकी है। ऐसी घटना जो दिन दहाड़े एक रोड पर ऐसी घटना का होना यह दर्शाता है समाज की इस नैतिक ह्रास के कही ना कही हम भी जिम्मेदार है। हिम्मत देखिये एक अल्पव्यस्क मोबाइल से शूट कर रहा है, जो कि बाद में सोशल मीडिया पर डाल दिया गया। ऐसा लगता है घटना के वक्त कुछ लोग आसा पास में है लेकिन किसी ने भी उस लड़की को बचाने की कोई कोशिश नहीं की वह लड़की खुद ही लड़ती रही, लड़के हँसते रहे, और उसके कपड़े फाड़ते रहे। ये किस तरह की दरिंदगी है जहाँ हम उस लड़की को बचा नहीं पाते है जिसकी वजह से हम मर्दों का अस्तित्व है अगर हमारी बहन, माता बेटी ना हो तो हमारा कोई अस्तित्व नहीं है यह हम सबको समझना होगा।

मैं पहले भी कहता रहा हूँ अगर हम ऐसी घटनाओं को रोकने में असफल हो रहे है तो कही ना कही सामाजिक तौर पर ऐसे समाज के साथ साथ उसमें रहने वाले ऐसे लडको से ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं। आप ऐसी घटनाओं के लिए हमेश सरकार को नहीं जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते है क्योंकि इसमें पुलिस या प्रशासन तो तब हरकत में आएगी जब अपराध का संज्ञान उस तक पहुंचेगा, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी है की जब भी ऐसे केस उनके सामने आये वे पूरी संवेदनशीलता के साथ इसको अपने परिवार में हादसा समझकर इसको अंत तक ले जाए जिससे आगे ऐसा करने वाले के ऊपर पुलिस या प्रशासन का भय पैदा हो।

ऐसी घटनाओं का ऐसे समय पर होना जब माहौल इन मुद्दों को लेकर गर्म है और हर आदमी कठुआ, उन्नाव और ग़ाज़ियाबाद की बातें कर रहा है? क्या सच में अपराधियों का मन बढ़ गया है या फिर समाज उदासीन हो गया गया है? हालाँकि पुलिस ने एक्शन लेते हुए कुछ अपराधियों को गिरफ़्तार कर लिया है, लेकिन कठुआ के संदर्भ में जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री का यह बयान आना कि कठुआ जैसी घटना एक छोटी सी घटना है, जिसे तूल नहीं देना चाहिए। लेकिन कोई भी ऐसी घटना क्या इतनी छोटी होगी जब ऐसे ताकतवर नेताओ के परिवारों के साथ घटित होगी। चाहे घटनाएं किसी के साथ भी हो ऐसा घटनाएं समाज के माथे पर कलंक की तरह है जो किसी भी सभ्य व्यक्ति को नागवार गुजरेगी।

चाहे ऐसी घटनाएं किसी लड़की के साथ भी हो हम सबको आगे आकर हर ऐसी घटना की निंदा करनी होगी और अपने सामाजिक परिवेश में रह रहे अगली पीढ़ी को संवेदनशील बनाना पड़ेगा ताकि वे कीसी की भी बहन, बेटी और माँ की इज्जत करना सीखे ना की सिर्फ अपनी बहन, बेटी या माँ की। दिन दहाड़े सड़क पर एस घटनाओं के जिम्मेदार हम खुद ही है कही ना कही तो आइये हम सब मिलकर ऐसी किसी भी घटना की जिम्मेदारी लेकर समाज को उत्कृष्ट बनाने की कोशिश में अपना अपन योगदान दे ताकि हमारी आगे वाली पीढ़ी एक स्वस्थ, सुन्दर और सुरक्षित समाज में सांस ले सके।

#JusiceForAll #JusiceForAllGirl #BoycottRapist

Wednesday, 28 March 2018

सोशल मिडिया पर डेटा चोरी

लोग डेटा चोरी का आरोप प्रत्यारोप वाला खेल में मग्न है लेकिन जब आप 10 रुपैया कैशबैक के चक्कर मे अपना फ़ोन नंबर, ईमेल आईडी या अपना लोकेशन शेयर करते है तब शायद आप यह नही सोचते है। लेकिन चूँकि राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी ने एक दूसरे के प्रति यह बात उठाई है तो कही ना कही हम भारतीय पैदायशी राजनैतिक गुरु होने के नाते हम भी इस छींटाकशी में सम्मिलित हो जाते है।

क्या आप आज की तारीख में अगर आप स्मार्टफोन उपभोक्ता है तो सोच सकते है किसी भी एप्प को मैं अपना मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी या अपनी लोकेशन नही दूँगा तो बेहतर है आप बेसिक मोबाइल ही उपयोग कर लीजिए। क्योंकि स्मार्टफोन का मतलब साफ है आप कही ना कही आप किसी ना किसी एप्प को अपनी व्यक्तिगत जानकारी दे ही रहे है चाहे ना चाहते हुए ही सही लेकिन आप दे तो रहे है उन्हें अपने डेटाबेस में संग्रह करने के लिए फिर क्यों इतना हाय तौबा क्या इसीलिए क्योंकि आपकी अपनी राजनैतिक पार्टी आप जिसका समर्थन करते है उन्होंने अपनी विपक्षी पार्टी पर आरोप लगाया है।

आप यही उस भ्रमजाल में फंस रहे है जिसका नाम शार्क है आप कही भी जाएंगे एक शार्क से बचेंगे लेकिन दूसरी शार्क आपको निगलने के लिए तैयार बैठी है। तो आप यह मान के चलिये की आपका निगला जाना तय है तो आप किस शार्क के द्वारा निगल जाना पसंद करेंगे यह आपकी इच्छा पर निर्भर है।

आपको दुनिया मे कोई भी चीज मुफ्त में उपलब्ध नही है तो आप सोचिये की जिसका आप अपने हाथ मे रखे स्मार्टफोन से इतना ज्यादा इस्तेमाल करते है तो एक सॉफ्टवेयर अभियंता से पता कीजिये उसका मूल्य क्या हो सकता है जिसका आप बिना किसी मूल्य के उपयोग कर रहे है तो आपको खुद बखुद अंदाजा हो जाएगा कि आपको मुफ्त में क्यों मिल रहा है। अगर इतनी महंगी चीज आपको मुफ्त में मिल रही है तो सोचना आपको होगा कही आप खुद तो पैसे बना के तो नही दे रहे है। जी आप खुद उसके ग्राहक है जिसको वह पैसे के लिए कभी भी कुछ भी परोस रहा है।

जितनी मेरी अनुभव कहती है उसके हिसाब फेसबुक या कोई भी ऐसी जगह जो आपको मुफ्त में इतनी सारी सूचनाएं प्रदान करता है कही ना कही आपकी गोपनीयता को गोपनीय तरीके से किसी ना किसी प्रकार किसी और को गोपनीय तरीके से परोस रहा है।

तो सिर्फ सुरक्षा संबंधी बातो का ध्यान ना रखे अपने प्रोफाइल से हो रही गतिविधियों के प्रति सजग रहे। क्योंकि 99℅ भारतीय जो सोशल मीडिया उपयोग करते है उनको यह पता तक नही होता है कि क्या हो रहा है कैसे हो रहा है। और कई बार ऐसी बाते साझा करते है जिनके बारे में बाद में पछताते है। जिससे आपकी पसंद, नापसंद, खाना, पीना, अच्छा,खराब, आप कहाँ कहाँ जाते है सबकी जानकारी साझा करते है जिससे एक आम इंसान भी आपके प्रोफाइल को देखकर आपके बारे में 80% बाते बता सकता है।

सजग रहिये सतर्क रहिये।
जय हिंद जय भारत।

Friday, 14 July 2017

पढ़े लिखे लोगो का समाजवाद या ढोंग

मुझे आश्चर्य होता है जब प्रतिष्टित कहे जाने जैसे संस्थानों में पढ़े लिखे लोग बड़ी ही सावधानी से गरीब गुरबों की आवाज उठाने के नाम पर लालू यादव जैसे नेता का महिमामंडन करते है। जी हाँ ये वही लोग है जब लालू प्रसाद का बिहार की राजनीति में उदय हुआ तो इनलोगो ने कहा देखो इस व्यक्ति को कोई जानता तक नही था और आज मुख्यमंत्री है। लेकिन कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद बिहार सदन के नेता चुने गए और मुख्यमंत्री बनाये गए। अगर उस समय किसी समुदाय ने इसका विरोध किया तो यही समुदाय था कहते नही थकते थे कि इस आदमी को बोलने तक नही आता है और यह बिहार की मुख्यमंत्री बना बैठा है। इन सबके बावजूद लालू प्रसाद ने अपने अस्तितव को बचाने के लिए पिछड़े वर्ग की राजनीति शुरू की। याद रखिये यह वही दौर था जब बी पी मंडल का मंडल आयोग आया जिसका पूरे देश मे विरोध किया गया। और लालू प्रसाद के उस समय शुरू की गई पिछडो की राजनीति ने जो बिहार में पिछड़ो को आवाज दी और बिहार में एक नई राजनीतिक धुर्वीकरण का प्रादुर्भाव हुआ जिसने बिहार के साथ साथ देश के दो बड़े राज्यो में राजनीति की दिशा ही बदल दी। और यही से शुरू हुआ कहावतों का दौर जिसमे यह कहा जाने लगा कि जब तक रहेगा समोसे में आलू तबतक रहेगा बिहार में लालू। और यह कतई नही भूलना चाहिए कि बिहार में लगातार दो बड़ी विजय क्यों मिली क्योंकि बिहार के पिछड़े जिनके पास आवाज तक नही थी उनको लालू प्रसाद ने आवाज दी और राजनीति में उनके लिए दरवाजे खोल दिये। ध्यान रहे यही से शुरू हुआ लालू प्रसाद का नैतिक पतन जहाँ उन्होंने पिछड़ो की राजनीति के अलावा यादवों और मुस्लिमों की राजनीति शुरू की और दूसरी पिछड़ी जातियाँ जो उनको मसीहा समझ रहे थे, अपने आप को ठगा हुआ समझने लगे थे। यही से निरंकुशता शासन की तरफ से इस कदर बढ़ गयी जहाँ सिर्फ जाती देखकर सारे काम होने लग गए। सड़को का खस्ताहाल शुरू हो गया। शिक्षा में नैतिक पतन शुरू हुआ क्योंकि शिक्षकों को समय पर वेतन नही मिलने से वे ठगा सा महसूस करने लग गए थे। सबसे बुरा दौर तब शुरू हुआ जब मौत और अपहरण का तथाकथित उद्योग शुरू हुआ जिसने बिहार को सबसे ज्यादा बदनाम किया। और बाहर रहने वाले बिहारियों को बिहारी गाली लगना शुरू हुआ। सबसे बड़ा टैग तो पटना उच्च न्यायालय ने जंगल राज कह कर कोई कसर नही छोड़ी। पढ़े लिखे लोगो का पलायन जो तब शुरू हुआ जो बदस्तर आज भी जारी है। और उनलोगों ने तब यह कहना शुरू कर दिया था कि अब बिहार रहने लायक नही रहा और वे जब तब अपने आप को बिहारी कहने से अलग रखने लगे। यही नीतीश कुमार का प्रादुर्भाव हुआ, और जो दूसरी पिछड़ी जातियाँ लालू प्रसाद से अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे थे, नीतीश कुमार जी मे नई आशा की किरण की झलक दिखाई दी। जिसका फल यह हुआ कि नीतीश कुमार जी को नई आशा के साथ प्रदेश की बागडोर दी और पहले दो बार चुनाव जीतकर लोगो के भरोसे को कायम रखकर जिस तरह का जिन्न लगा होता था बिहारियों के सिर पर नीतीश जी ने उसको बहुत हद तक धोने का काम किया।

वाकई में लालू प्रसाद जी ने गरीब गुरबों को आवाज दी लेकिन उसकी कीमत चुकानी पड़ी बिहार को। उसकी भरपाई करने आगे आये नीतीश जी मे एक साफ स्वच्छ और सुलझे हुए नेता ने बिहार को कुछ कदम आगे ले जाने में सहायक सिद्ध हुए। लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के चलते हुए महागठबंधन ने बिहार की जनता के मन मे एक बार फिर संशय पैदा किया जिसकी वजह से नीतीश जी को पिछले चुनाव से कम सीट मिली।

जो बचपन से बाहर रहकर पढ़ लिख लिए औऱ बड़े संस्थानों में पढ़ने के बाद उनकी एक अलग विचारधारा बन जाती है जिसको पूरे संसार मे नकारा जा चुका है। और उन्हें जब अपनी जमीन खिसकती नजर आती है तो कभी कॉग्रेस के साथ कभी क्षेत्रीय पार्टियों से मिलकर अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए तथा इन पढ़े लिखे लोगो का सहारा लेकर बड़े बड़े लेख लिखकर लोगो को गुमराह किया जाता है। ये जो साल में एक आध बार गाँव चले जाते है तफरीह के लिए उन्हें क्या पता जो गरीब लालू प्रसाद के शासन के समय बिहार में रहने को मजबूर थे, उन्होंने देखी है शासन की भयावहता। अगर किन्ही को नही मालूम तो वे कृपया मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, पूर्णिया में रहने वाले लोगो से पता करे कि कैसी नारकीय जीवन व्यतीत की है। इन जिले के लोगो से व्यक्तिगत लगाव रहा है इसीलिए बेहतर तरीके से जानता हूँ। तो अगर आपको बुद्धिजीवी होने के नाते लगता है कि लालू प्रसाद जी, नीतीश कुमार जी से बड़े नेता है तो हाँ वे है क्योंकि वाकई में उनका जनाधार नही घटा लेकिन उनकी साख को जो धक्का पहुँचा है उसकी भरपाई होगी या नही आने वाला चुनाव बताएगा। मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी का समर्थक नही रहा हूँ लेकिन नीतीश जी ने कुछ ऐसे फैसले लिए, जब बिहारी अपने अस्तित्व की लड़ाई रहे रहे थे तब एक चिराग दिखाई दिया था अंधेरे में। अगर आपको बुद्धिजीवी होने के नाते यह पता नही चारा घोटाला जो उस समय की सबसे बड़ी मानी जा रही थी। उनको भी आप हो सकता है भूल जाये तो क्या अगर कोई यह सवाल करता है कि 32 साल पहले सरकारी निवास में रहने वाला नेता हजारों करोड़ की संपत्ति का मालिक कहाँ से बन गया। तो आप इसको भी राजनैतिक साज़िश कहने में लगे हुए है। तो मुझे तो आपकी पढ़ाई पर शक होता है जो एक भ्रस्टाचारी या एक साफ सुथरी छवि के नेता में अंतर समझ नही पाता है। सनद रहे लालू प्रसाद जी को उच्चतम न्यायालय ने कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया हुआ है। नीतीश कुमार जी की सहयोगियों पर भले ही कई भ्रस्टाचार के आरोप लगे हो लेकिन उनपर व्यक्तिगत तौर पर कोई भ्रस्टाचार का आरोप नही।
बेहतर है थोड़ा पढ़े लिखे होने का परिचय दे ताकि पढ़े लिखे लोग आपको सम्मान की नजर से देखे। आजकल सभी पढ़ लिख रहे है सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे है उन्हें आता है आप जैसे लोगो की प्रोफाइल चेक करना और आपके बारे में अपने मस्तिष्क में आपका चेहरा बना लेते है कि कही आप कोई छुपा हुआ एजेंडा तो थोप नही रहे है। अब वो जमाना नही रहा कि आप जो कहे अक्षरशः सही मान लेंगे वे उनकी पड़ताल करना जानते है कि कब आप ऐसे भ्रस्टाचारियों के पैर छूकर प्रणाम करते है और कब सेना को रेप करने वाला बताते है। और 40 साल की उम्र में ऐसे संस्थानों में मुफ्त की पढ़ाई करने वाले रोजगार को लेकर अचानक से सरकार के खिलाफ बोलने लग जाते है तो सवाल यह भी उठेंगे की जब लालू प्रसाद के समय बिहार में सभी तरह का ह्रास हो रहा था तो आपके मुँह से एक शब्द नही निकलता था। तो जनाब यह आज का दौर है जहाँ सबकुछ एक क्लिक पर उपलब्ध है तो थोड़ा संभल के रहिये, संभल के बोलिये, संभल के लिखिए।

जय भारत।
जय प्रजातंत्र।

Tuesday, 25 April 2017

​सुकमा में हुए नक्सली घटना में शहीद हुए हमारे सैनिको को श्रद्धांजलि।

सुकमा में हुए नक्सली घटना में शहीद हुए हमारे सैनिको को श्रद्धांजलि। 

ऐसा लगता यह सरकार सिर्फ कड़ी निंदा के लिए जानी जाएगी और वह किसी भी तरह की निंदा की बात की करेगी जैसे कठोर निंदा, घोर निंदा या कड़ी निंदा। पहले भी ऐसा होता रहा है। पहले की सरकारें भी ऐसी ही कड़ी निंदा करती रही है। अगर सरकार चाहे तो कुछ भी हो सकता है, क्योंकि नक्सली बहुल इलाकों में केंद्र और राज्य सरकारें अगर तालमेल बिठाकर चले तो ऐसी घटनाएं कभी हो ही नहीं। लेकिन ऐसा लगता है राज्य सरकारों की भी अपनी मजबूरियाँ है जिसके चलते वे भी कोई कड़ा कदम नही उठाते है और किसी को ठेस ना पहुंचे उसके बाद यह कहना चाहूँगा की वे ऐसा चाहते है कि होते रहे और उनकी दुकानें चलती रहे। सरकारें आती जाती है लेकिन ऐसा लगता है की सरकारी कुर्सी में ही कुछ ऐसा है जिससे वहाँ पर बैठने वालों का चरित्र वैसा ही हो जाता है जैसा एक निवर्तमान मुख्यमंत्री जी ने कहा था कि इस कुर्सी में ही कुछ ऐसा है जिसपर बैठते ही लोग एक ही तरीके से व्यवहार करने लग जाते है।

सही कहा था किसी ने, सरकारें आती जाती रहेंगी लेकिन यह मुल्क मेरे बाद भी रहेगा और मेरे कई पुस्तों के बाद भी रहना चाहिए। आइए सब मिलकर आवाज उठाएं की अब सरकारों को आम जनता की भावनाओं से खिलवाड़ ना करके उनकी भावनाओं के साथ न्याय करना चाहिए। हम गूंगी बहरी सरकार को जगा सकते है। हमे अपनी आवाज उन तक पहुंचानी है ताकि सरकारी तंत्र में बैठे लोग यह समझे कि हमारी भावनाएं क्या है और हम क्या चाहते है। हम एक एक कर मारे जा रहे है और हम इंतज़ार कर रहे ही कि कोई ऐसी घटना हो जिससे सारा संसार हमारी काबिलियत पर उंगली उठाने लग जाये। 

उठो जागो और बता दो हम क्या चाहते है और ऐसे हैवानियत के पुजारियों को जो खाद पानी शहरों में बैठकर दे रहे है उन्हें भी हमारी आवाज सुननी होगी कि वे सिर्फ एकतरफ़ा बाते नही कर सकते है। वे सिर्फ यहां पर एसी कमरों में बैठकर गरीबों के हितों की बात ना करे। हमने गरीबी देखी है और अगर वाकई में देखनी है तो चले हमारे साथ हम दिखाएंगे की गरीबी क्या होती है। फिर देखते है किस तरह के गरीबों के हितों की बात करते है। ब्रांडेड कुर्ता, जीन्स और चप्पलें पहनने वाले गरीबो के हितों की बात करते है। खोखली मानसिकता के पुजारी ये सिर्फ हल्ला कर सकते है और कुछ नही।

धन्यवाद। 

जयहिन्द, जय भारत।

नोट: यह पोस्ट राजनीति से प्रेरित नही इसीलिए अगर किन्ही को राजनीतिक कमेंट करना है तो वे ना करे।

Friday, 4 November 2016

छठ महापर्व या प्रकृति का सम्मान

wp-1478252870556.pngछठ महापर्व सिर्फ लोक आस्था का पर्व नहीं है यह एक ऐसा पर्व है जो प्रकृति में आस्था को जागृत करता है और मनुष्य का प्रकृति के प्रति आगाध प्रेम को दर्शाता है। मैं तो इससे ज्यादा ऊपर जाकर यह कहूंगा कि यह एक मात्र हिन्दू पर्व है जिसमे किसी भी तरह की प्राकृतिक क्षति को व्यवहार में नहीं लाकर प्रकृति के प्रेम को दर्शाया जाता है जो किसी और हिन्दू पर्व में नहीं है।

छठ महापर्व में डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी आस्था और और अपने विश्वास के साथ साथ लोग अपनी कृतज्ञता दर्शाते है जो किसी और पर्व में नहीं। सूर्य को अर्घ्य तो हिन्दू लोग रोज़ देते है लेकिन छठ महापर्व की खासियत यह है कि आपको नदी या तालाब में जाकर सूर्य को अर्घ्य देना होता है। अगर आप नजदीक से छठ पूजा में उपयोग होने वाले प्रसाद के रूप में या किसी भी तरह उपयोग होने वाले सामानों का प्रकृति से गहरा नाता होता है जो यह साबित करता है कि इस पर्व को मनाने वाले व्रतियों का प्रकृति के प्रति सम्मान दर्शाता है।

हम जो वाकई में प्रकृति का सम्मान करना भूल गए है यह महापर्व हमें उसके प्रति जागरूक करता है चाहे वह सामाजिक साफ सफाई की बात हो या लोगो का आपस में घाटो पर विचारो का आदान प्रदान जिसकी हमें आज के आधुनिक और डिजिटल युग में बहुत ही जरुरत है उससे रूबरू करवाता है।

आशा करते है हम जितना सम्मान इस पर्व के दौरान लोगो के साथ साथ प्रकृति का करते है उतना ही सम्मान महापर्व के ख़त्म होने के बाद भी करेंगे। यह हमारे लिए सालों भर एक प्रकार होना चाहिए तभी वाकई में सूर्य या प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची अर्घ्य होगी।

आप सभी को एक बार फिर से छठ महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं और आशा करते है यह महापर्व आपके और आपके पूरे परिवार को मानसिक शांति के साथ साथ आने साल में सुख और समृद्धि प्रदान करे।

Wednesday, 13 April 2016

दोहरे मापदंड का शिकार कौन?

अगर आप यह कहते है की JNU में जो हुआ वह बोलने की आज़ादी थी तो NIT श्रीनगर में जो हुआ वह क्या था देश द्रोह, कहाँ गए वे बुद्धिजीवी जो एक लाल सलाम का नाटक करने वाला जिसकी पीएचडी का मुख्य विषय ही अफ्रीकन पढ़ाई पर शोध करना हो और वह अफ्रीका के किसी देश में ना जाकर यही देश के अंदर नारा लगाने वाले को अभिव्यक्ति की आज़ादी खतरे में नहीं दिखती। कहाँ गए वे बुद्धिजीवी जो हिन्दुओ को गाली देना धरनिर्पेक्षतावाद समझते है। कहाँ गए वे बड़े बड़े बुद्धिजीवी जो टीवी स्क्रीन को काला करके अपने मन की भड़ास निकालते है। कहाँ गए वे जो स्टूडियो में बैठकर दूसरे पर चिल्लाकर अपनी बात कहलवाना चाहते है। कहाँ गए वे लोग जो देशभक्ति के नाम पर झंडा लेकर दुसरो की पिटाई कर रहे थे। आज भी किन्ही बुद्धिजीवी को एक कौम एक राज्य में खतरे में नहीं नज़र आती है। क्योंकि यही वह कौम है जो 90 के दशक में अपने घरो से खदेड़कर उन्हें अपने ही देश नहीं अपने ही राज्य में निर्वाषित जीवन जीने पर मजबूर किया गया। लेकिन एक व्यक्ति जो 10 व्यक्तियों की ग़लतियो की सजा भुगतता है तो इन बुद्धिजीवियों को उस व्यक्ति की कौम खतरे में नज़र आने लगती है।


फिर भी लोग मौन है क्यों।

हमे अपनी बात कहने का हक़ उतना ही है जितना इन बुद्धिजीवियों को। हमे अपनी आवाज़ उठानी है इन तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के खिलाफ़ जो अपने अवसरवादिता के तहत ये अपनी तथाकथित बुद्धिजीविता हमारे ऊपर थोपते रहते है। बस थोड़ा समय चाहिए और थोड़ा तार्किक शक्ति का परिचय दे, फिर आप इनके ही मुँह पर इनकी बात थोप सकते है। ये सारे टीवी पर बैठने वालो को गौर से देखे यह करते क्या है इनका ज्यादातर समय सरकार की कमियाँ निकालने में चली जाती है अच्छी न्यूज़ तो कोई दिखाना ही नहीं चाहता है। अगर इन सब से थोड़ा फुरसत मिल भी जाये तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की न्यूज़ के साथ अपना मिलान करके आपको बेब्कुफ़ बनाते है ताकि आपको लगे की ये भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की न्यूज़ एजेंसी है, जबकि आप नज़र डालेंगे तो आपको पता चल जायेगा इनके पास दिखाने को अपने यहाँ के न्यूज़ की वीडियो तक नहीं होती है, ये पैसा देकर न्यूज़ वीडियो लेकर अपने चैनल पर चलाते रहेंगे। तो आप खुद सोच सकते है इनकी सार्वभौमिकता और इनका प्रसारण क्षेत्र कितना बड़ा है। सोचना चाहिए हमे की हम किनके पीछे जा रहे है न्यूज़ के लिए। इनका काम सिर्फ और सिर्फ आपकी भावनाओं को भड़काकर आपके सोच को खोखला करना है ना की आपको न्यूज़ के बारे में या उसकी गहराईओं के बारे में बताना। यह आपके दिमाग पर हावी होना चाहते है ताकी इनके पीछे का सच आप ना कभी जान सके और ना ही कभी समझ सके। इतने घोटाले होते है कभी इनमे से किसी के नाम को देखा है शायद नही एक आध आ भी गए तो अपनी पहुँच से छुट जाते है। कभी आपने यह सोचा है इनके मालिक कुछ ही सालो में इतने बड़े रसूखदार कैसे बन जाते है।

ज़रा सोचिये छात्रों को देश का भविस्य बताने वाले कुछ राजनेता कुछ ही दिनों में आपको नंगे नज़र नहीं आते जब दूसरे किसी भी छात्र जो इनकी मानसिकता को समर्थन नहीं देते है तो आपको इनके व्यवहार पर ऊँगली उठाने का पूरा हक़ है। उदाहरण के तौर पर राजनेता यह कहते है आप क्या खाये , क्या पिए यह सरकार निर्देशित नहीं कर सकती है। मैं शराब को प्रतिबंधित करने को गलत नही ठहरा रहा हूँ।  लेकिन अचानक से पुरे राज्य में शराब प्रतिबंधित कर देना क्या वही सोच नहीं दर्शाता। क्या आप आमजन के बारे में यह निर्णय नहीं ले रहे है की आप यह नहीं पी सकते, तो अगर कोई दूसरी सरकार खाने पर प्रतिबन्ध लगाती है तो आपको आपत्ति हो जाती है। यह आपका दोहरा चरित्र दिखाता है। एक दूसरा उदाहरण लेते है अभी अभी इसी राज्य के मुख्यमंत्री को एक राष्ट्रीय पार्टी का अध्य्क्ष चुना गया, तो आप उस पद को सहर्ष स्वीकार कर लेते है लेकिन दूसरी पार्टी का कोई नेता यही करे तो गलत। यह आम आदमी को समझना होगा की वह कीनको आदर्श मानते है, एक ऐसा व्यक्ति जो दोहरे चरित्र जीकर आपको ठगने की कोशिश कर रहा है। चाहे वे राजनेता हो या कोई टीवी पत्रकार।
धन्यवाद।

Tuesday, 23 February 2016

अभिव्यक्ति की आज़ादी या देशभक्ति या कुछ और

कुछ लोग कहते है की अगर आपने एक पार्टी के विरोध में कुछ बोला नहीं की आप देशद्रोही हो गए और दूसरी तरफ दूसरे लोग यही बात कहते है अगर आपने एक पार्टी के विरोध में बोला नहीं की आपको भक्त करार दिया जायेगा। जैसे अगर किसी ने आज की तारीख में यह बोल दिया की JNU में देशद्रोही नारे लगे तो बीजेपी वाले लोगो की नज़र में आप देशभक्त होते है या नहीं लेकिन दूसरी तरफ वाले आपको मोदी भक्त या आरएसएस का एजेंट या कट्टर हिंदूवादी या भक्त जरूर कहते नज़र आ जाएंगे। अब इसी का दूसरा पहलु देखते है अगर किसी ने यह कह दिया JNU में जो नारे लगे वह देशद्रोही तो है लेकिन....? तो आपको जो कल तक मोदी भक्त कहते हुए नज़र आ रहे थे आज आपको देश का सच्चा देशभक्त कहता हुआ नज़र आएगा और दूसरी तरफ वाला आपको देशद्रोही, पाकिस्तानी समर्थक, वामपंथी कहता हुआ नज़र आएगा। आखिर आम आदमी जाये तो जाये कहाँ। इसी वजह से बहुत सारे लोग खुल के यह बात कह नहीं पाते है उनके मन में क्या है। तो यही वजह है की कुछ लोग इन झमेलों से अपने आप को दूर रखने की यथासंभव कोशिश कर रहे है।

सबसे ज्यादा तो तरस आता है पढ़े लिखे नौजवानो पर जो की जीवन में किसी ना किसी तरह एक खास राजनितिक आइडियोलॉजी को सपोर्ट करते है, और किसी राजनैतिक आइडियोलॉजी का समर्थन करना गलत नहीं है।


तरस इसीलिए भी आता है क्योंकि उनकी वजह से ये राजनितिक पार्टी अपने आईटी सेल के द्वारा इन चीजो को देखती परखती है की उनके बारे में युवाओ की क्या सोच है और उसी के तहत आगे की रणनीति तय करते है। और युवाओं का जोश तो देखते बनता है कैसे कैसे शेयर और like होती रहती है सोशल मीडिया पर लेखो का, रिट्वीट और ट्रॉल्लिंग होती रहती है। दुःख तो तब होता है जब बिना कुछ जाँचे परखे शेयर और like करना शुरू कर देते है, वे ऐसा क्यों करते है क्योंकि यह उनकी आइडियोलॉजी जो किसी एक खास राजनीती से मिलती है इसीलिए ऐसा करते है। और बिना जाँचे परखे शेयर, like या ट्वीट करना सही नहीं है क्योंकि कभी कभी इससे गलत सन्देश पहुँच जाता है। और बुद्धिमत्ता का परिचय तो देखिये सिर्फ like या चुपचाप शेयर कर देंगे, ना ही कोई कमेंट ना ही अपना विचार, तो फिर शेयर करने का मतलब क्या हुआ। आप पढ़े लिखे है समझदार है, आपको यह भी पता है कोई भी राजनैतिक पार्टी परफेक्ट नहीं है फिर भी आप जैसे पढ़े लिखे लोग उनका इस तरह समर्थन करेंगे तो क्या होगा इस देश का, देशहित में सोचे क्या सही है क्या नहीं।

आजकल सोशल मीडिया पर दो ही बाते चलती है या तो आप विपक्ष के साथ खड़े नज़र आते है या सत्ता पक्ष के साथ। आपकी अपनी कोई आइडियोलॉजी नही है। आप निष्पक्ष बात नहीं रख सकते है, क्योंकि ऐसा लगता है जैसे आपको कोई हक़ नहीं है ऐसा करने का। सबसे बड़ी बात है विरोध करना है, करे लेकिन आप एक दूसरे के मौलिक अधिकारो का हनन करते हुए विरोध नहीं कर सकते है। अगर आप किसी के ऊपर उंगली उठाएंगे तो आपके ऊपर भी कोई उठाएगा।

उदाहरण के तौर पर NDTV, INDIA TODAY कहता है TIMESNOW और ZEENEWS एकतरफा न्यूज़ दिखाता है यही बात दूसरी पार्टी कह रही है। तो सवाल उठता है एकतरफा कैसे हो गया। आप कहते है आप एकतरफा है तो दूसरी पार्टी वही कह रही है। तो बात संतुलन की हुई नहीं ना। आप अपने स्टूडियो में एक्सपर्ट को बुलाते है कहते है वीडियो सही नहीं है है और वही दूसरी तरफ दूसरी पार्टी इसके उलट कह रही है। हद तो तब हो जाती है जब एक न्यूज़ चैनल किसी को देशद्रोही साबित करने पर लगा हुआ है तो दूसरे न्यूज़ चैनल देशद्रोही नही साबित करने पर तुले हुए है। और दोनों तरफ के लोग यह कहते हुए नज़र आते है की मीडिया ट्रायल बंद होना चाहिए। कैसे बंद हो दोनों तरफ तो एक ही बात चल रही है एक साबित करना चाहता है देशद्रोही है दूसरा करना चाहता है देशद्रोही नहीं है। बात निष्पक्ष कहाँ रह गयी। तो फैसला कैसे हो की सही कौन कह रहा है। फैसला तो न्यायालय में ही हो सकता है और जब न्यायालय तक बात पहुँचती है तो दोनों तरफ के लोग जल्दी फैसले के लिए धरने प्रदर्शन शुरू कर देते है, जल्दी फैसला दो, जल्दी फैसला दो। अगर जल्दी आ गयी तो जिनके पक्ष में फैसला नहीं आया वे कहेंगे फेयर ट्रायल नहीं था और अगर देरी से फैसला आया तो यह कहेंगे की सरकारी पक्ष के लोग दवाब बना रहे है अदालत पर। उसके बाद भी अगर फैसला पक्ष में नहीं आता है तो कहेंगे की अदालत का फैसला प्रभावित था। एक तरफ आप कहते है फैसला अदालत में होनी चाहिए ना की सड़क या स्टूडियो में बैठकर, आप करे तो ठीक हम करे तो गलत ये कैसा पक्ष है। दूसरी तरफ आप कहते है 3-4 जज मिलके यह फैसला नहीं कर सकते। आप खुद ही सोचिये आप कहना क्या चाहते है। अगर जज फैसला नहीं करेंगे तो कौन करेंगे, आम आदमी अगर आम आदमी करेंगे तो सोचिये क्या होगा देश का यह सभ्य समाज नहीं रह जायेगा, यह एक जंगल कहलायेगा जंगल। अनुशासन जरुरी है देश को, विचार को, अभिव्यक्ति की आज़ादी को आगे बढ़ाने के लिए, और अनुशासन के लिए कानून जरुरी है। एक तरफ आप कहते है ज्यूडिशियरी पर पूरा भरोषा है तो आपको उनका सम्मान करना सीखना होगा, एक तरफ आप कहते है आपको संविधान पर पूरा भरोषा है तो उसका सम्मान करना सीखना होगा, ना की अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर उसको कोसना। आपको अभिव्यक्ति की आज़ादी इसीलिए मिली है ताकि कुछ सिस्टम से गलत हो ना हो जाये, अगर कुछ गलत होता है तो उसके बारे में उसे बताया जाय ताकि सुधार हो सके। एक छोटी सी वीडियो क्लिप देख रहा था उसपर किसी ने लिखा था संघी और तथाकथित रक्षा विशेसज्ञ, और वे थे आर्मी के एक सेवानिवृत अधिकारी, जिस व्यक्ति के बारे में यह बोला गया कल तक यही व्यक्ति NDTV पर रक्षा विशेषज्ञ के तौर पर आता रहा है और आज संघी हो गया। तो सोचिये आप कहना क्या चाहते है।

मेरा सिर्फ यह कहना है की बात द्विपक्षीय होनी चाहिए, युवाओ को संविधान और कानून को सम्मान करना सीखना होगा। आपको पता है हर कार्यालय में एक समय निर्धारित होता है की आप समय पर आये और अपना काम समय पर करे। और हम सब इसका पालन करते है। आप स्कूल में हो या कॉलेज में हो या यूनिवर्सिटी में हो हर जगह एक समय निर्धारित होता है की उस वर्ग में जितने बच्चे है सबको एक सामान शिक्षा मिल सके, अगर ऐसा नही होगा तो सोचिये क्या होगा। तो अनुशासन जरुरी है अपने से बड़ो का सम्मान जैसे जरुरी है वैसे ही देश का संविधान और न्याय व्यवस्था का सम्मान भी जरुरी है। अभिव्यक्ति की आज़ादी भी द्विपक्षीय होनी चाहिए ना की एकपक्षीय, क्योंकि अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब भी यही होता है अगर आप अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर सिर्फ अपनी ही बात कहते चले जायेंगे तो यह सही मायने में अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है।

अंत में अपने सभी युवा साथियों से अनुरोध करूँगा की वे सोचे देश के लिए, इतनी सारी समस्याएं है जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। दुनिया सिर्फ सोशल मीडिया या आपके इर्द गिर्द घूमने वाली चीजो के साथ नहीं है, गाँव जाये असली भारत वही बसता है, जहाँ आज़ादी के 65 साल बाद भी लोग एक अदद रोड, एक अदद हैंडपंप, एक अदद बिजली के खम्भे के लिए तरसते है, शिक्षा तो दूर की बात है। आपके अंदर अपार ऊर्जा है जिसका संचालन आप ही कर सकते है सही दिशा में करे, हम कामयाब होंगे, और जरूर होंगे।
धन्यवाद!

Saturday, 20 February 2016

JNU के माननीय सदस्यों से अपील

StandWithJNU कुछ लोग इस शब्द को लगता है फैशन स्टेटमेंट की तरह लेने लगे है, वैसे ही जैसे कुछ पत्रकार यह कहने लगे है मैं देशद्रोही हूँ। ऐसे शब्दों का चुनाव करने वालो को देखकर ऐसा लगता है जैसे एक ऐसे मुद्दे को भटकाने की कोशिश में लगे है जो वाकई में एक सभ्य समाज के लिए खतरनाक है। अंग्रेजी में पढ़ने और लिखने वाले अपने को छोड़कर किसी और की बुद्धिमत्ता को कमतर आंकते है या उन्हें किसी खास एक पार्टी के विचारधारा से मिलाकर देखते है।

JNU को भारत में सर्वश्रेष्ठ भारत के विद्यार्थियों ने बनाया और इसमें किसी एक व्यक्ति का योगदान नहीं माना जा सकता है और यह एक दिन की मेंहनत नहीं है।

JNU एक विश्वविद्यालय ही नही है, यह एक जज्बा है, यह एक परंपरा है, यह एक शान है, जो कभी भी एक झटके में खत्म नहीं हो सकता है। यह जैसे आपकी शान है हमारी भी शान है और हम भी गर्व से कहते है, JNU हमारे देश में है। लेकिन जो अभद्र भाषा का उपयोग किया गया देश के लिए क्या वह सही है।


मेरे कुछ व्यक्तिगत सवाल है जो मेरे मन में उमड़ घुमड़ रहे है। कृपया कर सीधा उत्तर दे, ना की किसने किया क्या, क्या नहीं किया। कोई पोलिटिकल करेक्ट जवाब नही चाहिए। अगर आप जवाब देते है तो ठीक है नहीं देते है तो भी ठीक है चुनाव आपका है:
1) क्या भारत की बर्बादी का नारा लगाना सही है?
2) क्या कश्मीर लड़ के लेंगे का नारा लगाना सही है?
3) क्या इंडिया गो बैक का नारा लगाना सही है?
4) क्या संविधान के प्रति सम्मान व्यक्त करके सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ बोलना सही है?
5) क्या भारत में पाकिस्तान ज़िंदाबाद का नारा लगाना सही है?
6) क्या भारत के संविधान को गाली देना सही है?
7) क्या भारत के संविधान के खिलाफ बोलना सही है?
8) क्या भारत की सेना के खिलाफ बोलना सही है?
9) क्या विचार का विरोध करते-करते व्यक्ति विशेष् का विरोध करना सही है?
10) क्या भारत सरकार की खिलाफत करते-करते उसी भारत सरकार के सब्सिडी पर विश्वविद्यालय में पढ़ना सही है?

आप भले सरकार की खिलाफत करे आपको हक़ है लेकिन आप सोचियेगा आप ऐसी हरकते कर भारत की जनता तक क्या सन्देश पहुँचाना चाहते है।

आप कहते है कुछ एक लोगो की गलत हरकतों की सजा एक संस्थान नहीं भुगत सकता। आप कहते है कुछ एक लोगो की वजह से पुरे संस्थान को गलत नहीं ठहराया जा सकता है। एकदम सही बात है। लेकिन कुछ ऐसे लोग पनपे कैसे आप जैसे बुद्दिजीवियों के बीच, आपको ही सोचना होगा। और इस गंदगी को साफ़ भी आप सबको मिल के करना होगा, क्योंकि अगर एक दुश्मन हो तो उसे सजा देकर ख़त्म किया जा सकता है लेकिन ऐसा लगता है यह शारीरिक दुश्मन नहीं है यह वैचारिक दुश्मन है। और वैचारिक दुश्मनी विचार से ही ख़त्म हो सकता है। और आप माने या माने लेकिन यह एक दिन की बात नहीं है क्योंकि विचार कभी एक दिन में तैयार नहीं होता है इसमें बरसों लगता है।

अगर आपलोग सही में JNU को बचाना चाहते है तो अंदर हो रही ऐसी हरकतों पर लगाम लगाये। क्योंकि यह आपका कर्त्तव्य भी है और साथ में आपका धर्म भी है।

JNURow - खोखली बुद्धिमत्ता या अतिदेशभक्ति

ये कहाँ थे जब मालदा और पूर्णिया में लोकतंत्र का मखौल उड़ाया गया। तब इनकी बुद्धिजीविता विदेश भ्रमण को गयी थी। अगर सरकार और उसके खिलाफ कुछ बोलना है बोले आपको पूरा हक़ है लेकिन देश के टुकड़े हज़ार करके के आप क्या साबित करना चाहते है। सरकार के खिलाफ आपको बोलने में डर लगता है। हम बड़ी जल्दी भूल जाते है मुम्बई एक लड़के को कार्टून बनाने के चक्कर में देशद्रोह का मुकदमा लगाया गया था तब किसी ने नहीं बोला क्यों क्योंकी वह आम आदमी था। क्या मुझे यही नारे लगाने की आज़ादी मिलेगी सड़को पर शायद नही। मेरा सिर्फ एक ही कहना है अगर एक बात कहने की आज़ादी लेखक, बुद्धिजीवी, नेताओ, विद्यार्थियों को है तो आम आदमी को क्यों नहीं। मतलब साफ़ है सरकार कोई भी हो वह सिर्फ दमन कर सकती है आवाज़ों को जो आम जनता से उठती है क्यों क्योंकि वहाँ उसके सपोर्ट में कोई खड़ा नहीं होना चाहता है। मुझे तरस आता है अपने आप पर लोग जो लोग राजनीती भविस्य की आड़ में देश की जनता की भावनाओ से खिलवाड़ करते है। अपने हिसाब से चीजो को इन्टरप्रेट करता है। हर व्यक्ति को है आपको भी है मुझे भी है लेकिन देश के टुकड़े हज़ार होंगे, हमे चाहिए आज़ादी। कौन सी आज़ादी की बात कर रहे है। JNU में पढ़ने वाले 30-40% विद्यार्थी स्नातक के क्या किसी ने उन्हें देखा किसी प्रोटेस्ट नहीं क्योंकि यही बड़े भाई बनते है उनको बोलते है अपने रूम में जाओ तुम्हारा पढ़ने का टाइम है। 10 बजे के बाद कोई भी स्नातक का विद्यार्थी ढाबे पर नहीं दीखता है क्या यह आज़ादी है।

अगर आप इतने बुद्धिजीवी है तो थोड़ा बुद्धिजीविता का परिचय दीजिये और मुखर हो के बोले की JNU में यह देश विरोधी नारे लगे। आप ऐसा कैसे कह सकते है तथाकथित देश विरोधी नारे। शब्दों का हेर फेर मुझे भलीभाँति समझ आता है भले कुछ लोग ना समझ पाये।

तो मेरा सवाल साफ़ है की अगर देशद्रोह है तो देशद्रोह है इसमें किंतु और परंतु कहाँ से आता है। क्या एक आम आदमी यही नारे लगाएगा तब क्या आप यही कहेंगे। अगर कोई राजनेता, विद्यार्थी, लेखक पर देशद्रोह का आरोप नहीं लगेगा तो किस पर लगेगा, आम आदमी पर। क्या आम आदमी की यह औकात है की ऐसा वह बोल पाये। तो सोचना आपको और हमको है की इन चंद वोट के लुटेरो से देश को बचाना है या यु ही घूंट घूंट कर जीने देना है देश को जहाँ एक तरफ हमारे जवान सीमाओं की सुरक्षा के लिए जीते और मरते है दूसरी तरफ ये चंद लोग इस देश की सहिष्णुता और एकता को खंडित करने की कोशिश कर रहे है।

कोई नहीं आया एक आम आदमी ही था मुम्बई का असीम त्रिवेदी, अख़लाक़ का क्या हुआ आम आदमी ही था, मालदा में क्या हुआ आम आदमी ही थे, पूर्णिया में क्या हुआ आम आदमी ही थे। जनाब आम आदमी के साथ कोई खड़ा नहीं होता और ना होगा क्योंकी वह आम आदमी जो ठहरा। ये सिर्फ बुद्दिजीवियों के लिए है, लेखको के लिए है, ये सिर्फ राजनेताओ के लिए है, ये सिर्फ पत्रकारो के लिए है। आम आदमी के लिए कुछ नहीं है कोई नहीं लड़ता। एक आम आदमी ही है जिसने तमिलनाडु सरकार के खिलाफ एक लोकगीत गाया और जेल में है।

सोचना आपको है क्योंकि आप किसी ना किसी तरह से इन संस्थानों में आपकी गाढ़ी कमाई का पैसा जरूर जाता है। और आपकी कमाई के पैसो से हमारे देश के कुछ अच्छे दिमाग को चुना जाता है इन संस्थानों में पढाई के लिए चुना जाता है ताकि आगे चल कर यही दिमाग भविष्य को तैयार करने में सहायक हो।

Monday, 15 February 2016

बोलने की आज़ादी या राजनीती

ऐसा लगता है जैसे हमारे यहाँ बोलने की आज़ादी का मतलब होता है अगर आप सरकार में है विरोध सहना और विपक्ष में है तो सरकार को पानी पी पी के कोसना। वही हाल कुछ घटनाओ को लेकर भी राजनितिक पार्टियां ऐसे रियेक्ट करती है जैसे ऐसा पहले कभी हुआ ही नहीं। यहाँ पर राजनितिक पार्टियां किसी भी घटने को हमेशा अपने नफे नुक्सान के लिए देखती है चाहे उसमे जनता का कितना नुक्सान ही क्यों ना हुआ हो।

ऐसा लगता है अगर आप स्कॉलर हो तो भारत में आपको कुछ भी बोलने का अधिकार हो जाता है और आम आदमी को एक शब्द भी बोलना भारी परता है सिस्टम या न्यायालय के खिलाफ़। क्योंकि हाल के दिनों जगजाहिर स्कॉलर ने उच्चतम न्यायलय के फैसलो के विरुद्ध भी बाते कही है। क्या वे न्यायालय की अवमानना नहीं थी? मुझे नहीं लगता कोई आम आदमी ऐसी हिमाकत कर सकता है। क्या कोई उन्हें समझायेगा की अगर आपको बोलने की आज़ादी है तो इसका मतलब ये नहीं की आप देश के विरुद्ध बोलते रहे और देश को शर्मशार करते रहे।


आम आदमी बेचारा सिर्फ देखने और सुननेे के अलावा कुछ नहीं कर सकता है। क्योंकि आम आदमी को तो रोजी रोटी से ही फुरसत नहीं है, वह सिर्फ अपने घर में बैठ की सिस्टम को गाली दे सकता है वह भी चुपके चुपके ताकि कोई सुन ना ले।

शिक्षा का भगवाकरण हो रहा है, शिक्षण संस्थानों में राजनीती का हस्तक्षेप हो रहा है, अगर शिक्षण संस्थानों में छात्र संगठन होगा तो थोड़ी बहुत राजनीती तो होगी ही। लेकिन अगर कोई देशद्रोह की बात करता है तो क्या उसके आगे या पीछे ये राजनेता लेकिन, किन्तु, परंतु लगाते है, क्या यह सही है? सोचना आपको है क्योंकि आप किसी ना किसी तरह से इन संस्थानों में आपकी गाढ़ी कमाई का पैसा जरूर जाता है। और आपकी कमाई के पैसो से हमारे देश के कुछ अच्छे दिमाग को चुना जाता है इन संस्थानों में पढाई के लिए। ताकि आगे चल कर यही दिमाग भविष्य को तैयार करने में सहायक हो। लेकिन कुछ लोग कहते है की किसी को फाँसी हो गयी वह सही ट्रायल नहीं था तो आप न्यायालय में जाये फिर से री-पेटिशन डाले और बहस करे की, जो उन जजों ने किया है गलत किया है। जहाँ तक मेरी जानकारी है हमेशा भारत में कोई भी केस निचली अदालत से आगे बढ़कर ऊपरी अदालत तक जाती है और सर्वोच्च न्यायालय तक जाता उसके बाद भी आप रिव्यु पेटिशन डाल सकते है, उसके बाद भी आप राष्ट्रपति के पास जा सकते है। जिस केस की यह लोग बात कर रहे है उसका सारा ट्रायल 2007 में ख़त्म हो गया था और 2007 से ही दया याचिका राष्ट्रपतिजी के पास थी और अभी निवर्तमान राष्ट्रपतिजी ने माफीनामा क़बूल नहीं की तो उसके बाद भी आप कहते है फेयर ट्रायल नहीं था। 3 जज मिल के किसी के बारे यह फैसला नहीं ले सकते है की कौन आतंकवादी है कौन नहीं तो क्या इस देश की 125 करोड़ जनता करेगी। अगर ऐसा होता है तो यह काफी शर्मनाक सवाल है एक PhD के स्टूडेंट का। अगर 125 करोड़ जनता करेगी, तो आप भी अपने आरोपो को लेकर 125 करोड़ जनता के बीच में जाए ना की उन्ही 3 जजों की खंडपीठ में, फिर शायद आपको पता चल जायेगा, लेकिन नही जब अपने पर बात आती है तो लोग उसी कानून का दरवाजा खटखटाते है जिसकी वे भर्त्सना करते दीखते है । कानून क्या संवेदनाओ पर फैसला सुनाती है या साक्ष्यों के आधार पर। तो क्या देश की पूरी जनता यह फैसला करेगी की कौन आतंकवादी है कौन नहीं। अगर ऐसा है तो आपका फैसला भी वही जनता करेगी बस एक बार आप बाहर तो निकले। अगर आपका फैसला जनता नही वही 3 जज करेंगे तो आप अपने वक्तव्य में झांक के देखिये की आप क्या कह रहे है। मतलब साफ़ है आप एक राजनितिक महत्वाकांक्षा के तहत यह सारा हथकंडा अपना रहे है। लेकिन मुझे आश्चर्य होता है अपने कुछ राजनेताओ पर वे कहते है इससे उन्हें इमरजेंसी की याद आ रही है, कुछ कह रहे है बिना शर्त उन्हें सारे आरोप वापस लेने चाहिए, वे कहते है निर्दोषो को बंद नही करना चाहिए, वे कहते है विद्यार्थी है उन्हें बंद नहीं करना चाहिए। माफ़ कीजियेगा की अगर यही व्यक्ति कल को आपकी बेटी के साथ बलात्कार के जुर्म में पकड़ा जाता है तब भी क्या आप यही कहेंगे। अगर यही व्यक्ति पार्लियामेंट में घुसकर किसी राजनेता को मार देता है क्या तब भी आप यही कहेंगे। अगर यही व्यक्ति किसी राजनेता पर पथ्थर मारता है तब भी आप यही कहेंगे, क्योंकि जो व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का विरोध फांसी के 2 साल बाद करता है तो वह कुछ भी कर सकता है। आपको यह कहते हुए नहीं लगता है आप दोहरापन भरी बाते करते है। एक PhD का स्टूडेंट इस तरह के नारे लगाएगा तो आम आदमी से क्या अपेक्षा कर सकते है। यह तो वही बात हो गयी की अगर आपने किसी का बलात्कार किया और वह गर्भवती हो गयी तो भी आप बच्चे है क्योंकि आपकी उम्र 16 साल से कम है, अरे एक बच्चे को इस दुनिया में लाने का सहभागी बच्चा कैसे हो गया। हमारे यहाँ PhD आखिरी योग्यता मानी जाती है शैक्षणिक स्तर पर, आप कहते है विद्यार्थी है, अगर विद्यार्थी है तो विद्यार्थी शब्द को साबित करे पहले। लेकिन जो व्यक्ति शैक्षणिक स्तर पर आखिरी पायदान पर पढाई कर रहा हो वह ऐसी बाते करेगा समझ से परे है। कुछ लोग कहते है इंडिया गो बैक क्या मतलब, क्या इंडिया ने जबरदस्ती कब्ज़ा किया हुआ है JNU पर, अगर नहीं तो इस नारे का क्या मतलब है।

आप जिस सिस्टम को इतना गाली देते है उसी सिस्टम ने आपको JNU जैसे संस्थानों में कुछ एक सौ रुपैये में विश्व स्तरीय पढाई का मौका देती है। आप अपने अंदर जज्बा पैदा करे सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने की, बहुत सारे तरीके है लेकिन नही। अगर कोई आतंकवादियों के पक्ष में नही है तो नारे क्यों लगे, अगर लगे तो क्यों लगे, किसने लगाये जिसने भी लगाये, उसके खिलाफ बांकी स्टूडेंट का क्या कर्त्तव्य होता है उसके खिलाफ कंप्लेंट नहीं करनी चाहिए थी। दिक्कत यह है की ज्यादातर लोग वहाँ पढ़ने जाते है और कुछ लोग इसका उपयोग करने जाते है, जो पढ़ने जाते है वे यह कहके चुप रह जाते है छोड़ो पुलिस तो आती नही कैंपस के अंदर तो शिकायत करके क्या फायदा। यही वजह है ऐसे कुछ लोग इसका फायदा उठाते है। अगर किसी की सहमति नही थी तो क्या किसी के फांसी को शहीद बोलना कानून का उल्लंघन नहीं है अगर है तो आपको सजा मिलनी चाहिए या नही। सोचना आपको है किसी एक विचारो का विरोध करने के लिए आप अगर एक फांसी, सजायाफ्ता मुजरिम को आगे रखेंगे तो कोई आम जनता माफ़ नहीं करेगी भले ही आप न्यायालय से बरी क्यों ना हो जाये।

तो मेरा सवाल साफ़ है की अगर देशद्रोह है तो देशद्रोह है इसमें किंतु और परंतु कहाँ से आता है। क्या एक आम आदमी यही नारे लगाएगा तब क्या आप यही कहेंगे। मैं मानता हूँ की हमारे यहाँ एक स्तर सिद्ध है JNU जैसे संस्थानों का, आग्रह करता हूँ की उसकी गरीमा ना गिराये। अगर कोई राजनेता, विद्यार्थी, लेखक पर देशद्रोह का आरोप नहीं लगेगा तो किस पर लगेगा, आम आदमी पर। क्या आम आदमी की यह औकात है की ऐसा वह बोल पाये। और अगर बोल भी दिया तो क्या होगा इसका जीता जगता उदाहरण है मुम्बई का वह नौजवान जिसपर एक कार्टून बनाने पर देशद्रोह का आरोप लगाकर जेल भेजा गया। तो सोचना आपको और हमको है की इन चंद वोट के लुटेरो से देश को बचाना है या यु ही घूंट घूंट कर जीने देना है देश को जहाँ एक तरफ हमारे जवान सीमाओं की सुरक्षा के लिए जीते और मरते है दूसरी तरफ ये चंद लोग इस देश की सहिष्णुता और एकता को खंडित करने की कोशिश कर रहे है।

पूर्व सैनिको ने भी कह दिया है अगर इन घर में छुपे बेवकूफ लोगो को समेटा नहीं गया तो वे भी अपनी डिग्रियां JNU को लौटा देंगे और सोचिये क्या होगा फिर इस देश का। माफ़ी चाहता हूँ अगर किन्ही की भावनाओ को कोई आहत पहुंची हो तो क्योंकि मैं मानता हूँ हर कोई मेरे विचार से सहमत हो जरुरी नहीं लेकिन आप सोचियेगा जरूर की क्या घर में घर का आदमी घर के बारे में यह बोले की जब तक यह घर टूट ना जाये तब तक लड़ते रहेंगे तो सोचिये घर का मुखिया क्या करेगा।

और सबसे बड़ी बात है राजनेताओ की जो इतनी जल्दी ट्वीट कर देते है लगता है जैसे पूरी घटना की जानकारी इनको पहले से हो और ट्विटर पर ही फैसला सुना देते है, तो फिर न्यायालय किस लिये है आप लोग कानून लाओ और सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था का विघट्न कर दो। आगे से आपलोग ही फैसला सुनाओगे की ये हुआ था जी वो भी ट्विटर पर तो लोगो को कम से न्यायालय के चक्कर से छुटकारा मिल जायेगा और पैसे भी बच जायेंगे। ऐसे नेतागण कैसे अपने व्यस्त कार्यक्रम में से इतनी जल्दी पहुँच भी जाते है लेकिन कुछ जगह जहाँ अचानक से लाखो लोग जमा हो जाते है और सरकारी तंत्र को नष्ट और आग के हवाले कर देते है तब ये नेतागण ये कहते नज़र आते है की कानून अपना काम करेगा, क्या वहाँ पर मरने वाले लोग इंसान नहीं थे? कुछ तो शर्म कर लो इतने सारे काम है करने को उस पर तो ध्यान नही जाता है उसके बारे में इतना नहीं चिल्लाते। साफ़ दिख रहा है आपको उन बातो को उठाने में कोई दिलचस्पी नहीं है जो बहुत सारे लोगो की भलाई के लिए होगा। कोई यह नही कहता की शिक्षा में सुधार करो, कोई ये नहीं कहता की कैसे समाज के निचले तबके तक फायदा पहुंचे। सोचिएगा जरा ईमानदारी से, की आप समाज को किस धारा की ओर ले जा रहे है और ले जाना चाहते है।

आप सभी आम आदमी के साथ साथ हमारे यहाँ की राजनितिक पार्टियों से अनुरोध है की अपने बोलने की प्रवृति का अनुशासन से पालन करना चाहिए। क्योंकि कभी कभी आप ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते है जो कही से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सही ठहराया जा सकता है। आप सभी लोगो का सरकार में बैठे लोगो की आलोचना अवश्य करे लेकिन कम से कम अगर आप सार्वजानिक जीवन में जीने वाले लोग है तो आपको कुछ बातो का अवश्य ध्यान रखना चाहिए।

Wednesday, 27 January 2016

गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये!

आज के दिन सभी एक दूसरे को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाये दे रहे है। आज की युवाओं की आदत है की आज सबको गणतंत्र दिवस की शुभकामना दी और अगले साल भर भूल जायेंगे। फेसबुक पर बड़ी बड़ी बाते करेंगे और अगले दिन सब कुछ भूल जायेंगे। और अगली गणतंत्र दिवस आने तक प्रशासन को जी भर के कोसना।

क्यों ना हम आज के दिन कुछ अपने ने प्रण करे की अगले एक साल तक प्रशासन को कोसने के बजाये हम अपने अकेले के तौर पर जो बदल सकते है बदले जैसे की:
हम महिलाओं का अपमान नहीं करेंगे।
हम अपने आस पास गन्दा नहीं फ़ैलाएँगे।
हम कानून का पालन करेंगे।
हम कूड़ा को कूड़ेदान में डालेंगे।
हम उनकी सहायता करेंगे जिन्हें उसकी जरुरत होगी।
हम दुर्घटना में घायल लोगो को नजदीक के अस्पताल में पहुंचाएंगे।
सड़क के नियमो का पालन करेंगे।

जय हिन्द जय भारत!

Saturday, 16 January 2016

सामाजिक समरसता

अगर आज का भारत गाँधी जी जहाँ कही होंगे अगर देख रहे होंगे तो यह सोच के रो रहे होंगे क्या मैंने इसी भारत की तस्वीर देखी थी। अगर यही होना था तो क्यों ना अखंड भारत का सपना देखा।

दादरी उत्तर प्रदेश, मालदा पश्चिम बंगाल, पूर्णिया बिहार, फतेहपुर उत्तर प्रदेश, हरदा मध्य प्रदेश में अगर होने वाली घटनाओं का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है हम कितने असहिष्णु हो गए है। कहा गयी वो सामाजिक समरसता जब हमें अपने बचपन में कभी यह पता नहीं चला की हम कहाँ है और किसके साथ है। कभी हमारी माओं ने ये चिंता नहीं की, शाम हो गयी है मेरा बेटा कहाँ है और खाया या नहीं। लेकिन आज माओं को इस चिंता के बजाये इस बात की चिंता होती है की क्या हुआ होगा वो सही सलामत तो होगा, क्यों क्योंकि आज हमे अपने पड़ोसियों तक पर भरोसा नहीं रहा। क्योंकि हमारी वो जो आपस की एक अनजान डोरी हुआ करती थी जो हमे आपस में एक दूसरे से बांधे रखती थी वो कही टूटती सी नजर आती है। लेकिन मैं कहूँगा नहीं, ये हमारी सामाजिक समरसता आज भी है जो एक हिन्दू बेटी की शादी में एक मुस्लिम परिवार का कोई युवा अपना योगदान देता नजर आता है और कोई मुस्लिम परिवार की बेटी की शादी में हिन्दू युवा अपना योगदान देता नजर आता है। तो आखिर ऐसा क्यों है की वह अनजान धागा टूटता नजर आता है। ये सिर्फ और सिर्फ हमारे राजनितिक आकाओं की उपज है। क्यों, क्योंकि वे ये नहीं चाहते है की हम एक रहे क्योंकि इससे उनकी दूकान बंद होने का खतरा है।


अब आप सोचेंगे ऐसा मैं कैसे कह सकता हूँ। आप सोचे अगर किसी भी असेम्बली में सारे समुदाय एक मत से इस बात पर तैयार होते है की कोई उम्मीदवार हमारे लायक नहीं है और हम पूरी तरह चुनाव का बहिस्कार करेंगे तो क्या आज की तारीख में वहाँ पर सारे उम्मीदवारों को हटाकर दुबारा से चुनाव नहीं कराया जायेगा। तो सिर्फ इस एक उदाहरण के तौर आप सोच सकते है की ये राजनेता ही है जो ऐसा काम करते है।

जरुरी है राजनेता संभल जाये ऐसे कर्तव्यों से और ऐसे वक्तव्यों को देने से बचे वरना उनकी साख तो जायेगी ही साथ में उनकी अपनी पार्टी की भी साख जाती नजर आएँगी। यहाँ पर कुछ राजनेता जो कुछ ना कुछ हमेशा बोलते रहते है और जब भी बोलते है उससे आपस के समुदायो में तनाव बढ़ता है। लेकिन जब तक इन राजनेताओ को हम अपना मसीहा समझते रहेंगे तब तक ये हमारा इसी तरह फायदा उठाते रहेंगे। ये नेता कभी हिन्दू-मुस्लिम कह के डराते है कभी मुस्लिम-हिन्दू कह के डराते है, कभी ईसाइ-हिन्दू कह के डराते है कभी हिंदु-ईसाई कह के डराते है। जरा सोचिये इनके हाथ में पुरे राज्य की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी होती और ऐसे कैसे एक जगह कुछ लाख या कुछ हज़ार लोग अचानक जमा हो जाते है और ऐसा कुछ कर जाते है जो मानवता के नाम पर कलंक है। क्या कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की नहीं है? कभी आपने सोचा है की किसी राजनेता के किसी रैली में ऐसी घटनाये क्यों नहीं होती है। कभी कोई राजनेता किसी बम्ब ब्लास्ट में नहीं मरता। क्योंकि जहाँ ये राजनेता होते है वहां की सुरक्षा चाक चौबंद होती है। जरा सोचिए हम राजनेता से है या राजनेता हमसे है। तो आखिर मरता कौन है आम आदमी कोई राजनेता क्यों नहीं। हमारे चुने हुए नेता को हमसे क्या खतरा जो हमसे ही नहीं मिलते चुनाव के बाद। चुनाव के पहले तक तो इनको जहाँ चाहो बिठा लो कोई फर्क नहीं परता, चुनाव जितने के बाद ही ये भीआईपी हो जाते है। मैं यहाँ छोटा सा उदाहरण देना चाहूँगा की मेरे क्षेत्र का सांसद कभी मेरे गाँव नहीं आता चुनाव जितने के बाद लेकिन चुनाव से पहले कई दफा मैंने उन्हें अपने गाँव में देखा है खड़े खड़े बात करते हुए किसी भी अनजान व्यक्ति से, मोटरसाइकिल पर भ्रमण करते हुए कई बार गुफ्तगू करने का भी मौका लगा लेकिन अगर मैं दिल्ली में उनसे मिलना चाहू तो शायद यह संभव नहीं क्योंकि दिल्ली आते ही वे एक भीआईपी हो जाते है। शायद संसद में वे सोनिया गांधी जी के बगल में हमेशा बैठे नजर आते है शायद नहीं भी। और आज तक कभी एक सवाल करते नहीं देखा और ना ही सुना। मैं यह नहीं कहता की आप सोनिया गांधी जी के बगल में ना बैठे लेकिन कम से कम अपने राजनितिक धर्म का तो पालन करे संसद में। अगर किन्ही राजनेताओं को सही मे खतरा है तो आप उन्हें सुरक्षा दीजिये लेकिन बांकी जनता के साथ तो ऐसा ना करे उनसे राजनेता मिले बात करे तभी उन्हें पता चल पायेगा की क्षेत्र में क्या कमी है जिसे दूर करने का प्रयास किया जाये। बात करने से बात बनती है।

तो जरुरत है हमे जागने की हम क्या है और हमे क्या चाहिए। जरुरत है हमे यह समझने की कौन सही है कौन गलत। कभी य राजनेताे बोलेंगे जोर जोर से जैसे इनका कोई सगा मर गया हो कभी यह चुपचाप परे रहते है एक शब्द मुँह से नहीं निकालते, क्यों क्योंकि वोट की राजनीती जो ठहरी। तो मतलब है इन्हें और इनकी मानसिकता को समझने की तभी हम इनके खिलाफ खड़े हो पाएंगे।  कुछ लोग दादरी पर चिल्ला चिल्ला के बहुत कुछ बोल गए लेकिन मालदा और पूर्णिया जैसी घटनाओं के बारे में कुछ नहीं बोला। जिन लोगों ने मालदा और पूर्णिया की घटनाओं पे गला फाड़ के चिल्लाये वे कभी दादरी और हरदा जैसी घटनाओ पर चुप्पी साध ली। क्या हम इतने बेवकूफ है हमे समझ नहीं आता की कौन क्या कह रहा है कैसे कह रहा है। या हम सुनना नहीं चाहते है। मुझे नहीं लगता है की हम ऐसे हो गए है की हम यही सुनना चाहते हो। या कुछ और है जिसकी वजह से हम चुप रहते है।

तो मैं यही कहना चाहता हूँ की आप अफवाहों पर ध्यान ना दे जबतक आपको विश्वस्त सूत्रो से पता ना चले। आप राजनेताओ की बात माने लेकिन उससे पहले अपने विवेक का उपयोग अवश्य करे। मैं अपने पढ़े लिखे युवा मित्रो से कहूँगा की आप भी किसी भी बात को फैलाने से पहले उसके बारे में कुछ जांच पड़ताल अवश्य करे। आज का जमाना इतना मॉडर्न है की आप एक क्लिक से किसी भी न्यूज़ के बारे में तुरंत पता लगा सकते है। तो कही भी शेयर करने से पहले उस न्यूज़ के इम्पैक्ट के बारे में अवश्य सोचे, क्योंकि आपके एक शेयर करने से जाने अनजाने में आप कई लाख नहीं तो कई हजार लोगो तक अपनी बात पहुँचाने में सक्षम है। आप पढ़े लिखे है आपसे उम्मीद की जाती है की आप अपने समाज को दिशा दिखाए और सही दिशा दिखाए, ताकि उनके जीवन में सुधार हो सके। आप इस बात से कतई इनकार नहीं कर सकते की आप अकेले के करने से क्या होता है आप करे तो सही। और आपकी समाज के प्रति कुछ जिम्मेदारी बनती है उसका अवश्य निर्वाह करे। चाहे जैसे करे अवश्य करे हर एक बात को सरकार के सिर पे छोड़ देना सही नहीं है। आप अपने आँख और कान हमेशा खुले रखे की आस पास क्या हो रहा है अगर गलत हो रहा है तो पूछे जरूर, पूछने में क्या जाता है।
जय हिन्द जय भारत।

Tuesday, 5 January 2016

सरकार और भ्रष्टाचार

twitterकांग्रेस की सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ गया था। अपने काम के लिए किसी भी दफ़्तर में गए तो बिना पैसा दिए जनता का काम ही नहीं हो रहा था। बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण महंगाई भी बढ़ गई थी। देश की जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त हो गई थी। भ्रष्टाचार को रोके बिना देश की प्रगति को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। क्योंकि भ्रष्टाचार ही है जो विकास की गति को आगे बढ़ने से रोकती है।

देश के बढते भ्रष्टाचार को रोकना जरूरी है। यह जनता की मन से इच्छा है क्योंकि जनता ही है जो सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार से ग्रषित है। 2011 में अन्ना का आंदोलन सिर्फ अन्ना और सरकार के बीच आंदोलन नहीं रह गया था। इसके लिए पूरे देश की जनता खड़ी हो गई थी। खास तौर पर युवाओ के योगदान की सराहना करनी होगी। जो बड़े पैमाने पर रास्ते पर उतर आई थी। देश के हर राज्य में, हर जिले यहाँ तक की गांव स्तर पर यह आंदोलन का रूप लेना, जनता का गुस्सा दर्शाता है भ्रष्टाचार के खिलाफ। आजादी के बाद पहली बार देश में इतना बड़ा आंदोलन जनता ने किया था। और ऐसा पहली बार हुआ जो इतना बड़ा आंदोलन बिना किसी हिंसा के संपन्न हुआ, ये जनता की सहिष्णुता दर्शाता है। आजकल कोई एक राजनितिक पार्टी बता दे जिसके आंदोलन में हिंसा ना हो।


बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण देश की जनता कांग्रेस सरकार से नाराज हो गई थी। ऐसी स्थिति में जब देश में 2014 में लोकसभा का चुनाव आया और बीजेपी ने जनता को आश्वासन दिया कि, हमारी पार्टी सत्ता में आती है तो हम भ्रष्टाचार के विरोध की लड़ाई को प्राथमिकता देंगे। जनता ने बीजेपी पर विश्वास किया, और जनता ने बीजेपी की सरकार बनवाई। लेकिन आज भी कहीं पर भी बिना पैसा दिए जनता का काम नहीं होता है। न ही महंगाई कम हुई है। कांग्रेस सरकार और बीजेपी की सरकार में विशेष तौर पर भ्रष्टाचार के बारे में कोई फर्क दिखाई नहीं देता है। लोकसभा का पूरा का पूरा सत्र झगड़े में जा रहा है। जनता का करोडों रुपया बर्बाद हो रहा है।

बीजेपी ने जनता को यह भी आश्वासन दिया था कि, हमारे देश का काला धन जो विदेशों में छुपा है, उसको हमारी पार्टी के सत्ता में आने पर 100 दिन के अंदर देश में वापस लाएंगे और हर व्यक्ति के बैंक अकाउंट में 15 लाख रुपया जमा करेंगे। उस से देश का भ्रष्टाचार कम होगा। लेकिन आज तक किसी व्यक्ती के बैंक अकाउंट में 15 लाख तो क्या 15 पैसे भी जमा नहीं हुए है।

बीजेपी की सरकार को सत्ता में आ कर डेढ साल से ज़्यादा समय हो चुका है। लेकिन भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जो लोकपाल और लोकायुक्त कानून बना है, उस पर न तो सरकार कुछ बोलती हैं और न ही उस पर अमल करती हैं। हम उम्मीद लगाए हुए है कि कभी मन की बात में लोकपाल और लोकायुक्त के विषय पर प्रधानमंत्री जी कुछ ना कुछ बोलेंगे। क्यों कि भ्रष्टाचार के विरोध की लडाई को प्राथमिकता देने की बात देश की जनता से बीजेपी ने ही कही थी।

हो सकता है, उन बातों का शायद आपको विस्मरण हो गया हो, इसलिए आपको फिर से याद दिलाना आवश्यक है की हमने करोड़ों की संख्या में लोकपाल और लोकायुक्त के लिए देश में आंदोलन किया था। आश्वासन दे कर उस पर  अमल नहीं करना यह, उन देशवासियों का अपमान है।

भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए और भी कई आश्वासन दिए थे। लेकिन उनकी पूर्ति नहीं हुई है। कृषि-प्रधान देश के किसानों को बीजेपी ने आश्वासन दिया था कि, किसान खेती में पैदावारी के लिए जो खर्चा करता है, उसका डेढ़ गुना मूल्य किसानों को अपनी खेती की पैदावारी से मिलेगा। लेकिन आज भी खेती माल को सही दाम ना मिलने के कारण देश का किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है। देश की जनता की भलाई के लिए और देश के उज्जवल भविष्य, देश के विकास के लिए किसानो के हितो की रक्षा करना आवश्यक हो गया है।

सरकार में आते ही कई भ्रष्टाचार के आरोप लगे जैसे अरुण जेटली जी पर डीडीसीए में हेर फेर का आरोप, राजस्थान की मुख्यमंत्री पर ललित मोदी से सांठ गाँठ का आरोप, सुषमा स्वराज पर ललित मोदी का सहायता करने का आरोप और भी कई मंत्रियों पर छोटे मोठे आरोपो का लगना।

दिल्ली की मुख्यमंत्री की बात करे तो उनके कई मंत्रियों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उनमे से कई तो आज कल जेल में है।अरविंद केजरीवाल के ही शब्दों में राजनीती एक कीचड़ है जिसमे जाने के बाद कोई भी साफ़ नहीं रह सकता है। और भी कई भ्रष्टाचार के आरोप लगे मुख्यमंत्री और उनके सहयोगियों पर।

बिहार के मुख्यमंत्री की बात करते है उनके ऊपर भी भ्रष्टाचारियों के साथ मिलकर सरकार बनाने का आरोप लगा, कुछ हद तक ये सही भी है। क्योंकि जिन्होंने 90 का दशक जिया है बिहार में वे वाकिफ़ है इस बात से की किस कदर भ्रष्टाचार चरम पर था, बिहार में।

अगर हम सारे मुख्यमंत्रियों की बात करे तो लगभग सभी पर किसी ना किसी तरह के भ्रष्टाचार का आरोप लगा ही है। इन लिस्ट में कुछ मुख्यमंत्री ऐसे है जो निर्विवाद रूप से किसी भी पार्टी के नेता उन्हें ईमानदार मानते ही है, चाहे कितनी प्रतिद्वंद्विता क्यों ना हो। कुल मिलाकर हम ये कह सकते है कोई भी सरकार हो शासन में आते आरोपो का लगना जैसे आम बात हो गयी है।

तो भ्रष्टाचार और सरकार का हमेशा से चोली दामन का साथ रहा है। कोई ऐसी सरकार नहीं जिसने कोई ऐसा फैसला लिया हो जो पूरी तरह जनता के हक़ में हो कही ना कही किसी ना किसी तरह से हर फ़ैसला प्रेरित रहा है। अगर जनता को इससे छुटकारा नहीं मिलता है तो वो दिन दूर नहीं जब भेड़िया आया भेड़िया आया वाली कहावत सिद्ध होती नज़र आएगी। सारे राजनितिक दल एक कोने में बैठे नज़र आएंगे और राष्ट्रपति जी का शासन हो रहा होगा क्योंकि किसी को आम जनता बहुमत ही नहीं देगी।

ये 65 सालो का भ्रष्टाचार कुछ दिन खत्म नहीं हो पायेगा, इसे मिटाने के लिए काफी मेहनत और काफी समय की जरुरत होगी और हमे देना होगा, क्योंकि भ्रष्टाचार हमारे खून में है। इसको बार बार डायलिसिस की जरुरत है। जनता समय देने के लिए तत्पर है लेकिन कोई सरकार इस ओर कदम तो बढ़ाये ईमानदारी से।

Thursday, 31 December 2015

नया साल मुबारक 2016

happy-new-year-2016आने वाला समय नए साल का स्वागत और पुराने साल की अच्छे से विदाई कहने का वक़्त है। यह समय है पुराने समय की अच्छी बातो को याद करके उसके सहारे आगे बढ़ने की और बुरे समय को भूलने। यह समय है जीवन में कुछ नयी शुरुआत करने का। नया साल हमेशा सबके लिए कुछ ना कुछ सन्देश ले के आता है। हम सबको इस बात को समझना चाहिए जो कुछ भी गलत हुआ पिछले साल में उसके पीछे कोई ना कोई वजह रही होगी और उन गलत बातों को भूल के आगे बढ़ना चाहिए।

नए साल की शुरुआत लोगो को नए साल की मुबारकवाद से करे। साल २०१५, साल २०१६ के लिए बाहें फैलाएं खड़ा है और हमसे कह रहा है उठो, जागो, देखो और सीखो पिछले साल की गयी गलतियों से और नए साल का स्वागत करो नयी खुशियों और उम्मीदों से।


एक पुरानी कहावत है "हमे उन बातों पे रोना नहीं चाहिए जो बीत चूका है और हमे खुश होना चाहिए की ऐसा हो चूका है"। ये उसी तरह से व्यर्थ है जैसे ज़मीन पर बिखरे हुए दूध पे रोना। आप बीत गए समय को कभी वापस नहीं ला सकते लेकिन आप उसमे सुधार तो अवश्य कर सकते है। नया साल नयी ऊंचाइयों को छूने का है नयी शुरुवात करने का है। आये शपथ ले किसी की मुस्कराहट लाने का, किसी को खुशियाँ देने का। इस तरह आप दोनों खुशियाँ देख पाएंगे अपनी अपनी जिंदगियों में।

इसीलिए नया साल जैसे ही अपने आने की घोसना करे सबसे पहले आप अपने करीबियों को नए साल की मुबारकवाद दे और उन्हें बताएं आप उनसे कितना प्रेम करते और उनकी आपकी जिंदगी में क्या अहमियत है।

इन्ही शब्दों के साथ आप सभी के लिए आने वाले साल में धन, बल, सुख और शांति की कामना करते है।
जय हिन्द, जय भारत।

Sunday, 27 December 2015

बिहार में शिक्षा की बदहाली

बिहार के शिक्षा की स्तिथि जो भी है पहले से तो बेहतर नहीं है ये सबको पता है लेकिन अगर इसकी नजदीक से समीक्षा की जाये तो इसके लिए जितने जिम्मेदार राजनेता है उतने ही जिम्मेदार हमारे शिक्षक भी है। और साथ में हमारा समाज भी उतना ही जिम्मेदार है। बिहार में इस बदहाल शिक्षा की स्तिथि आज की नहीं है ये तब से शुरू हुई जब से हमारे माननीय लालू प्रसाद जी बिहार के मुख्यमंत्री बने। उसके पहले के मुख्यमंत्रियों को मैं जिम्मेदार इसलिए नहीं मानता क्योंकि एक तो उस समय मुझे ज्ञान नहीं था की सही क्या है और गलत क्या है। लेकिन फिर भी उस समय जो भी मैंने देखा और समझा है उस समय के शिक्षक स्कूल आते थे और पढ़ाते भी थे। मैं ये नहीं कहता की आजकल के शिक्षक स्कूल आते नहीं और पढ़ाते नहीं, कुछ लोग आते भी है अच्छी तरह पढ़ाते भी है।


तो फिर चूक कहा हुई ये जानने की जरुरत है। शिक्षा का स्तर सैद्धान्तिक स्तर पर सही में अगर गिरा तो वो लालू प्रसाद जी के समय ही। क्योंकि उस समय जब लालू प्रसाद जी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो सिर्फ इस बात को लेकर की हम अति पिछड़ी जाती को वह सम्मान दिलाएंगे जिसके वे हक़दार है। क्योंकि उनकी राजनीती की शुरुआत ही हुई थी अगड़ो की मुखालफत से। और यही से शिक्षा संस्थानों में पिछड़ो की पकड़ बनाने की कोशिश गलत दिशा में चली गयी। ये सही है उस समय तक पिछड़ो की ना तो कोई सामाजिक पहचान थी ना ही अगड़ो के बीच उनकी बैठने की हैसियत। क्यों? क्योंकि ना तो वे शिक्षित ही थे ना ही आर्थिक रूप से इतने समृद्ध की वे अगड़ो के बीच अपनी बात रख सके। क्योंकि पूरी की पूरी जमात जो निर्णय लेने वाली जगह थी वो अगड़ो से भरी हुई थी। यही से शुरू हुआ बिहार में अगड़ो और पिछड़ो की राजनीती जिसने बी पी मंडल जैसे पिछड़े राजनेताओ को देश की राजनीती में राष्ट्रीय पटल पे ला खड़ा किया। खैर आते है मुख्य मुद्दे पर। हाँ इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता की उन्होंने पिछड़ो को आवाज दी। लेकिन साथ में शिक्षा संस्थानों में पिछड़ो का पकड़ बनाने के चक्कर में हम ये भूल गए जिस शिक्षा संस्थानों में पिछड़ो के पकड़ की बात करते है उन पदों पर बैठने के लिए भी हमे अच्छे और विद्वान लोगो के संख्या बल की जरुरत थी जो पिछड़ो में नहीं थी। और पिछड़ो का पकड़ बनाने की बहस ऐसे संस्थानों में कुछ अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति से हमारे लिए अच्छी शिक्षा का ह्रास कर गया। हमारे उस समय का शासन हमे ये बताने में नाकाम रहा की सिर्फ डिग्री पाना ही नौकरी की गारन्टी नहीं होती, ऐसी शिक्षा से हम डिग्री और नौकरी पा भी ले लेकिन वो हमे उस वास्तविक जीवन को जीने में आने वाली कठनाइओ से पार पाने की हिम्मत कतई नहीं दिला सकता और हम समाज को अच्छी दिशा ले जाने में कामयाब कतई नहीं हो सकते। और ये हुआ भी उस समय के पढ़े लिखे नौजवान जब तक समझते तब तक काफी देर हो चुकी थी क्योंकि एक नस्ल तो निकल चुकी थी ऐसी डिग्रियां ले कर। लेकिन बाहर निकलते ही पता चला ऐसी डिग्री किसी काम की नहीं और उनके सामने जीवन का घोड़ अँधेरा दिख रहा था और ये पूरी की पूरी पौध यही से गलत रास्ते पर निकल गयी जिन्हें रास्ता दिखाने के लिए कोई नहीं था। उसके बाद के तीन शासनकाल लालू प्रसाद के खत्म होते ही माननीय नितीश जी का बिहार की राजनीती में प्रादुर्भाव हुआ क्योंकि लालू प्रसाद जी के हर एक शासनकाल के बाद अगले शासन में सैद्धान्तिक मूल्यों का ह्रास होता चला गया।

नितीश जी का प्रादुर्भाव हुआ बीजेपी जैसे पार्टियों के साथ मिलकर जो हमेशा से अगड़ो की राजनीती करती आई है और उसे एक मौका नजर आया वापस से सत्ता में आने का और ये हुआ भी लेकिन पिछड़ो की राजनीती इतनी जल्दी इतनी कमजोर होने वाली नहीं थी तो नितीश कुमार जी पिछड़ो के सबसे बड़े नेता बन के उभरे और उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। नितीश कुमार ने आते ही कुछ अच्छे कदम उठाये जो जन कल्याणकारी थे और रहे भी अगले कुछ वर्षो तक। उन्ही मे से एक था शिक्षामित्रो की बहाली प्रार्थमिक स्कूलों में। बाद मे यह धीरे-धीरे माध्यमिक उसके बाद उच्च विद्यालयों में भी लागु हुआ।और यही से हमारी शिक्षा का ह्रास-दर बढ़ता गया। ये सच है की यह राजनितिक फैसला स्कूलों के लिये विद्यार्थी तो खीच लाये लेकिन जो हमारी पौध ख़राब शिक्षा के माध्यम से अच्छे नंबरो की डिग्रियां रखे हुई थी उनकी ये डिग्रियां यहाँ काम कर गयी और वे शिक्षामित्र बन गए। वे शिक्षामित्र बन तो गए लेकिन जब उनका वास्तविकता से सामना हुआ उनके हाथ पैर फूलने लगे। और वे अपने कर्तव्यों से जी चुराने लगे। तो जाहिर है ऐसे शिक्षको से हम इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं कर सकते थे। यही से जो हमारी प्रार्थमिक शिक्षा का ह्रास हुआ वो बदस्तूर आज तक जारी है। मैं ये नहीं कहता उसमे सारे शिक्षक ऐसे ही है उनमे से कुछ बहुत अच्छे है और अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह समझते भी है। तो कहते है ना जब हमारा नींव ही सही नहीं होगी तो हम कहा से ऊपर की मजबूती को सोच सकते है। लेकिन एक बात है जो हमेशा हम बिहारियों को बांकी देश वासियों से अलग करती है वह है हमारे डीएनए में पढ़ने की ललक जो हमेशा हमे विकट परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है और हम बढ़ते भी है। आज की तारीख में नयी पौध की बेसिक शिक्षा में मजबूती नहीं होना उनका भविष्य ख़राब कर सकता है इसका मतलब हम क्या दे रहे है समाज को हम गलती पर गलती करे जा रहे है इस मामले में किसी को कोई फिक्र नहीं है ना तो सरकार को ना ही उन स्कूलों में पदस्थापित शिक्षको को। सरकारी स्कूलों में स्थापित शिक्षक भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ा रहे है। क्योंकि उन्हें पता है जब वो ही नहीं पढ़ा रहे है तो उसके बच्चे कहा से पढ़ेंगे। एक तरफ तो हम अपने कर्तव्यों से मुकर रहे है और हम चाहते की हमारे बच्चों का भविष्य कोई और सुधारे, ये कैसे हो सकता है आप किसी के बच्चों का भविष्य ना पढ़ा के ख़राब करे और आपके बच्चों का भविष्य कोई और सुधारे।

बेहतर है सरकार इस मामले में कुछ कदम उठाये और हमारे शिक्षक भी अपने स्तर को सुधारे और अपने आप को अपने कर्तव्यों से जोड़े और जो उन्होंने कर्तव्यपरायणता की शपथ ली है उसे आगे बढ़ाने के लिए सोचे। वे ये भी सोचे जब हमारा समाज ही नहीं आगे बढ़ेगा तब तक हम भी आगे नहीं बढ़ पाएंगे। क्या सिर्फ अपने बच्चों को आगे बढ़ाने से क्या हमारा समाज आगे बढ़ पायेगा कतई नहीं। हमे अपने बच्चों के साथ साथ बांकी बच्चों को भी आगे बढ़ाने के लिए तभी समाज आगे बढ़ेगा। हम अगर हर एक मसले को सरकार के साथ जोड़ के देखने लगेंगे तो समाज आगे कभी नहीं बढ़ पायेगा।
तो जरुरत है हमे अपने आप में बदलाव लाने की ना की हरेक मसले को सरकार के सिर मढ़ने की।
जय हिन्द जय भारत!

Tuesday, 22 December 2015

किसानो की बदहाली या सरकारी उपेक्षा

एक रिपोर्ट आई थी २१ दिसंबर २०१५ को रात ९ बजे ज़ी न्यूज़ के कार्यक्रम डीएनए में "बुंदेलखंड में बदहाल किसान". क्या ये सिर्फ बुंदेलखंड के किसानो की हालात है? या ये सिर्फ महाराष्ट्र के किसानो की हालात है? या ये सिर्फ आंध्र प्रदेश या तेलंगाना या उड़ीसा या झारखण्ड या फिर राजस्थान के किसानो की हालात है? अगर आप थोड़ी सी फौरी नजर डाले तो पुरे देश के किसानो के बारे में तो जिस तरह के न्यूज़ गाहे बगाहे कुछ कद्दावर पत्रकारो द्वारा प्रकाशित या दिखाई जाती है उससे ये तो साफ़ है ये समस्या जितनी दिखती है उससे कही ज्यादा संवेदनशील है। लेकिन टीवी चैंनल वाले भी क्या करे उन्हें भी पैसे कमाने है अपने पेट भरने है तो कुछ असंवेदनशील मुद्दे तो उठेंगे ही और उन्ही कुछ मुद्दों पर सोशल मीडिया में बहस भी होगी क्योंकि उन्ही न्यूज़ की वजह से इनकी टीरपी बढ़ती है। आज की तारीख में टीरपी नहीं तो कुछ नहीं क्योंकि जितनी बड़ी टीरपी उतनी बड़ी कमर्शियल उपलब्धि। आखिर इतने बड़े बड़े लोग इन मीडिया हाउस के पीछे बैठे किस लिये है पैसे कमाने के लिए ही तो तो फिर न्यूज़ को संवेदनशील बना के फायदा न उठाया जाये।


जैसे कॉर्पोरेट हाउसेस के लिए सीएसआर एक सेक्शन होता है आपको अपनी कमाई का कुछ हिस्सा समाज को वापस करना होता है वैसे ही ऐसा कुछ कानून इन न्यूज़ चैनल्स पे लागु नहीं होना चाहिए की उन्हें भी हम बाध्य करे की आप अपने पुरे एयर टाइम का कुछ हिस्सा समाज से जुड़ी खबरों पे जैसे की सरकार के अनेक कार्यक्रम जो आम जनता के लिए जानना जरुरी होता है उसे बताये उससे जुड़ी अच्छी बुरी पहलु को भी बताये। इससे दो फायदे होंगे १) सरकार को इन कार्यक्रमों को जनता तक पहुँचाने के लिए पैसे खर्चने नहीं पड़ेंगे २) किसी भी सरकारी कार्यक्रम का अच्छे से विश्लेषण हो पायेगा और सबसे बड़ी बात जनता तक बात आसानी से पहुंचाई जा सकेगी।

अगर हम बुंदेलखंड वाली रिपोर्ट को ही देखे तो हमे समझ में आता है की सरकारे कितनी असंवेदनशील हो गयी है पता चलता है। क्योंकि जिस बुंदेलखंड की बात इस रिपोर्ट में उठाई गयी है उसमे ये भी कही गयी है की तक़रीबन १करोड़ से ज्यादा आदमी इस भुखमरी के कगार पे है तो मेरा सवाल सरकार से सिर्फ इतना है की क्या सरकारी महकमो को इससे जुड़ी किसी भी समस्या का कुछ भी ज्ञान नहीं है अगर नहीं तो आप सरकार में रहने लायक नहीं है क्योंकि जहाँ पे इतनी बड़ी तादाद में लोग भुखमरी की समस्या से जूझ रहेे है और आप कहे आपको कुछ पता नही तो ये समझ से परे है। और अगर आप ये कहे की आपको सब कुछ ज्ञात है इस मामले में फिर भी आप कुछ नहीं कर रहे है या नहीं कर पा रहे है तो आप असंवेदनशील है।

लेकिन बेचारे न्यूज़ चैनल्स वाले भी क्या करेंगे जब हमारे संसद में जब इन मुद्दों पर चर्चा के बजाये असहिष्णुता पे चर्चा को प्रार्थमिकता दी जाती है तो टीवी चैनल्स पे इस बात की कितनी जिम्मेदारी डाली जा सकती है। जनता के चुने हुए नेता जो जनता के लिये काम करने को बाध्य होते है वो ही इन मुद्दों पर बात करना नहीं चाहते तो हम न्यूज़ चैनल्स से इससे ज्यादा अपेक्षा नहीं कर सकते। खैर यहाँ पर असहिष्णुता पे चर्चा करना ठीक नहीं होगा क्योंकि जिस मुद्दे पे बात करने के लिये ये लेख जिस ओर अग्रसर हुआ ही उसी और हमे बढ़ना चाहिए मुद्दे से भटकना नहीं चाहिए। जिस देश की ६०% जनता अभी भी कृषि या उससे आधारित उद्योगों पे आश्रित हो पर आप सांसदों का उसकी चर्चा से भागना ये दर्शाता है की आप कितने असंवेदनशील है। जहाँ इस दुनिया के लगभग सारे विकशित देश अपने अपने किसानो के हितो की रक्षा करने के लिए डब्लूटीओ जैसे संस्थानों से पंगा लेने से नहीं हिचकते वही आप अपने देश के किसानो और उससे जुड़ी समस्याओ से बात करने में कतराते है। तो इससे पता चलता है की आप कितने असंवेदनशील है।

आप जहाँ बिज़नेस घरानो को कुछ एक जगह बिज़नेस करने पर सब्सिडी देने से नहीं चूकते वही आप किसानो को उनके खाद और बीज पर सब्सिडी देने से कतराते है। और ये कह के पल्ला झार लेते है की इससे अर्थव्यवस्था पे कितना असर पड़ेगा। क्या आपने कभी इस बात का आकलन किया है अगर एक बार किसान फसल कम उपजाते है तो आपकी अर्थव्यवस्था पे कितना असर पड़ता है? क्या आपने कभी कभी सोचा है आपकी अर्थव्यवस्था का सकल घरेलू उत्पाद का कुछ प्रतिशत सही मानसून ना होने पर निर्भर करता है? २१वी सदी में भी हम अच्छे मानसून को सोचते है और फसल अच्छी हो और हमारी लंगड़ी लुल्ली कृषि सकल घरेलु उत्पाद में कुछ इज़ाफ़ा कर सके।

जब तक सरकार में और संसद में असंवेदनशील लोग मौजूद होंगे तबतक इस देश का और इस देश के किसानो का कुछ नहीं हो सकता है। मैं नहीं कहता सरकार और संसद में बैठे सारे लोग निक्कमे, नकारे और असंवेदनशील है लेकिन कुछ लोग तो है ही जिन्हें इन सब बातो से कुछ फर्क नहीं पड़ता। हमारी सकल घरेलु उत्पाद सिर्फ सेवा या अन्य क्षेत्र से जुड़ी क्षेत्र से बढ़ती/घटती नहीं है। जिस देश के सकल घरेलु उत्पाद का बड़ा हिस्सा कृषि या उससे जुड़ी उद्योगों पर निर्भर हो वहाँ के निति निर्माताओ का इस क्षेत्र का इस तरह से उपेक्षा करना कतई सही ठहराया नहीं जा सकता है। जरुरत है हमे अपने नजरिये पर पुनर्विचार करने की और नए सिरे से सोचने की। आप सोचे जहाँ आपकी ६०% जनता जिस क्षेत्र से जुड़ी हो अगर आप उनसे जुड़ी कल्याणकारी योजनाओ को लागु करेंगे और अच्छे से अनुपालन करवाएंगे तो देश कहाँ से कहाँ पहुंचेगा। बस हमे उनके नब्ज़ को पकड़ना है कहाँ हमसे चूक हुई ये पता लगाना है और उससे निपटने के उपाय सोचने है। पहले सोच तो बदले फिर देखे वही किसान आपकी अर्थव्यवस्था को कहाँ से कहाँ पहुंचाते है। एक बात हम भूल रहे है यही भारत था जिसपे राज़ करने के लिए अंग्रेज़ो ने इतनी मेहनत की साम दाम दंड भेद निति अपनाये, क्या भारत में उस समय बड़ी बड़ी इंडस्ट्री हुआ करती थी नहीं तो अंग्रेज भारत क्या करने आये थे। बस इस प्रश्न के उत्तर में झांकने की जरुरत है तो हम सोच पाएंगे की हमारे किसान हमे कहाँ से कहाँ पहुँचा सकते है। बस सिर्फ सोच/नजरिया बदलने की जरुरत है।
जय हिन्द जय भारत!

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